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ये हंगामा ऐ ख़ुदा क्या है
01-Nov-2017 03:43 PM 2036     

एक ज़माने में इंग्लैंड का चर्च वहां के राजा से भी ज़्याद शक्तिशाली हुआ करता था। इतना ज़्यादा कि 1936 में एडवर्ड आठ को अपनी पसंद की लड़की (वालिस सिम्पसन) से शादी करने के लिये ताज-ओ-तख्त छोड़ना पड़ा। हाँ साहेब, हमारी खाप पंचायत से भी अधिक ख़तरनाक था चर्च। हम कोई ख़लील मियां की तरह फ़ाख़्ता उड़ाने वाली बात नहीं कर रहे हैं - बाक़ायदा इतिहास में लिखी बात बयान कर रहे हैं। यक़ीन ना हो तो डैन ब्राउन की डा विन्ची कोड या एंजेल्स एंड डेमोन्स उठा कर पढ़ लीजिये - किस प्रकार नाइट टेम्पलर्स का क़त्ल-ए-आम उस ज़माने के चर्च ने करवाया था। भला हो मार्टिन लूथर का जिसने कैथोलिक चर्च से विद्रोह करके उसके टुकड़े कर डाले। ये विभाजन हमारे हिन्दुस्तान-पाकिस्तान के विभाजन से कम भयानक नहीं था। चर्च का हिटलरपना ख़त्म होते ही वहां की स्त्रियों में जागरूकता आ गयी और उनकी नस्ल सुधर गयी। उनका तो भला हो गया लेकिन अपने देश में आज भी "सम्मान हत्या "(ऑनर किलिंग) प्रचलित है। कमाल है साहब, यूँ तो धर्म और समाज हमें अहिंसा तथा प्रेम का पाठ पढ़ाते हैं किन्तु मौक़ा मिलते ही प्रेम का गला घोट देते हैं।
एक ओर तो हमारी खाप पंचायत, हिंदुत्व के ठेकेदार और मुल्ला-मौलवियों ने औरतों का जीना मुश्किल कर रखा है; दूसरी ओर इन्हीं लोगों ने औरतों का शोषण करने में कोई कसर नहीं छोड़ी (सचमुच में ले लीना दुपट्टा मेरा)। देवबंद के मौलवी हों या हिन्दू बाबा लोग, सबकी नज़र औरतों पर रहती है या कपड़ों के पार। औरतों को बुर्क़े या घूँघट में रखने की बजाय इन (अ)धर्मी लोगों की आँखों पर पट्टी बांध देनी चाहिये। देखिये जैन मुनियों का एक वर्ग नाक पर कपड़ा बांध कर रहता है (या रहता था) ताकि कीट-कीटाणु उनके अंदर ना चले जायें और उनका शाकाहारी धर्म भ्रष्ट ना हो जाये। तो फिर नारी को पाप का द्वार बताने वाले साधू और मुल्लाओं को भी आंख बंद करके रहना चाहिये।
ख़ैर! थोड़ी संजीदगी पर आते हैं। हमारे हिसाब से धर्म का अपना एक विशेष स्थान है और उसे वहीं रहना चाहिये। ये सियासत में दखलंदाज़ी न तो मज़हब की सेहत के लिये अच्छी है न ही हम जैसे आम आदमियों के स्वास्थ्य के लिये और भैये राजनेताओं की सेहत के लिये तो बिलकुल भी नहीं। नेताओं को सिर्फ राजसिक भोजन तथा राजसिक वस्तुओं से सरोकार रखना चाहिये, बाकि सभी सात्विक एवं तामसिक वस्तुओं से परहेज रखना चाहिये। पूछो क्यों? क्योंकि सात्विक वस्तु केवल साधु प्रवृति के व्यक्तियों के लिये होती है। नेता तो सात्विक हो ही नहीं सकते (वरना नेता थोड़े ही होते) और तामसिक से गुरेज़ इसलिये कि वे पहले से ही इस क़दर तामसिक होते हैं कि इससे ज़्यादा बुरा होना उन्हें रास नहीं आयेगा। बस यहीं तो मात खा गया हिंदुस्तान। हम भी क्या नेताओं को पाठ पढ़ाने लगे। अरे वो तो सारी दुनिया को पाठ पढ़ाते हैं (भले ही ख़ुद काला अक्षर भैंस बराबर हों) दरअसल यह पाठ तो हमें धर्म के ठेकेदारों को पढ़ाना है। धृष्टता के लिये क्षमा करना गुरुदेवों! क्या है कि कभी नाव पानी में तो कभी पानी नाव में --- जग की रीत सदा चली आयी... खैर जाने दो ये दोहे और चौपाइयां फिर कभी।
देखिये राहुल बाबा के ऊपर ना तो पढ़े लिखे होने का इलज़ाम है ना ही अक़्लमंद होने का (भैये स्मृति ईरानी पास डिग्री हो ना हो अक़्ल है), लेकिन वे युवराज हैं अतः राज सिंहासन पर हक़ पूरा है। कर्नाटक के एक विधायक श्रीश्री शिवमूर्ति नायक (जो मंत्री भी नहीं हैं), खुद को राजा समझते हैं और एक टॉप के सरकारी अधिकारी को "हुक्म" देते हैं कि उनके बेटे को खदान का लाइसेंस दो -- सब क़ानूनी कार्यवाही नज़रअंदाज़ करके। क्या बात है ज़िल्ले इलाही! अगर ये पटवीजने अपनी सत्ता की चमक को सूरज की तमाज़म समझते हैं तो भाईजान वहां कोई धार्मिक बाबा आ गया तो ना केवल सत्ता की ठसक दिखायेगा, बल्कि श्राप देने की धमकी भी देगा। योगी आदित्यनाथ को ही देख लो! उनके मुख्यमंत्री होने का दबदबा अपनी जगह लेकिन उनके "योगो" होने का प्रभाव जनता पर अधिक पड़ता है। यह और बात है कि मोह भंग होते देर नहीं लगती। हुज़ूरेवाला!
हम ज़रा दुविधा में थे जब योगी, अचानक मठाधीश बनने के स्थान पर मुख्यमंत्री बन गये (जनाब, मोदी को आदत है चौकाने की)। लेकिन जब उनके भाषण सुने और उनकी प्रारंभिक कार्यप्रणाली देखी तो तसल्ली हुयी कि चलो एक योगी तो कुछ काम का निकला। मगर जैसा कि हमने पहले ही कहा था - मोहभंग होते देर नहीं लगती। देखिये इस तर्क-ए-ग़लतफहमी का नज़ारा - अब मोदी की तरह योगी भी सिंगल हैं - रेडी टु मिंगल (द्धड्ढठ्ठड्डन्र् द्यदृ थ्र्त्दढ़थ्ड्ढ) भी नहीं। ना आगे कोई, ना कोई पीछे कोई। इसलिये भ्रष्टाचार का आरोप तो उन पर लग नहीं सकता किन्तु शासन में अक्षम होने का दोष तो मढ़ा जा सकता है। एक पढ़ाकू विद्यार्थी अच्छा खिलाड़ी भी हो ये ज़रूरी तो नहीं। एक साइकल चैंपियन जेट विमान भी उड़ाने में सक्षम हो ये ज़रूरी तो नहीं। इसी प्रकार, साहबान, सीधा सादा सन्यासी अच्छा शासक हो ये बिलकुल भी ज़रूरी नहीं। तो भैया अपने-अपने क्षेत्र में महारथ हासिल करो - जिसका काम उसी को साजे। सुनार को लुहार (या उल्टा) का काम सौंप दिया तो, भाई, अल्लाह मालिक है। इन कुंवारे ब्रह्मचारियों(?) की बात करें तो भाइयों और बहनों, जो अपना वंश नहीं चला सकते, वो देश कैसे चलायेंगे? इससे पहले कि भगवा-ब्रिगेड या बजरंग दल के बंदर हम पर प्रहार करें हम बता दें कि चाणक्य से किसी ने पूछा कि "गुरुदेव! आप विक्रमादित्य को राजपाट क्यों देते हैं, स्वयं राजा क्यों नहीं बन जाते?" तब चाणक्य ने कहा कि "मैं एक योगी हूँ। राजा को घर गृहस्थी वाला होना चाहिये ताकि वह प्रजा के दुःख-दर्द को समझ सके।" एकदम सही जवाब। जी हाँ केवल दुःख-दर्द ही नहीं, जनता की शारीरिक और मानसिक आवश्यकताओं को भी मद्देनज़र रखा जाये। सिर्फ रोटी, पानी, कपड़ा और मकान काफी नहीं होता। आलीशान बगीचे, शानदार इमारतें, मंदिर, मस्जिद, इत्यादि देश के मानसिक स्वास्थ्य के लिये परम् आवश्यक हैं। इसलिये ये मज़हबी क़िस्म के लोग - ऋषि, मुनि, मुल्ला, मौलवी, ज़ाहिद, वगैहरा अगर घर-गृहस्थी से दूर रहते हैं तो इन्हें सियासत, ख़ासकर शासन से भी दूर रहना चाहिये। अब देखो, बैठे बिठाये योगी महाराज ने ताज को बेताज कर दिया। सिर्फ इसलिये कि उसका निर्माण शाहजहां (एक मुसलमान) ने किया था। क्यों भाई गुलाब हिन्दू उगाये या मुस्लमान, कुछ फ़र्क़ पड़ता है क्या? ताज की ख़ूबसूरती पर ऐतराज़ कोई आँख का अँधा ही सकता है। बक़ौल आतश के -
कुफ्र-ओ-इस्लाम की कुछ क़ैद नहीं है आतश
शैख़ हो या कि बरहमन हो, पर इंसां होवै
इंसानियत का भाषण सबसे ज़्यादा धर्म के ठेकेदार देते हैं और मौका मिलते ही वे ही इंसानियत का चोगा सबसे पहले उतार देते हैं। मोदी ने आते ही "अति विशिष्ट व्यक्ति" सभ्यता को समाप्त करने की मुहिम चलायी। लाल बत्ती का चलन ख़त्म कर दिया। कांग्रेस की अफसरशाही से हैरान परेशान जनता खुश हो गयी। शनैः-शनैः पता चला कि लाल बत्ती गयी भाड़ में, ये नेता लोग तो "अतिशय विशिष्ट व्यक्ति" हैं। उमा भारती ट्रेन रुकवा देती हैं यह कहकर कि "हमारी प्रतीक्षा करो (हम लंकेश हैं)।" वैसे ही हिंदुस्तान की रेलें वक़्त पर नहीं आतीं, नेता उन पर सवारी करें तो और कोढ़ में खाज। यूपी में सत्तर बच्चे मर जाते हैं और योगी उसकी ज़िम्मेदारी भी नहीं लेते। और तो और योगीराज ने एक शर्मनाक विज्ञप्ति निकाल दी कि जब-जब वे तथा अन्य नेता लोग दौरे पर आयें तो सब क्ष्ॠच् और क्ष्घ्च् अफ़सर खड़े होकर उनका स्वागत करेंगे, उन्हें जलपान पेश करेंगे और उन्हें विदा करने उनकी गाड़ी तक जायेंगे। तालियां! नेता ना हुये ज़िल्ले सुब्हानी हो गये। क्यों गुरुदेव "विशिष्ट व्यक्ति" का मामला क्या लाल बत्ती के साथ ही ख़त्म हो गया? वोट मांगते वक़्त तो आप जनता सेवक होते हैं और सत्ता में आते ही जनता आपकी नौकर जाती है? भाजपा ही नहीं, कर्नाटक के अदने से विधायक शिवमूर्ति नायक ने तो बाक़ायदा एलान कर दिया कि वे सरकार हैं और हुक्म देते हैं कि उनके सुपुत्र को खदान का लाइसेंस सब नियम क़ानून तोड़ कर अता किया जाये। योगी तथा बाक़ी नेता घर से नाश्ता करके नहीं आते? मोदी ने कहा था "ना खाऊंगा ना खाने दूंगा" और उनके मंत्री खुले आम खाने की बात कर रहे हैं। इससे भी ज़्यादा उद्दंडता तो राजस्थान की वसुंधरा राजे ने कर दी। बकौल उनके कोई व्यक्ति या पत्रकार जजों एवं सरकारी अफसरों पर न ऊँगली उठायेगा न ही उनके विरुद्ध कार्यवाही करेगा। मतलब ये कि उन्हें खुली छूट है खाने की भी खिलाने की भी।
भई ताज की बात चली तो हमें ताजपोशी याद आ गयी। सुना है राहुल बाबा गद्दीनशीन होने वाले हैं। अरे यार वो तो पहले से ही बेताज के बादशाह हैं। वे सिंहासन पर बैठें या खटोले पर क्या फ़र्क़ पड़ता है। साहबान! हम जनता जनार्दन हैं - हर पार्टी पर नज़र रखते हैं। हिन्दुओं की धर्मान्धता पर हमें ऐतराज़ है तो मुसलमानों की कट्टरवादिता से भी हम इत्तेफ़ाक़ नहीं रखते। इस्लाम कितना महान है, कितना शांतिप्रिय है तथा औरतों की कितनी इज़्ज़त करता है, हम सब जानते हैं। उस मुद्दे पर बहस अगली बार। सियासत तो वैसे भी कोई पाक साफ़ चीज़ तो है नहीं ऊपर से उसमें अगर धर्म का कचरा मिला दिया तो करेला और नीम चढ़ा वाली मिसाल हो जायेगी। समझ में ये नहीं आता कि जब भगवान या अल्लाह एक है और हर जगह है तो उस पर झगड़ा किस बात का? भैये चाचा ग़ालिब से सबक़ लो -
जबकि तुझ बिन नहीं कोई मौजूद
फिर ये हंगामा ऐ ख़ुदा क्या है।

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