ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
युद्ध की कालिख
01-Dec-2016 12:00 AM 2202     

भूरी धरती के स्याह माथे पर
तुमने देखी है युद्ध की कालिख?
खून, बारूद में सने बच्चे!
अपने हाथों में माँ का हाथ लिए
एक आवाक बेजुबां बच्ची!
तुमने देखा है अपने लालच को
बम धमाकों में यूँ बदलते हुए?
ये जो चुप्पियाँ तुम्हारी हैं
किसी बच्चे की चीख बनती हैं
लाल-कत्थई लब की ये रंगत
रंग है उनके सूखे खूनों का
छत फटी, रात चाँद उतरेगा
उनके मलबों में, घर तुम्हारे भी
ढूँढती भाई को नज़र कोई
सुन के सायरन, छिपेगी जा के कहाँ
एक हथगोले के बचे हिस्से
जा के किस पगतली पे फूटेंगे
तुम जिसे सोच कर परेशां हो
वैसे मंज़र वो रोज़ देखेगी
और पूछेगी तुमसे वो आँखें
क्यों तुम्हारी जुबां पे ताले हैं
तुम्हारे मेज़ पे बिछी दावत
चार परिवार का कलेवा हैं
अब तो कुछ शर्म आदमी कर ले
टैंक, हथियार, और हथगोले
नहीं करते ख़्याल बच्चों का
तुम ही अब कुछ करो
न अब चुप हो
नहीं ये आज वक्त चुप्पी का!
वक्त तुमसे हिसाब माँगेगा
लुटता बचपन जबाव माँगेगा!

सीले से आँगन में

चम्पा से सट-सट के महका-सा भीत
सीले से आँगन में बिखराया पीत
खेती पथारी से सौ दुनियादारी से
बाबा के डेंगु तक बा की बीमारी से
माँ को भी बिसराया बचपन का गीत।

सावन यों फूटा है देवा ज्यों रूठा है
पानी में तिरता-सा चम्पा का बूटा है
गांठों का मारा है राहत का फीत
निर्धन की थाली पे गेंहू की बाली पे
फैली हथेली सम चम्पा सवाली पे
अगहन मेहरबां ना, राजी है सीत।

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