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विश्वभाषा हिंदी : उद्देश्य, कल्पना, माया?
01-Aug-2019 02:49 AM 701     

हिंदी बहुत कुछ है। भारत की औपचारिक भाषा, क़ौमी आवाज़, हिंदुस्तान की पहचान का महत्त्वपूर्ण स्वरूप, 22 राष्ट्रीय भाषाओं में से एक, घर की बोली, गंगा-जमुनी तहज़ीब का मज़हर, संस्कृत की सुपुत्री, उर्दू की छोटी या तो बड़ी बहिन, अंग्रेजी की अपने को छिपाती हुई भानजी, भारतीयता का प्रतीकात्मक प्रतिबिम्ब, भूमंडलीकृत भारतीयता का माध्यम, होनेवाली या होती हुई विश्वभाषा, भारत के अंदर और बाहर की 50 करोड़ मनुष्यों की मातृभाषा, अनुवादक बतालिओं की रोज़ी-रोटी, दादा-दादी, मामा-मामी और नौकर-नौकरानियों तक सीमित असांस्कृतिक बोली, बड़बोली संस्कृति का एक सशक्त आविर्भाव, भारत की अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ती हुई शक्ति का एक स्वरूप और इस पर अब हिंदी विश्वभाषा भी बननी है। या तो यह भी हो सकता है कि इस मामले को अलग ढंग से देखना है। यानी हिंदी कुछ हद तक स्वाभाविक ढंग से विश्व भाषा बन चुकी है।
हिंदी बेशक तेज़ी से बढ़ती रहती है। यानी खड़ी बोली। इसके साथ हिंदी की बोलियां कमज़ोर होती जा रही हैं। यह एक तरह से खेद की बात है पर अनिवार्य भी। जो भी नया हो रहा है, इसके साथ कुछ चला भी जाता। वह भाषा के साथ भी सही है। जैसे कि जो हिंदी मातृभाषा की जगह पर ज़्यादातर अंग्रेजी इस्तेमाल करता है, इसकी हिंदी आगे बढ़ाने में दिक्कत है। एक भाषा तब आगे बढ़ती है जब इसका हर स्तर पर प्रयोग किया जाता है। घर की बोली तो ठीक ही है, पर जब घर की बोली घर में ही रहती है, बाहर नहीं जाती, तो खुले मैदान की बोली नहीं बनेगी। इसका शक्ल वैसे ही रहेगा।
आधुनिकीकरण के दौरान पूरी दुनिया में यही हो रहा है कि एक भाषा का पारिभाषिक यानी मानक स्वरूप सशक्त होता जा रहा है, उसकी उपभाषाएँ कमज़ोर। हाँ, कभी-कभी बोलियां पहचान की प्रतीक बन जाती हैं और सुनने में अच्छी लगती हैं, जैसे कि लोग ब्रज को मीठी ज़ुबान समझते हैं और अभी भी हैं। मैथिलीशरण गुप्त से पहले 19वीं सदी के हिंदी के कवि ज़्यादातर ब्रज में लिखते थे, क्योंकि इनको खड़ी बोली कविता के लिए सही नहीं लगी। भारतेन्दु हरिश्चंद्र जैसे हिंदी के बड़े-बड़े 19वीं सदी के लेखक यही मानते थे और खुद ब्रज के कवि थे, गद्य ही खड़ी बोली में लिखते थे। स्वीडिश में भी ऐसी कई उपभाषाएँ हैं जो लोग सुनने में पसंद करते हैं, पर खुद नहीं बोलते। जिस तरह से अंग्रेजी हिंदी के सामने आधुनिकता का संकेत है उस तरह से खड़ी बोली गांव की बोलियों से ज़्यादा आगे मानी जाती हैं।
पर हाँ, भाषा को आगे बढ़ाने के लिए नयी-नयी शब्दावली चाहिए, बोलने के नए-नए तरीके चाहिए। और वह न सिर्फ भाषा राजनीति का एक परिणाम है पर भाषा को नए-नए क्षेत्रों में उपयोग में ले आने का परिणाम। यही है - ज़ुबान की ज़िन्दगी। हिंदी को यानी खड़ी बोली को "आधुनिक" बनाने के लिए बीसवीं सदी के लेखकों ने बहुत मेहनत की।
अज्ञेय ने एक बार एक निबंध में लिखा कि हाँ, मैं हिंदी के साथ बहुत अक्सर लड़ता रहा क्योंकि मुझे लगा कि जो मैं कहना चाहता हूँ वह हिंदी में कह नहीं पाऊँगा। पर सोचते-सोचते हमेशा कोई कहने का तरीका उभर आया है। ऐसा तरीका जिसे समझकर मुझे लगा कि हाँ, बिलकुल वही है।
एक बात पक्की है : 2011 की जनगणना स्पष्टतः दिखती है कि हिंदी के प्रथम भाषा और द्वितीय भाषा के रूप में बोलनेवालों की संख्या सचमुच बढ़ती रही है। फिर भी हिंदी जो आज़ादी के बाद बननी थी वह काफ़ी कुछ हद तक नहीं बनी। अभी भी जो अपने को शिक्षित समझता है या जो अपने बच्चों को आगे बढ़ाना चाहता है वह अपने बच्चों को किसी अंग्रेजी स्कूल भेजने के लिए कोशिश करेगा। खर्चा ही खर्चा होता है, पर अच्छी स्कूल का मतलब है अंग्रेजी स्कूल। अपनी हिंदी को आगे बढ़ाने में आखिर में क्या फ़ायदा है? इससे किसको इज़्ज़त मिलती है, क्या इससे अच्छी नौकरी मिलती है, अच्छी ज़िन्दगी मिलती है? यह है हिंदी की रामकथा।
विदेश में हिंदी और अनुवाद की कला : विदेश में हिंदी के साथ बात अलग है। एक तो यह है कि मॉरिशस, फिजी और सूरीनाम में 19वीं और 20वीं सदी के पहले दशकों में आए हुए गिरमिटिया मज़दूरों की संतान अभी तक हिंदी की भोजपुरी-सी बोली में बोलते हैं और स्कूल में ढंग से खड़ी बोली सीखते हैं। रेडियो और टीवी खड़ी बोली हिंदी में उपलब्ध है। वैसे कुछ लोग शिकायत करते हैं कि खड़ी बोली की जगह पर अगर भोजपुरी पढ़ाई जाती थी तो वह नुकसान नहीं होता जो नयी पीढ़ी के साथ दीखता है। सच यह भी है कि नयी पीढ़ी वहां या तो क्रेओल अथवा फ्रेंच, अंग्रेजी और सूरीनाम में डच की तरफ खींची जाती है।
दूसरी बात यह है कि लगभग पूरी दुनिया में कॉलेजों और विश्वविद्यालयों के स्तर पर भारतीय भाषाएं पढ़ाई जाती हैं और इसमें हिंदी ज़्यादातर मुख्य है। यही कारण है कि आधुनिक और समकालीन हिंदी साहित्य के सीधे अनुवाद अनेक भाषाओं में उपलब्ध हैं। हिंदी लेखक भी कभी-कभी मानते हैं कि अंग्रेजी को लेकर ही इनकी कृतियां विदेश तक पहुँच सकती हैं। यह बात सच नहीं है, ग़लतफहमी है, फिर भी कभी मिटती नहीं। पर साहित्यिक अनुवादन से किसी की ज़िन्दगी नहीं बन पाती। शायद ही प्रोजेक्ट के तौर पर कुछ वृत्ति आती हो। कुछ साल पहले बड़े धूमधाम से "इंडियन लिटरेचर अब्रॉड" नाम से भारत सरकार की ओर से एक स्कीम का उद्घाटन हुआ था पर आखिर में इससे कुछ नहीं हुआ।
अनुवाद की अपने आप में एक कला है जिसके लिए एक विशेष पृष्ठभूमि चाहिए। सबसे पहले भाषा के अध्ययन-अध्यापन की एक संस्कृति। कभी-कभी हिंदी के साथ यह रामकथा चलती है कि हिंदी के साहित्य के अनुवाद को वह जगह क्यों नहीं मिलती है जैसी भारतीय लेखकों के अंग्रेजी उपन्यास को मिली है। वैसे प्रेमचंद से लेकर अज्ञेय, निर्मल वर्मा, गीतांजलिश्री, उदय प्रकाश की रचनाओं के अनुवाद कई भाषाओं में ज़रूर मिलते हैं, पर ज़्यादातर छोटे प्रकाशकों के द्वारा छपवायी जाती किताबें बाज़ारों में कम दीखती हैं और कम पढ़ी जातीं हैं। सलमान रुश्दी, अरुंधति रॉय, विक्रम चन्द्र जैसे नाम तो किसी भी पश्चिमी पाठक के कानों में ज़रूर गूंजते हैं। इसी तरह से हिंदी लेखकों के नाम क्यों नहीं गूंजते?
कुछ लोगों का कहना है कि इस तरह के मूल अंग्रेजी उपन्यास भारत में अपने देश के पाठकों के लिए नहीं, विदेशी पाठकों के लिए और अंतर्राष्ट्रीय पुस्तक भंडार के लिए ही लिखे जाते हैं। हालाँकि हिंदी और दूसरी भारतीय भाषाओं का साहित्य सबसे पहले अपने यहाँ के पाठकों के लिए है। इस लिहाज़ से सन्दर्भ अलग है, कथानक अलग है और सौंदर्य-शास्त्र भिन्न ही होता है इत्यादि। मुझे इस पर शक है। मैं अभी भी मानता हूँ कि अगर किताब अच्छी है तो अनुवाद में भी अच्छी होनी चाहिए और जागरूक पाठकों देशी हो या विदेशी - इनको किसी तरह से अंदाज़ा होता है कि रचना अच्छी है कि नहीं। पर अनुवाद सही होना चाहिए। और स्वीडिश पाठक ज़्यादातर स्वीडिश में ही पढ़ेगा, इसलिए यह बहुत ज़रूरी है कि अनुवाद सही हो।
हिंदी का हाल इस सिलसिले में क्या है? चीन में, यूरोप में और अमरीका में अनुवादक कहाँ से आते हैं? एक तो यह है कि यूरोप के कई देशों में पूर्वी एशिया और अमरीका की तरह बड़े बड़े विश्वविद्यालयों में इंडोलॉजी के छोटे छोटे विभाग या प्राच्य विद्या के संस्थान होते हैं जहाँ दक्षिण एशिया की भाषाएँ पूरी तरह से पढ़ाई जाती हैं। छात्र खासकर हिंदी सीखने के लिए ज़रूर आते है और भाषा के साथ साहित्य और संस्कृति भी पढ़ते हैं। उनमें से कुछ लोग घोर परिश्रम करके 3-4 साल में अच्छी हिंदी सीख लेते हैं और शब्दकोष के साथ साहित्य भी पढ़ते हैं, और साहित्यिक अनुवाद तैयार करने की कोशिश करते हैं।
प्राच्य भाषाओं का शिक्षण तो ज़्यादातर विदेशी ज़ुबान की दिक्कतें समझने पर आधारित होता है। अनुवाद करना अपने आप में एक कला है जो क्लासरूम के अंदर कम सिखायी जाती है। खेद की बात है कि भारतीय साहित्य के बड़े-बड़े प्रकाशन गृहों में सिर्फ अंग्रेजी में लिखे गए उपन्यास निकलते हैं। प्रकाशकों का बहुत अक्सर यही मन्त्र होता है कि इस तरह की तथाकथित देशी भाषाओं की किताबों के लिए हमारे यहाँ कोई बाजार नहीं है। बिकाई नहीं होगी। इसके अलावा यही शिकायत होती है कि अनुवाद की भाषा में वह पकड़, वह ढंग नहीं है जो विदेशी पाठकों की दिलचस्पी उजागर करने के लिए ज़रूरी है।
इसमें कुछ सत्य हो सकता है क्योंकि सही अनुवाद के लिए न सिर्फ हिंदी की समझ ठीक होनी चाहिए, पर अनुवाद की भाषा में भी विधि लानी पड़ती है, जिसके लिए कोई सही शिक्षा नहीं मिल पा रही है।
अच्छे अनुवादक कहाँ से आते हैं? जिस तरह से पूरे यूरोप में, अमरीका में और पूर्वी एशिया में (यानी दक्षिण या उत्तर कोरिया से बाहर) छात्र आकर्षित होकर कोरियाई ज़ुबान पढ़ने के लिए आते हैं, उस तरह से हिंदी के लिए भी आते। पूरी दुनिया में बड़े-बड़े विश्वविद्यालयों में इंडोलॉजी के विभाग या तो प्राच्य विद्या के संस्थान होते हैं जहाँ हिंदी ज़रूर मुख्य विषय या कम से कम गौण विषय के रूप में पढ़ाई जाती है। इस वजह से किसी तरह से हिंदी एक विश्वभाषा बन चुकी है और बनती रहेगी। जो छात्र बीए-एमए का पाठ्यक्रम पूरा कर लेते हैं, हिंदी के साथ संस्कृत एवं दूसरी भारतीय भाषाएँ भी कम से कम प्रवेशात्मक रूप से पढ़ भी लेते होंगे, वे बाद में सचमुच भारत के स्वाभाविक और एकदम मौलिक राजदूत बन जाते हैं। उनमें कई लोग अनुवाद के क्षेत्र में आ जाते हैं। इन लोगों का उद्देश्य होता है की हिंदी साहित्य के अच्छे-अच्छे नमूने विश्व साहित्य की श्रेणी तक पहुंचें।
अच्छे अनुवादक अपने आप से तो नहीं बनते। इनको अलग-सा शिक्षण मिलना चाहिए। खेद की बात है कि माहौल इस तरह से इस वक्त तो नहीं है। कई बार उल्लेख कर चुका हूँ कि भाषा की पकड़ बहुत अहम होती है।
आखिर में सवाल अनुवाद की गुणवत्ता का है। इस सन्दर्भ में मेरा एक सपना है। अगर ऐसा संस्थान होता जहाँ पूरी दुनिया से भारतीय साहित्य के अनुवादक आ सकते, आपस में मिल सकते एवं लेखकों और आलोचकों के साथ अनुवाद की समस्याओं पर बहस और आगे जाकर साहित्य-विमर्श कर सकते तो निश्चित ही हर किसी को फ़ायदा होता। मान लें कि एक ही उपन्यास का अनुवाद जापानी में, रूसी में और स्वीडिश में बन रहा है और अनुवादक एक बार कुछ दिनों तक शांति से बैठकर मिल सकते, अपना काम कर सकते और अनुवाद की समस्याओं पर आपस में बात कर सकते तो निश्चित परिणाम सकारात्मक होता।
नमूना चीन और चीनी का : हिंदी का फैलाव एक तरह से गर्व का मामला है। फिर भी, विदेश में हिंदी के छात्रों की संख्या अभी भी छोटी है और हिंदी के लिए कोई खास बाजार नहीं है। किसी भी भारत के विश्वविद्यालय में "विदेश में हिंदी" के नाम से कोई पाठ्यक्रम क्यों नहीं है? हाँ, कोन्फ़ुजियस इंस्टिट्यूट की तरह भारत का ज्ञान और हिंदी को फैलाने के लिए कोई संस्थान अभी नहीं है। फिर भी हिंदी को संयुक्त राष्ट्र संघ की औपचारिक भाषा बनाने की योजना है। प्रभुत्व होते हुए भारत की सरकार को हिंदी का ज्ञान पूरी दुनिया में फैलाने के लिए क्या करना चाहिए जो अभी तक नहीं हो पा रहा है? क्या नहीं हो रहा है जो होना ही चाहिए?
अगर हिंदी को सचमुच विश्वभाषा बननी है तो किसी तरह से हिंदी का आकर्षण विदेश में और पूरी दुनिया में बढ़ाना चाहिए। यानी दक्षिण अमरीका, अफ्रीका और पूर्वी एशिया की तरफ भी देखना चाहिए। चीन में पिछले कुछ वर्षों से हिंदी की पढ़ाई सचमुच तेज़ी से बढ़ती रही क्योंकि चीन के विश्वविद्यालयों में इस की तरफ जागरूकता होती रही। आईसीसीआर का योगदान इसमें बहुत ज़्यादा नहीं है, दिलचस्पी चीन के अंदर से ही पैदा होती जा रही है और चीन की सरकार भूमंडलीकरण के साथ दूसरे देशों की भाषाओं का ज्ञान भी आगे बढ़ने में व्यस्त है।
जैसे चीन में द्विभाषियों के लिए नौकरी मिलना मुमकिन है - चीनी-जर्मन, चीनी-फ्रेंच, चीनी-रुसी, चीन-जापानी। हिंदुस्तान के राजदूतावास के अफसर और अंतर्राष्ट्रीय कम्पनीज के प्रतिनिधि ज़्यादातर समझते हैं कि भूमंडलीकृत दुनिया में अंग्रेजी ही चलेगी और अंग्रेजी का ज्ञान हमारे भारतीय संस्कृति का एक खज़ाना है। इसका मतलब है कि ज़रूरत पड़े तो चीनी-हिंदी द्विभाषीय की जगह पर चीनी-अंग्रेजी, जर्मन-अंग्रेजी, रुसी-अंग्रेजी द्विभाषीय चाहिए। एक हिंदुस्तानी को अपनी अंग्रेजी का ज्ञान पर गर्व है। उसी तरह का गर्व हिंदी के ज्ञान पर नहीं है।
हिंदी के साथ कोई नौकरी का बाज़ार बनना चाहिए। अगर हिंदी सचमुच संयुक्त राष्ट्र संघ की औपचारिक भाषा बनती है तो इसके साथ बहुत कुछ आएगा, पर इसके अलावा और इसके साथ ही बहुत कुछ होना चाहिए। विदेशी छात्रों की संख्या को आगे बढ़ानी है, और वह न सिर्फ प्रवासी भारतीय समाज में, पर मूल विदेशी समाजों में भी। इसलिए हिंदी फैलाने का सवाल और प्रवासियों में भारतीय अस्मिता स्थायी रखने का सवाल विभिन्न हैं।
पाठ्यक्रमों की कमी तो नहीं है, विदेश में ऐसे बहुत विश्वविद्यालय, कॉलेजेस और संस्थान हैं जहाँ हिंदी और भारतीय संस्कृति, साहित्य, इतिहास और धर्म का इतिहास पढ़ाए जाते हैं। वे सारे अपने आप से चलते हैं, वे सब मदद मिलने में खुश ज़रूर होंगे, पर वे ज़्यादातर अपने को स्वतन्त्र समझकर पाठ्यक्रमों का फैसला खुद करेंगे। और यह तरीका सही भी है क्योंकि हिंदी छात्रों की ज़रूरतें ऐसे संस्थान ही सही समझते हैं। फिर भारत का योगदान, और भारत के सरकारी संस्थानों का योगदान इस सन्दर्भ में क्या हो सकता है और क्या होना चाहिए? इस सन्दर्भ में पहले कई दूसरे मिसाइल देखे जाएं।
पूरी दुनिया में चीनी ज़ुबान कुछ साल से चीन की आर्थिक और राजनीतिक प्रगति के साथ जल्दी से आगे बढ़ती रही। पूरी दुनिया में कन्फ़्यूशियस इंस्टिट्यूट के नाम से चीन के सांस्कृतिक केंद्र खोल चुके हैं जहाँ मुख्य तौर पर चीनी ज़ुबान पढ़ाई जाती है। इस तरह से ॠथ्थ्त्ठ्ठदड़ड्ढ ढद्धठ्ठदड़ठ्ठत्द्मड्ढ फ्रेंच की विदेश में पढ़ाने के लिए ज़िम्मेदार है, क्रदृड्ढद्यण्ड्ढ क्ष्दद्मद्यत्द्यद्वद्य के नाम से जर्मनी के केंद्र हैं और दूसरे देशों के भी इस तरह के संस्थानों के अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर नेटवक्र्स हैं। साथ-साथ में ऐसे संस्थानों में भाषा की पढ़ाई होती है और पढ़ाने एवं परीक्षाओं के परिणाम भी उन्हीं के हाथ में है।
निकष : 11वें विश्व हिंदी सम्मलेन में "निकष" के नाम से हिंदी के मानकीकृत ढांचे के एक प्रोग्राम की उद्घोषणा हुई। इसके तहत हिंदी भाषा की एक मानक परीक्षा व्यवस्था सुनिश्चित की जाए और इसके लिए संजाल पर सामग्री उपलब्ध की जाएं।
इसके लिए एक स्थायी मंडल का प्रबंध किया जाएगा जो हिंदी के प्रचार के बड़े संस्थानों से जुड़ा रहेगा। यह भी ज़रूरी है कि विदेशियों को हिंदी के अध्यापकों के लिए अलग सा कम से कम एक भारतीय विश्वविद्यालय में "विदेशी हिंदी" का एक पाठ्यक्रम स्थापित किया जाए जहाँ विदेश में हिंदी पढ़ाने की क्षमता पर केंद्रित हिंदी प्राध्यापकों की एक नई पीढ़ी उभरकर आ जाए जो विदेशियों को सशक्त ढंग से हिंदी सिखाएं।
दूसरी विश्वभाषाओं की तरह पूरा एक मानकीकृत ढांचा इसके लिए बनाया जाए ताकि पूरी दुनिया से छात्र परीक्षा लेकर विभिन्न स्तर के हिसाब से अपनी जानकारी प्रमाणित कर सके। स्तर ए-1 से लेकर सी-2 तक होने चाहिए। परीक्षाएं लिखित और मौखिक भाषा के ज्ञान पर केंद्रित होने चाहिए, सांस्कृतिक तादात्म्य पर नहीं। इससे हिंदी का आकर्षण मूल विदेशियों एवं प्रवासी भारतीय समुदाय के अंदर नई पीढ़ियों में अवश्य बढ़ता जाएगा।

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