ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
लेखन मैं को काको गुसैयां
01-Sep-2019 09:58 PM 163      इसमें कोई संदेह नहीं कि हिंदी एक विशाल क्षेत्र की भाषा है और 10 राज्यों की आधिकारिक भाषा है। इससे कहीं अधिक आबादी इसका दैनिक व्यवहार करती है। सुदूर हिमाचल प्रदेश से लेकर महाराष्ट्र की सीमा तक और पाकिस्तान की सीमा से लगे राजस्थान से लेकर बंगाल तक हिंदीभाषी फैले हुए हैं, परंतु जब साहित्य की बात आती है तो उसके प्रतिनिधि हमें कहां से मिलते हैं? आप याद करके देखिए राजस्थान के कितने साहित्यकारों के नाम आपको याद आते हैं या फिर हिमाचल प्रदेश से कितने नाम छूटते ही आप बता सकते हैं? झारखंड के कितने साहित्यकारों से आप परिचित हैं? अगर ये सारे क्षेत्र हिंदीभाषी हैं तो फिर इनके साहित्यकार हिंदी दुनिया में क्यों नहीं नजर आते और इसका परिणाम क्या होता है? लेखकों की दृष्टि से हिंदी एक बहुत ही छोटे क्षेत्र तक केंद्रित होकर रह गई और उसमें भी समाज के सभी वर्गों के प्रतिनिधि की बजाए कुछ मुट्ठीभर लोग ही लेखक बनकर सामने आ पाए। यहां हम स्पष्ट रूप से जाति, धर्म, क्षेत्र और आर्थिक स्तर का विभाजन भी देख सकते हैं। लंबे समय तक पूरे समाज की बजाय मुट्ठीभर कायस्थ, राजपूत और ब्राह्मण ही मुख्यधारा के रचनाकार बन पाए। हिन्दी के आधुनिक काल की शुरुआत यानी 1850 से लेकर 1950 तक के बड़े लेखकों पर नजर डालें तो बनारस या उसके आसपास के क्षेत्र तक से जुड़े (मूलत: भोजपुरी क्षेत्र के) साहित्यकार हैं। सवाल उठता है कि 1850 से 1950 के 100 वर्षों में जब हिंदी पल्लवित-पुष्पित-फलित हो रही थी तब कितनी स्त्रियां सामने आती हैं, कितने मुसलमान लेखक आते हैं, तथाकथित छोटी जातियों के कितने लोग आते हैं। और नहीं आते हैं तो इसकी जिम्मेदारी किस पर आती है। स्पष्ट है कि अगर करोड़ों लोगों की भाषा में केवल मुट्ठी भर लोग ही हिंदी की तरफ देखेंगे तो उसका विकास भी वैसा ही होगा जैसा कि हुआ। अक्सर हिंदी भाषा और साहित्य केंद्रों पर धर्म, जाति, संप्रदाय आदि से जुड़े होने का आरोप लगता रहा है जो कि एक भाषा के रूप में उसे सीमित करना है और उससे भी ज्यादा संस्कृति के रूप में। भाषाएं धर्म, जाति, संप्रदाय की नहीं हुआ करतीं। निश्चित रूप से इनका क्षेत्र विशेष से संबंध हुआ करता है पर यह सीमा भी टूटती रहती है। खास तौर से हिंदी जैसे विशाल जनसंख्या समूह वाली भाषा जिसके बोलने वाले भारत ही नहीं लगभग पूरी दुनिया में मिल जाते हैं, वह क्षेत्र तक सीमित होकर नहीं रह पाती। हिंदी पर उच्च वर्ग की भाषा का आरोप इसलिए भी लगता रहा है कि यह कुछ शहरों तक केंद्रित हो जाती है या उन शहरों के रचनाकारों को ही मुख्यधारा मान लिया जाता है। वह काशी, इलाहाबाद, भोपाल, कोलकाता आदि कोई भी शहर हो सकता है। यह सही है कि इन शहरों या दिल्ली के लेखक ज्यादातर गांव और छोटे कस्बों से पहुंचे हुए लेखक हैं लेकिन यह भी सच्चाई है कि अल्मोड़ा, बलिया और मधुबनी में बैठकर लिखने में और दिल्ली में बैठकर लिखने में फर्क होता है। विनोद कुमार शुक्ल जैसे कुछ अपवादों को छोड़कर ज्यादातर बड़े लेखक दिल्लीवासी नजर आते हैं। हम याद करें कि एक समय था जब अहिंदीभाषी प्रदेशों से भी शानदार पत्र-पत्रिकाएं निकला करती थीं कोलकाता तो बड़ा केन्द्र था ही, कल्पना जैसी शानदार पत्रिका हैदराबाद से निकलती थी। अचानक यह संस्कृति कमजोर क्यों पड़ी। हम मानें या ना मानें परंतु एक प्रकार का सत्ता संघर्ष भाषाओं के बीच चला करता है यहां तक कि एक भाषा के भीतर भी खींचतान चलती रहती है। साहित्य केंद्रों के भीतर वर्चस्व की लड़ाई चलती है। काशी और प्रयाग के बीच की होड़ की स्मृति बहुत पुरानी नहीं हुई है। कई व्यक्तित्व ऐसे बन जाते हैं जो अपनी भाषा या अपने क्षेत्र के प्रतिनिधि हो जाते हैं और भाषाएं उनसे पहचानी जाती हैं जैसे कि विद्यापति, तुलसीदास आदि से हम मैथिली और अवधी को पहचानते हैं। परंतु किसी एक या दो व्यक्ति से किसी भाषा का पहचाना जाना सुखद और वरेण्य स्थिति तो नहीं कही जा सकती। कल्पना कीजिए कि विभिन्न वर्गों से इन भाषाओं में 8-10 बड़े नाम आते तो इन भाषाओं की प्रकृति और प्रवृत्ति कैसी होती? उदाहरण के लिए मराठी और तमिल साहित्य पर नज़र डाल लीजिए। हमें यह भी स्वीकार करना चाहिए कि जिस भाषा में प्रभावी वर्ग के लोग अधिक होते हैं उसे मुख्यधारा का मान लिया जाता है। काफी दिनों तक हिंदी विभागों पर उच्च जातियों का एकाधिकार रहा, निश्चित रूप से इन जातियों में बड़ी प्रतिभाएं पैदा हुई और उनका योगदान अविस्मरणीय है परंतु हम इस सवाल से नहीं बच सकते कि अगर सभी जातियों, धर्मों के लोग हिंदी से आरंभ से जुड़े होते तो इसका रूप कहीं अधिक विस्तृत और समावेशी होता और तब हीरा डोम जैसे रचनाकारों की केवल एक रचना नहीं मिलती और न ही बंग महिला को नाम छुपाने की जरूरत पड़ती। हिंदी जन-जन की भाषा है तो जन-जन का प्रतिनिधित्व भी होना चाहिए। इस प्रयास में अगर थोड़ा कच्चापन या शिल्पगत ढीलापन रह ही जाए तो उसे प्रक्रिया का अंश मानकर स्वीकार करना चाहिए। खेल की तरह साहित्य के लिए भी अब कहना होगा कि "लेखन मैं को काको गुसैयां।"
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