ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
हां, बच्चों को छुट्टियां दें और सचमुच छुट्टी की तरह दें!
01-Aug-2019 03:52 AM 188     

विगत माह मध्यप्रदेश विधानसभा में सर्वानुमति से जो पारित हुआ, वह था तो अशासकीय संकल्प पर वास्तव में इसे लोक संकल्प होना चाहिए। राज्य सरकार को भी इसे खानापूर्ति न मानकर इस पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। क्योंकि इस संकल्प के माध्यम से कांग्रेस विधायक संजय यादव ने बच्चों की एक बुनियादी समस्या की ओर। प्रदेश का ध्यान आकर्षित किया है। इसके माध्यम से बच्चों को उनका बचपन लौटाने का आग्रह किया है। उम्मीद की जानी चाहिए कि इस अशासकीय संकल्प की महत्ता केवल पारित संकल्पों की फाइल मोटी करने से कहीं ज्यादा राजनीतिक, सामाजिक और प्रशासनिक स्तर पर पुनर्विचार की पहल के रूप में सिद्ध होगी। यादव जबलपुर के बरगी से विधायक हैं। उन्होंने सदन में अशासकीय संकल्प रखा कि प्रदेश के स्कूलों में दशहरा, दीपावली एवं होली जैसे त्यौहारों पर दी जाने छुट्टियों में बढ़ोतरी की जाए साथ ही स्कूलों में छुट्टियों के बाद तुरंत कोई परीक्षा न ली जाए।
देश में स्कूली शिक्षा को लेकर बहुत प्रयोग होते रहे हैं। होते भी रहना चाहिए, लेकिन जिन बच्चों के लिए यह शिक्षा है, वह उनसे उनका बचपन न छीने, इसका भान रखना बेहद जरूरी है। अच्छा हुआ कि सदन ने इसे सर्वानुमति से पारित किया। इसका अर्थ यही है कि सभी सदस्य इस संकल्प की भावना से सहमत हैं। इनमें वो भी हैं, जिनकी उम्र चालीस से ज्यादा है और वो भी हैं, जो चालीस के भीतर हैं। उम्र का यह विभाजन इसलिए कि चालीस से ऊपर वालों को अपनी स्कूली जिंदगी के वो दिन जरूर याद आ गए होंगे, जब स्कूलों में छुट्टियों का मतलब वाकई छुट्टी ही होता था। दिवाली-दशहरे की 21 दिन और गर्मियों की दो माह की भरपूर छुट्टियां और बिना सिर पर लटकी किसी तलवार के होती थीं। तब त्यौहार का मतलब त्यौहार ही होता था। दशहरा-दीपावली और गर्मियों की छुट्टियों का शिद्दत से इंतजार होता था। बच्चे इन छुट्टियों को जी-भर कर जीते थे। न पढ़ाई का दबाव, न कोचिंग कल्चर का कोई कीड़ा, न ही कॅरियर को लेकर कोई हड़बड़ी। न ही "क्रिएटिव" होने का कोई कृत्रिम आग्रह। अभिभावक भी अमूमन बच्चों की छुट्टियों के आड़े नहीं आते थे। छुट्टी है, जिसे जो करना करो। कुछ स्कूलों में थोड़ा बहुत होम वर्क दिया जाता था, लेकिन उसे भी समय पर पूरा करने का कोई टेरर नहीं था। कई बच्चे छुट्टियों में अपने ननिहाल चले जाते। वहां भी जिंदगी मौज-मजे की होती। न स्कूल टीचरों का प्रेशर होता और न ही मांएं होम वर्क को लेकर बच्चों को डांटती-पुचकारतीं। संक्षेप में कहें तो छुट्टियां बच्चों के लिए पूरा स्पेस लेकर आतीं। पढ़ना हो पढ़ो। गुनना है गुनो। खेलना है खेलो। सीखना है सीखो। खाना है खाओ। सपनो में जीना है तो सपनो में जियो। जीभर के हंसना है, जी भर के हंसो। छुट्टियां लंबी होने से नाते-रिश्ते और परिचितों के यहां बच्चों को जाने का मौका मिलता था। इससे सामाजिक रिश्ते मजबूत होते थे। बच्चों में शेयरिंग की भावना बढ़ती थी। उन्हें आत्म केन्द्रित होने से रोकती थी।
दिवाली-दशहरे की छुट्टियों का मुख्य एजेंडा यही होता था कि त्यौहार पूरी मस्ती, आस्था और रचनात्मकता के साथ कैसे मनाएं। होली के रंगों में बोर्ड परीक्षाओं का टेंशन घुल जाता था। यानी छुट्टियां अपने साथ राहत और आनंद लेकर आती थीं। लेकिन जब से देश में दस धन दो शिक्षा प्रणाली और नया शिक्षा सत्र परीक्षा के तुरंत बाद शुरू करने का चलन शुरू हुआ है, तब से बच्चों से "छुट्टियों का आनंद" छिन-सा गया है। बेरहम प्रतिस्पद्र्धा और कॅरियरवाद ने छुट्टियों को भी इस तरह "क्रिएटिविटी" में बदला है कि उससे व्यस्तता तो बहुत बढ़ गई है, लेकिन बालपन से उन्मुक्तता की फाइल भी डिलीट हो गई है। छुट्टियां अब बच्चों और उनके मांं-बाप का और तनाव बढ़ाती हैं। कोचिंग, प्रिपरेशन और पर्सनालिटी डेवलपमेंट जैसे भारी-भरकम शब्दों ने बचपन को बुरी तरह घेर लिया है। अमूमन हर अभिभावक और बच्चा आजकल छुट्टियों में वह किस तरह व्यस्त रहेगा, इसकी एडवांस प्लानिंग में उलझे रहते हैं। पूरी कोशिश होती है कि स्कूल की क्लास से निकलते ही बच्चा किसी और दूसरी क्लास के पिंजरे में अटका दिखे। बच्चे के पास निस्वार्थ और मासूमियत के साथ हंसने, खिलखिलाने और रोने का वक्त भी नहीं बचा है। कॅरियर की अंधी दौड़ में कुछ बच्चे तो उस पार निकल जाते हैं, लेकिन औसत प्रतिभा के बहुत सारे बच्चे तनाव और एकाकीपन का शिकार होने लगते हैं। ऊपर से संचार और मनोरंजन के नए नए साधनों ने उनकी सामाजिकता और लोक व्यवहार को हाशिए में ढकेल दिया है। मोबाइल फोन और इंटरनेट बच्चों को समय से पहले ही वयस्क बना रहे हैं तो छुट्टियों का बिजी शेड्यूल उन्हें खुद से बाहर निकलने का स्पेस शायद ही दे रहा है।
यहां तर्क दिया जा सकता है कि हर पीढ़ी का अपना बचपन होता है। हर बचपन अपने समय के हिसाब से जीता है। हमें हमारा बचपन यादगार लगता है तो आज के बच्चों को उनका बचपन भी शायद इसी तरह याद आएगा। आज के बच्चे अपने बचपन को कितना सुखकर मानते हैं, यह तो वो ही बता सकते हैं, लेकिन जो वो जी रहे हैं, क्या वो सचमुच बचपन है या केवल वयस्क होने की रिहर्सल है? क्योंकि अब छुट्टियों का मतलब लंच ब्रेक से ज्यादा नहीं है। वो एक क्लास की परीक्षा देते हैं और नतीजा आते ही अगली क्लास में जा बैठते हैं।
बीती क्लास की स्मृतियों को एन्ज्वॉय करने और साल भर के सबक धुंधलाने से पहले ही नई इबारत लिखने का सिलसिला शुरू हो जाता है। मानो बच्चा, बच्चा न होकर कोई सिपाही हो, जिसकी पीठ पर एक भारी भरकम बस्ता, गले में लटकी तख्ती और पानी की बॉटल तथा चेहरे पर बेचैनी हो। स्कूल बस या ऑटो का इंतजार करते हुए वह हर दिन की शुरूआत इसी तनाव के साथ करता है और घर लौटते वक्त भी उसके चेहरे पर स्कूल की छुट्टी के निर्मल आनंद के जेल से बाहर आने की राहत का भाव तैरता दिखता है।
संजय यादव के अशासकीय संकल्प पर सरकार कोई कदम उठाएगी या नहीं, कहना मुश्किल है। लेकिन वह ऐसा करेगी तो स्कूली बच्चों पर रहम ही होगा। बच्चों को छुट्टियां दें और खूब दें। उनके कोमल मन को उड़ने, पसरने और खिलने दें। प्रायोजित कोचिंग, कैम्प आदि कल्चर में उलझाने के बजाए मुक्त भाव से जीने दें। छुट्टी का मतलब छुट्टी हो। जो करना है करो, जैसे करना हो करो ताकि बच्चे असल जिंदगी के और करीब आ सकें। ऐसा हो सका तो यह अशासकीय संकल्प बच्चों को उनका बचपन लौटाने का सार्थक विकल्प बनेगा।

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