ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
यूरोप में प्रवासी भारतीय समाज
01-Jan-2016 12:00 AM 3289     

आज यूरोप के कई देशों के महानगरों में विभिन्न देशों से लोग आकर बसे हैं। औद्योगिक क्रांति के पश्चात बीसवीं पूर्वार्ध तक लंदन, पेरिस, बर्लिन जैसे महानगर दूर-दूर के लोगों को अपनी और खींचने लगे थे, पर जैसा हाल 1940 के दशक के दौरान द्वितीय वि?ायुद्ध की समाप्ति के बाद बदला, उसने सारे वि?ा के जनसांख्यिकीय समीकरण बदलकर रख दिए। इसी दौर में भारत को भी ब्रिाटेन से स्वतंत्रता मिली और भारतीय भी अब रोज़गार और एक बेहतर जीवनशैली की तलाश में पहले से खुले तौर पर देशान्तरवास कर सकते थे। राजनैतिक कारणों से शीतयुद्ध के पहले पहले वर्षों में कुछ ऐसी आर्थिक व्यवस्था बनी कि पश्चिमी यूरोप ने बहुत जल्दी अपने आप को दोनों वि?ायुद्धों के घावों से उबारा और मात्र एक दशक में ही अपने आर्थिक विकास की गति को बनाए रखने के लिए बाहर से जन-बल को उन देशों में आकर काम करने का विकल्प रखा। बेहतर जीवनशैली के मोह ने बहुत से अयूरोपिय लोगों को पश्चिमी यूरोप में बसने को प्रेरित किया। इसी जन लहर में कई भारतीय भी बीसवीं सदी के दूसरे भाग से ही पश्चिमी यूरोप में पीढ़ी दर पीढ़ी बसने लगे। जो भारतीय पश्चिमी यूरोप में आज के समय में प्रवासी भारतीय समाज बनाते हैं वे मुख्यतः इसी प्रवर्ग के लोग है जो जैसे दो पीढ़ी पहले भारत या ब्रिाटिश उपनिवेशों से उत्प्रवास करके इन आर्थिक दृष्टि से समृद्ध देशों में बस गए थे। चूँकि इन लोगों को यहाँ कई साल हो चुके हैं, वे काफ़ी हद तक अपने इर्द-गिर्द वाले समाज में समाहित हो चुके हैं। इन देशों की नज़रों में भारतीय शाँतिप्रिय, शिष्ट, नियमों को मानने वाले, नए समाज की भाषा और संस्कृति से द्वंद न रखने वाले अपने कार्य में कुशल लोग बनकर उभरे हैं। पर भारत स्वयं इतना विविध और जटिल है कि भारतीयों की भी नए परिवेश में जाकर यह जटिल प्रकृति ही बनी रहती है कि वे चाहे नए देश में कितनी भी सहजता से रहते दिख जाएं पर कुछ अपने भारतीय मूल्यों को नहीं खोते। वे स्थानीय भाषा तो ज़रूर सीख लेते हैं पर अपनी भाषा और पृष्ठभूमि नहीं भूलते। इन शहरों में बसे भारतीय प्रतीयमानतः एक-दूसरे से काफ़ी जुड़े रहते हैं; कई मंदिरों-गुरद्वारों में इनका मिलना-जुलना रहता है। पश्चिमी यूरोप के कुछ देशों में बसी भारतीय जनसंख्या पर नज़र डाली जाए तो उपर्युक्त विषय के कुछ निश्चयक प्रमाण मिलते हैं। अंग्रेज़ी उपनिवेशीय शासन की आज यह सौगात मिली कि प्रवासी भारतीयों का एक बहुत बड़ा खण्ड अब इंगलैंड (लंदन, बर्मिंघम) में बसता है और अब वहाँ के सबसे बड़े अल्पसंख्यक हैं। मात्र लंदन में ही साढ़े पाँच लाख भारतीय हैं जो कि शहर की जनसंख्या का सात प्रतिशत है। लंदन के पश्चिमी हिस्से में बहुत से हिंदू मंदिर है। वहीं नेआस्डेन में श्री स्वामी नारायण मंदिर भी है जो पूरे यूरोप का सबसे बड़ा हिंदू मंदिर है। पास में ही दक्षिण-पश्चिम लंदन में साउथ हाल में (टोरोंटो और वैनक्यूवर, कनाडा के बाद) वि?ा में सिखों की सबसे अमीर आबादी यहीं रहती है। करीबन 500 सालों तक भारत के कुछ पश्चिमी तटीय क्षेत्रों को शासित करने के कारण पुर्तगाल का भी भारतीय इतिहास से संबंध अछेद्य है। 1961 में अंततः गोआ से पुर्तगालियों के पलायन के बाद उन क्षेत्रों से कई लोग पुर्तगाल जा बसे। आज लिस्बन और पोर्तो जैसे शहरों में कई गोआ, दमन और गुजरात के लगभग पौने लाख लोग रहते हैं। इसी बीच अगर हम इटली और ऑस्ट्रिया जैसे पश्चिम-मध्य के पर्वतीय देशों का उदाहरण लें, तो इन देशों में भी कई भारतीय पिछले 50 सालों में बसे हैं। पर इन दोनों देशों में मूल रूप से पिछले 2 से 3 पीढ़ियों से तो कृषि-व्यवसायों में भारतीय मूल के निवासी विशिष्ट रूप से पंजाब से आए लोगों ने बहुत तरक्की की है, पर 1990 के दशक से इन्होंने इन देशों के दुग्ध व्यापार में अतुलनीय योगदान दिया है। अब तो ऐसा भी कहा जाने लगा है कि उत्तरी इटली का दुग्ध-उद्योग पंजाबियों द्वारा संभाला जाता है। मिथिला फडके की टी.ओ.ए. की रिपोर्ट के अनुसार भारत से गए सिंह और बैंस कारीगरों ने उत्तरी इटली में स्थित पार्मिजानो में न केवल स्थानीय इतालवी कारीगरों की उपेक्षा की वजह से वहाँ ठप पड़ते दूध और पनीर के व्यवसाय को संभाला, बल्कि अपनी मेहनत से उसे फिर से वापिस उसकी ऊँचाईयों तक पहुँचाया। स्वयं इस शहर के मेयर ने भी 2011 में एक गुरद्वारे के उद्घाटन समारोह में स्वीकारा कि कैसे इन मेहमानों ने हमारी अर्थव्यवस्था को बचाया है। बेनेलक्स देशों में से बेल्जियम में बीसवीं सदी से कई भारतीय कारोबारी बसे हुए है। इनमें से सबसे मशहूर एन्टवर्प के हीरे के कारोबारी हैं जो गुजरात के सूरत के कारोबारियों के साथ संगत में काम करते हैं। कई इनमें से गुजरात के पालनपुर और राजस्थान के मारवाड़ से आकर बसे हैं। नई सदी के संदर्भ में भारतीय सॉफ़्टवेअर कंपनियाँ जैसे इन्फ़ोसिस, टीसीएस, एचसीएल की शाखाएँ राजधानी ब्राुसेल्स में हैं, जिस कारण कई भारतीय वहाँ नियुक्त होते हैं। जर्मनी का इस विषय में कोई उतना ऐतिहासिक संदर्भ नहीं रहा है, पर यूरोपीय संघ की सबसे मज़बूत अर्थव्यवस्था होने के और 1990 में जर्मन पुनरेकीकरण से यूरोप में राजनैतिक और आर्थिक बदलावों के कारण पिछले 20 सालों में भारत से नई योग्यता वाले पढ़े-लिखे नौजवानों जैसे सॉफ़्टवेअर इंजीनियर आदि को यह देश बहुत रास आया है, जिसके लिए जर्मनी प्रसिद्ध भी है। बहुत-सी जर्मन बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ भारत के पुणे शहर से व्यापार करती हैं और अक्सर अफ़सरों को पश्चिम जर्मनी के शहरों जैसे कोलोन, मानहाइम और फ़्रैंकफ़र्ट भेजा जाता है, जिस कारण इन शहरों में काफ़ी मराठी भाषी भारतीय रहते हैं। स्पेन में भी एक छोटी संख्या में सिंधी व्यापारी जो द्वितीय वि?ायुद्ध के बाद उत्तरी अफ्रीका से आकर बसे हुए हैं और वैसे तो स्पेनिश समाज का बस 0.07 प्र.श. हिस्सा ही बनते हैं, जो मुख्यतः स्पेन के भूमध्य सागर में स्थित मालोर्का द्वीप में रहते हैं। आज बाकी यूरोप की ही तरह उन्होंने स्पेनिश सरकार और लोगों में अपनी अच्छी साख बनाए हुए रखी है कि वे अपने काम से मतलब रखते है, राजनैतिक और सामाजिक असंतुलन नहीं पैदा करते, शांतिप्रिय और मेहनती होते हैं।

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