ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
सबके हित का काम
CATEGORY : चिन्तन 01-Jul-2018 05:13 AM 322
सबके हित का काम

जे जनमे कलिकाल कराला। करतब बायस बेष मराला।।
करतब (कर्तव्य) बायस (वायस) कौआ। अंग्रेज़ी बायस का अर्थ पक्षपात, (पूर्वग्रह) का और वेष मराल (हंस) का। यही कौवा कागभुसुंडि है, जो रामकथा का श्रोता होने के उपरांत वाचक भी है। वैसे ध्यान रहे कि कौआ प्रकृति को सुनता है और उड़-उड़ कर सारे जग को सुनाता है। लोक में यह भविष्यदृष्टा के रूप में स्थापित है। रात के अँधेरे में लोक जन इसकी आवाज़ सुन जग जाते हैं। मानो सुबह होने का सूचक है यह। परंतु दिन के प्रकाश में इसकी आवाज़ से दूर भागते हैं। वयस से वायस भी बना है और वयास भी। वय से वाय और वया बने हैं। वय के एक ओर वाय और दूसरी ओर वया। वय उ उ-अ-इ-अ। उअना इअना ही वयना है। यही बयन भी है और बैना भी। वया स्त्रीलिंग होने के अलावा एक छोटा पक्षी है, जो वर्षा के मौसम में तालाब के किनारे पेड़ की डाल पर बहुत ख़ूबसूरत घोंसले बनाता है, जो आज भी दिख जाते हैं। इसमें जाना-आना नीचे से होता है। बया मादा है और बाय नर। हमारे यहाँ ऋतु के तीन भेद हैं। गर्मी, वर्षा और ठंड। ऋत का मतलब खाली होना है। मादा खाली होती है, तो भरने की कोशिश करती है। इसीलिए ऋतुकाल प्रजनन काल हैं। वय का एक अर्थ उम्र है। युवा-वय वायस-वय है। इस तरह हर युवा वायस होता है, इसलिए कि इअ-इअ (पाने) की कोशिश में उअ-उअ (उड़-उड़ कउ-कउ) करता है। यही उसका विअकाल है। विअ-काल है उ-बियने का काल भी है और वि-अकाल (विशेष अकाल) भी है। इसी वय में सबसे अधिक व्यय होता है। हम बुज़ुर्ग अपने-अपने युवाकाल को देखें, तो ख़ुद ही स्पष्ट हो जाएगा कि यही सबसे अधिक व्ययकाल है। तो करतब (कर्तव्य) बायस का और वेष मराल का। मर्-आल ही मराल है। आल उ विषाक्त तरल पदार्थ। जो उजले रूप और कोमल ध्वनि के धनी हैं, वे विषाक्त तरल पदार्थ ग्रहण करते हैं। वे ताल के क्षार को ग्रहण करके प्रसन्न होते हैं, जो हमारे लिए ज़हर है। नाम के मुख्यतया दो आधार हैंं एक, रूपाधारित और दूसरा गुणाधारित (क्रियाधारित)। एक ही पक्षी के दो नाम हैं, मराल और हंस। "मराल" नाम का आधार गुण है और "हंस" नाम का आधार रूप। हंसरूप दिखते तुलसी में ही वायस-प्रवृत्ति छिपती नहीं। उनका पूर्वाग्रह छिपता नहीं, बल्कि साफ़ उघड़ जाता है। वे वायस को अवगुणी और हंस को गुणी मानते हैं, परंतु हंस के बदले मराल नाम का उपयोग करके अपनी वायस वृत्ति को दिखा दिया। ऐसा गुणन की विधि के अवगुणने से हुआ। वय का उलट यव है, जिससे यवन, युवा, यौवन विकसित हैं। हमारे यहाँ पश्चिम से आनेवाले विदेशियों को यवन कहते थे। वे हमसे युवा लगते थे, इसलिए यवन कहे जाते थे। यही विअकाल है। वियने का काल भी है और व्ययने का काल भी। हर बाप अपने बच्चों के आर्थिक खर्च और बाहर घूमने की प्रवृत्ति से पहले भी परेशान था और आज भी परेशान है। अपनी जान अंकुश लगाने की कोशिश करने पर भी युवा वायस को रोक नहीं पाता। मराल को हंस कहना बायस प्रवृत्ति है। रूपाधारित प्रवृत्ति है। सत्य तो रूपाधार और गुणाधार को गुणता है। क्या नहीं लगता कि हमारा वर्तमान भी बायसी है। आप पहले तो कहते हैं कि मुझमें कोई गुण ही नहीं है और बाद में अपने आस को ही विस्वास ठहराने लगते हैं। इतना ही नहीं, अपने विश्वास के विश्वासी को सुमति-सज्जन, विमल विवेकी कहते हैं और अविस्वासी को कुतर्की, बक, दादुर, खल। क्या नहीं लगता कि आप ख़ुद ही अपने विश्वास की प्रशंसा करते हैं। अपनी प्रशंसा करने को तो अच्छा नहीं माना जाता। देखियेे :
मनि मानिक मुकुता छबि जैसी। अहि गिरि गज सिर सोह न तैसी।।
नृपकिरीट तरुनी तनु पाई। लहहिं सकल सोभा अधिकाई।।
तैसेहिं सुकबि कबित बुध कहहीं। उपजहिं अनत अनत छबि लहहीं।।
भगति हेतु बिधि भवन बिहाई। सुमिरत सारद आवति धाई।।
राम चरित सर बिनु अन्हवाएँ। सो श्रम जाइ न कोटि उपाएँ।।
कबि कोबिद अस हृदयँ बिचारी। गावहिं हरि जस कलिमल हारी।।
कीन्हें प्राकृत जन गुन गाना। सिर धुनि गिरा लगत पछिताना।।
हृदय सिंधु मति सीप समाना। स्वाति सारदा कहहिं सुजाना।।
जौं बरसइ बर बारि बिचारू। होहिं कबित मुकुतामनि चारू।।
क्या नहीं लगता कि आप अपने विश्वास को दूसरों पर लादते हैं। उसके विश्वास से आपका कोई सरोकार नहीं। इससे तो सब के हित के बदले आपके विश्वास का हित होता है। साहित्य तो सब के विश्वास का हित करता है न, तभी तो तर्कते हुए कर्तता और कर्तते हुए तर्कता है। कथन में जब करन शामिल होता है, तभी "सुरसरि सम सब कर हित होई" सार्थक होता है, अन्यथा कथन मात्र रह जाता है। सुरसरि कभी कहती नहीं, सिर्फ़ बहती है। कहती तो बहना (क्रिया) है। इस तरह सुरसरि सबके हित को बहती है। परंतु यहाँ तो कुछ के हित का ही वहन हो रहा है, सबके हित का नहीं।
इससे साबित हुआ कि व्यक्ति की क्रिया का कथन ही जीवन के काम का है, व्यक्ति का कथन नहीं। अकसर हम व्यक्ति के कथन से अभिभूत हो क्रिया के कथन तक पहुँचते ही नहीं। जिससे व्यक्ति का कथन ही क्रिया का कथन हो जाता है। भाई, "सुरसरि सम सब कर हित होई" कह देने से अगर सब का हित हो जाता, तो करने की ज़रूरत ही कहाँ थी। आजकल कह-कह ही हो रहा है, कर-कर नहीं। हमारे समय की मूल समस्या यही है। यहाँ नाम के "कार" की तो भरमार है और काम के "कार" खोजे नहीं मिलते। वे छिपे-छिपे सब के हित का काम कर रहे होते हैं।

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