ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
यायावर शिल्पी - पण्डित बनारसीदास चतुर्वेदी
01-Dec-2018 06:29 PM 1044     

पण्डित बनारसी दास चतुर्वेदी 20वीं सदी की शुरूआत में भारत के उन लोगों में से एक हैं जो स्वतंत्रता संग्राम को प्रारंभ होता देख रहे थे और उसके समानांतर स्वतंत्र हिंदी पत्रकारिता की चिंता भी उन्हें थी। वे अकेले पत्रकार नहीं थे, उन्हें पत्रकारिता को साहित्य से जोड़े रखने की कला भी आती थी। उन्हें यह भी चिंता थी कि जो भारतीय दूसरे देशों में प्रवास कर गये हैं उनके जीवन के बारे में कैसे जाना जाये। वे अपने समय में स्वतंत्रता संग्राम को इस तरह परख रहे थे कि हमारा देश संग्राम में हुए शहीदों का श्राद्धपूर्वक श्राद्ध कैसे करेगा। उन्हें अपने समय के साहित्य सेवियों की कीर्ति रक्षा की भी गहरी चिंता थी। कहने का आशय यह कि पण्डित बनारसीदास चतुर्वेदी को यदि हम एक "सेतु-पुरुष" की संज्ञा दें तो अतिश्योक्ति नहीं होनी चाहिये। पत्र व्यवहार उनका शौक था। वे इसके बिना शायद जिये ही नहीं और भारत में वे एक बड़े पत्र संग्रहकर्ता के रूप में जाने गये। उनका पत्र व्यवहार अपने समय के अनेक प्रतिष्ठित विभूतियों से रहा।
वे आज़ादी के पूर्व के जिन व्यक्तित्ववान लोगों के सम्पर्क में आये उनमें महात्मा गांधी, दीनबंधु सी.एफ. एंड्यूज, गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर, क्षितिमोहन सेन, काका साहब कालेलकर, धर्मानंद कौसाम्बी, सुभाषचंद्र बोस, पण्डित हजारी प्रसाद द्विवेदी, गणेश शंकर विद्यार्थी, राजेंद्र प्रसाद और पुरुषोत्तम दास टंडन आदि प्रमुख हैं। चतुर्वेदी जी के हमउम्र साहित्यकारों में माखनलाल चतुर्वेदी, मुंशी अजमेरी, रामनरेश त्रिपाठी, शिवपूजन सहाय, रामवृक्ष बेनीपुरी, वासुदेव शरण अग्रवाल और किशोरी दास वाजपेयी जैसे लोग रहे हैं। वे दलगत राजनीति में कभी नहीं रहे। उन्हें पंडित जवाहरलाल नेहरू के जमाने में राज्यसभा की सदस्यता भी दी गई थी पर उनका सदन में जाने से मन ऊबता था।
चतुर्वेदी जी को कलकत्ते से निकलने वाले "विशाल भारत" अखबार के सम्पादक के रूप में भी जाना जाता है। जिसे बाद में हिंदी के आधुनिक कवि सच्चिदानंद वात्स्यायन "अज्ञेय" ने भी सम्हाला। "विशाल भारत" में वे साम्प्रदायिकता, जातीय विद्वेष, प्रांतीयता और ऊंच-नीच के खिलाफ लिखा करते थे। उनको भारत सरकार ने पद्मभूषण से अलंकृत किया और देश के अनेक विश्वविद्यालयों ने डॉक्टरेट की मानद उपाधियाँ भी दीं, पर वे विनम्रतापूर्वक अपने बारे में कहा करते थे कि मैं इनता बड़ा कभी नहीं रहा। यह ज़रूर है कि मैं जीवनभर एक मिशनरी पत्रकार रहा।
पत्रकारिता के बारे में चतुर्वेदी जी हमेशा यह सीख देते रहे कि अगर किसी को पत्रकारिता के क्षेत्र का विशेषज्ञ बनना है तो एक सर्वोत्तम उपाय यह है कि वह सीधे लोक से साक्षात्कार करे और उसमें रहने वाले प्रभावी और ज्ञानवान व्यक्तियों से ही अपना संपर्क बनाये। उनका मानना था कि पत्रकारिता जितनी स्थानीय है उतनी ही अंतरराष्ट्रीय भी है। इस बदलती हुई दुनिया में कोई पत्रकार केवल स्थानीय होकर नहीं रह सकता क्योंकि हर स्थान पर अंतराष्ट्रीयता का दवाब है। उन्हें चिंता थी कि पत्रकार सामाजिक, आर्थिक व्यवस्था आदि का तो नोटिस लिया करते हैं पर अखबारों में बच्चों के लिये जगह अक्सर नहीं होती जो कि बच्चों का अधिकार है। उन्होंने एक बात को और रेखांकित किया कि पत्रकारों को विज्ञापित दुनिया के घेरों में नहीं फँसना चाहिये। उन्हें समाज के प्रति सामंजस्यपूर्ण होना चाहिये। उन्होंने रूस सहित दुनिया के अनेक देशों की यात्राएँ कीं।
पण्डित बनारसी दास चतुर्वेदी पूरे जीवनभर इसी विश्वास को लेकर जीते रहे कि देश के संदर्भ में व्यक्ति का महत्व नहीं होता। अंततः देश ही बड़ा है। उन्हें स्वतंत्रता संग्राम के दिनों से यह चिंता बनी रहती थी कि अल्पसंख्यक आरक्षण और अलगाव की प्रवृत्तियाँ एक नयी तरह की साम्प्रदायिकता को बढ़ावा देती हैं और इनकी जड़ों में देश का पतन छिपा रहता है। देशरूपी वृक्ष सूखता रहता है और उसके मुरझा जाने के खतरे बने रहते हैं। वे हमेशा कहते रहे कि हम शिक्षा पर बल दें और आरक्षण के नाम पर अल्पमति व्यक्तियों को देश के निर्माण में भागीदार न बनायें, बल्कि वे इससे आगे बढ़कर यह सुझाव देते हैं कि हम आर्थिक, सामाजिक रूप से पिछड़े हुए प्रत्येक व्यक्ति को इस तरह की सहायता पहुँचा सकें कि वह निर्भीक होकर अपनी रक्षा कर सके और देश का निर्माता भी बन सके। उन्हें चिंता थी कि भारत के कर्ताधर्ता निजहित में इतने लीन होते जा रहे हैं कि उन्हें राष्ट्रहित बौना दिखाई देने लगा है। यही कारण है कि देश में समस्याएँ ज्यों की त्यों हैं पर उन्माद और असंतोष बढ़ता जा रहा है।
अगर राष्ट्रकवि रामधारी सिंह "दिनकर" के शब्दों में उनका रेखाचित्र बनायें तो कह सकते हैं कि चतुर्वेदी जी का व्यक्तित्व निश्छल हृदय, शालीन व्यवहार और करुणा से भरा था। वे अपनी देह से कहीं भी रहते हों अपने मन से हमेशा ऊँचे धरातल पर ही वे जीते रहे। गोर्की और टॉलस्टाय, थोरो इम्र्सन, रोम्याँ रोला, गांधी और रवींद्रनाथ टैगोर उनके आराध्य रहे। दिनकर जी उन्हें एक तरह का अराजकतावादी भी मानते हैं, पर चतुर्वेदी जी का यह अराजकतावाद उनके प्रेम के विस्तार में फलित होता है। शायद यही उनके जीवन का फल रहा है। उनका आचरण तो अराजक है पर वे विरोधी किसी के नहीं हैं।
पण्डित चतुर्वेदी जी का संबंध बुंदेलखण्ड की माटी से भी है। जन्मे तो वे फिरोजाबाद में थे पर उन्हें वीरसिंह जू देव के आमंत्रण पर लगभग डेढ़ दशक कुण्डेश्वर में रहे। एक तरह से कहें तो उनका जीवन अपने ही देश में प्रवासियों जैसे रहा है। वे घूमते बहुत थे और इतना घूमे कि फीजी तक चले गये और तोताराम सनाढ्य की आत्मकथा से भारत के लोगों का परिचय करवाया। यह कथा उन मजबूर भारतीयों के दुख की कथा है जिन्हें अँगरेज छल से पानी के जहाजों में ठूँस-ठूँस कर दूसरे देशों में ले जाते थे। चतुर्वेदी जी ने उन प्रवासियों के अतीत से नये भारत को जोड़ा जिन्होंने गुलामी के दिनों में अनेक कष्ट उठाकर अपना जीवन जिया।
यह बात गहराई से विचार करने की है कि चतुर्वेदी जी ने हिंदी और प्रवासियों के अंतर्संबंध को बनाये रखने का जो सपना तथा जीवंत वैचारिक आदान-प्रदान की जो आशा की थी वह आज के समय में पूरी होती दिखाई नहीं दे रही है। अक्सर अनुभव में आता है कि प्रवासी भारतीयों द्वारा रचे गये साहित्य में कम लोग ऐसे हैं जो हिंदी की रचनात्मकता का स्पर्श कर पाते हैं। इसी तरह भारत के हिंदीसेवी और प्रवासी भारतीयों के बीच का संबंध मात्र कुछ हिंदीभाषी द्वीपों की पर्यटन यात्रा तक सिमटा है। इस पर्यटन यात्रा में हिंदी भाषा और उसकी साहित्यिक संस्कृति का विचार हर बार पीछे छूटता रहा है। केवल कुछ हिंदीसेवी कर्मचारियों, व्यापारियों और कुछ इने-गिने साहित्यकारों को दल में शामिल करके हिंदी के नाम पर प्रवास करने की जो आदत पड़ गई है उससे धन और समय का ही अपव्यय होता है। यह रेखांकित करना इसलिये भी जरूरी है हमें इस व्यवस्था में कोई ऐसा रचनात्मक सुधार ज़रूर कर लेना चाहिये कि भारतीयों और प्रवासियों के बीच हिंदी की गहराई का पता चलने लगे। अभी तो केवल यही हो रहा है कि एक "प्रवासी साहित्य" नाम का शब्द चल निकला है, जिसका कोई गहरा साहित्यिक योगदान दिखाई नहीं पड़ता। यह एक अजीब-सी शब्द परम्परा चल निकली है जो दुनिया की और दूसरी भाषाओं में शायद ही कहीं प्रवासियों के बीच प्रचलित हो।
भारत वर्ष में हिंदी भवनों की श्रृंखला को प्रस्तावित करने वाले भी चतुर्वेदी जी ही थे। उनका मानना था कि भारत के हर प्रदेश में हिंदी भवन बने। इसके जरिये वे उन हिंदी सेवियों की पहचान करते रहे जो दूसरी भारतीय भाषाओं से आते रहे और हिंदी में व्यवहार करते रहे। यह परम्परा भले ही अब छोटे रूप में ही सही पर भारत के प्रत्येक राज्य के हिंदी भवनों में अभी भी कायम है जो आज भी चतुर्वेदी जी के इस प्रयत्न का स्मरण कराती रहती है।
"गर्भनाल न्यास" पण्डित बनारसीदास चतुर्वेदी को उनके 126वें जन्म दिवस पर स्मरण करते हुए गौरव का अनुभव करता है।

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