ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
कादम्बरी मेहरा की कहानियों में नारी
01-Nov-2018 10:36 AM 150     

दूर के ढोल सुहावने लगते हैं। भारत में भी लोगों को यहाँ यूके की लाइफ के बारे में सोचकर ऐसा ही लगता है। शादी के बाद विदेश में पति के साथ बसने का सपना अधिकतर भारतीय लड़कियाँ देखा करती हैं और जो यह सपने नहीं भी देखती हैं तो उन्हें भी कई बार तकदीर विदेश के अन्न-पानी और हवा में ले आती है। 1960-1970 या उससे पहले शादी-शुदा स्त्रियाँ ही भारत से अपने पति के साथ विदेश जा पाती थीं। उन दिनों हर स्त्री उच्च शिक्षा प्राप्त किये नहीं होती थी। इस देश में आकर तमाम स्त्रियाँ गृहणी बन कर रहीं और कुछों ने छोटे-मोटे काम भी शुरू कर दिये। उसके बाद में आने वाली कुछ स्त्रियाँ शिक्षा व काम करने में अपने पति की बराबरी की योग्यता भी रखने लगीं। इनमे कुछ अधिक आत्मविश्वास होता था। उन्हें आते ही कहीं न कहीं जॉब मिल जाते थे।
यहाँ आकर स्त्रियों का भ्रम टूट जाता है। हर स्त्री को अनजाने वातावरण और अनजाने लोगों के बीच आकर मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। लाड़-प्यार में पली जो बेटी भारत में रहने पर सब सुख-सुविधाओं के बीच रहती है उसे यहाँ अनजाने देश में आकर सारे काम अपने आप करने पड़ते हैं। जीवन एक नया मोड़ लेते हुए संघर्षमय हो जाता है। बातचीत में भी बहुत विनम्रता और सहनशीलता बरतनी पड़ती है। काफी पहले जहाँ कुछ भारतीय बसे होते थे वहीं जाकर अन्य भारतीय भी बसने लगते थे। और उन दिनों भारतीय संस्कारों से युक्त स्त्रियाँ अपना ही पहनावा पहनती थीं। उनमें अधिक आत्मविश्वास नहीं था। वह दबी-दबी रहती थीं और अंग्रेजों से जातीय भेद-भाव सहती थीं। अंग्रेजी भाषा ढंग से न बोल पाने व सभ्यता और संस्कृति में फर्क होने से अंग्रेज औरतों से बोलचाल और मेलजोल कम ही हो पाता था। वह अपने ही संप्रदाय की स्त्रियों से मेलजोल रखती थीं। लेकिन आजकल स्थिति बहुत बदल गई है। अंग्रेज स्त्रियों के पहनावे की आलोचना करने वाली भारतीय स्त्रियों की सोच बदलती गई। कुछ तो मौसम, कुछ सुविधा और कुछ जैसा देश वैसा भेष वाली बात तमाम स्त्रियों ने अपना ली है। कुछ स्त्रियाँ अब भी साड़ी व शलवार-कमीज पहनती हैं और कुछ स्त्रियाँ भारतीय व विदेशी दोनों तरह के वस्त्र पहनती हैं। यहाँ की परिस्थितियों से समझौता करती हर नारी के जीवन की अपनी अलग ही कहानी है। आज की पीढ़ी की भारतीय स्त्रियों का अंग्रेज औरतों के साथ भी काफी मेलजोल रहता है। सामाजिक अवसरों पर भी जाने पहचाने अंग्रेज और भारतीय परिवार घुल-मिल जाते हैं।
पश्चिमी देशों में किसी भी काम को नीची नजरों से नहीं देखा जाता। भारत में किस वर्ग का कोई है उस तरह से काम के बारे में भी लोग सोचते हैं कि कहीं कोई ऐसा वैसा छोटा काम करने पर उनकी नाक ना कट जाए। लेकिन यहाँ आकर बहुतेरी औरतें तो सफाई आदि के काम भी करने लगती थीं। सुपरमार्केट, एयरपोर्ट, कैफेटेरिया, ऑफिस आदि जैसी जगहों पर कम शिक्षित स्त्रियाँ, जिनमें से अधिकतर पंजाबी, गुजराती या साउथ इंडियन हैं, सफाई आदि के काम करती हुई दिखती हैं। ऐसी भी स्त्रियों के जीवन की कहानियाँ हैं जिन्हें लड़के भारत से ब्याह कर तो लाते हैं किन्तु फिर न जाने क्यों उनके यहाँ आते ही बीबी में उनको खामियाँ नजर आने लगती हैं। और वह उन्हें तंग करके उनसे अपना पीछा छुड़ाने के तरीके सोचने लगते हैं। यहाँ के तेजी से बदलते हुए समाज में जिन्दगी तेजी से करवटें बदलती है। कुछ साहसी औरतें अपने निठल्ले व अत्याचारी पतियों को छोड़कर गोरों से भी शादी करने लगी हैं। कम पढ़ी-लिखी स्त्रियों को कुछ पढ़े-लिखे प्रवासी परिवारों में घरेलू कामों के लिए भी नौकरी पर लोग रखने लगे हैं।
माँ, पत्नी, गर्लफ्रेंड और रखैल के रूप मे जीती औरत की जिन्दगी के विभिन्न रूपों को अपने शब्दों का बाना पहनाकर उन्हें कहानी का रूप देने वाले यूके में तमाम जाने-माने कहानीकार हैं। इसमें प्रख्यात कहानीकार कादम्बरी मेहरा अपना एक खास स्थान रखती हैं। उन्होंने यूके में रहते हुए यहाँ के जीवन की बारीकियों को अच्छी तरह से देखा और समझा है और स्त्रियों के पारिवारिक और संघर्षमय जीवन को बड़ी कुशाग्रता से अपने शब्दों में अभिव्यक्ति देकर कहानियों में ढाला है। उनके कुछ कहानी संग्रहों में से कुछ समय पहले प्रकाशित एक कहानी संग्रह है "डैफनी तथा अन्य कहानियाँ" जिसमें "टीना आंटी का सपना" नाम की कहानी में दिखाया गया है कि भारत से कम शिक्षित वर्ग की आने वाली औरतों को भी अब उनकी योग्यता लायक काम कहीं न कहीं मिल जाता है। और वह अपनी गुजर-बसर के लिए जो भी काम मिलता है खुशी से स्वीकार कर लेती हैं। प्राची नाम की डॉक्टर को घर में हेल्प के लिए किसी की जरूरत है और भाग्यवश उन्हें भारत से आई एक टीना नाम की औरत घर का काम करने को मिल जाती है। ऐसी औरतों से परिस्थितियाँ और भी बहुत कुछ करा लेती हैं। किसी गोरे से शादी करने के बाद उन्हें अपना नाम व धर्म भी दिखावे के तौर पर बदलने पड़ते हैं। जैसे टीना की बहन रानी जो पहले राजिन्द्र थी और टीना भी जिसका नाम पहले तेजिन्द्र था। टीना का दिल भारत में अपने गाँव में अपनी बेटी के पास ही छूट गया है जो गर्भावस्था में है। अपनी बेटी के जीवन के बारे में बातें करते हुए टीना आंटी की पीड़ा का अंदाज़ा लगाया जा सकता है। इसलिए इंग्लैंड में रहते हुए वह पैसा कमाकर उसकी सहायता करना चाहती हैं। गाँव में अगर किसी की बेटी पैदा होती है तो उसकी कदर नहीं होती। इसलिए उन्होंने एक सपना संजो रखा है कि उनकी बेटी की संतान यदि बेटी हुई तो वह अपनी कमाई से उसे यहाँ लाकर पढ़ायेंगी।
एक माँ से बढ़कर इस दुनिया में उसके बच्चे को कोई प्यार नहीं दे सकता यह बात हर कोई जानता है। लेकिन मजबूरी की मारी ऐसी भी स्त्रियाँ हैं जिनके बच्चे जब छोटे होते हैं तो उनके पति की मौत हो जाती है या फिर पति-पत्नी में डिवोर्स हो जाता है। डिवोर्स होने से कुछ माएँ आर्थिक मजबूरियों के कारण बच्चों को अपने पास नहीं रख पातीं। उन्हें उनके पिता की हिरासत में छोड़ना पड़ता है। ऐसे बच्चों के बचपन पर विषाद की जो छाया पड़ती है वह उनके बड़े होने पर भी उनके जीवन में बनी रहती है। "सिसकता ब्लॉसम" एक ऐसी ही कहानी है जिसमे आयशा और ताहिरा नाम की दो बहनें अपनी माँ से जुदा हो जाती हैं। पूरब और पश्चिम के अंतर ने उनके माँ-बाप की शादी की दीवारों को गिरा दिया जिससे उनका बचपन ऐसी बदनसीबी में बीता जिसके घाव कभी भरने नहीं पाए। यूके में जन्म लेने पर भी अभाग्यवश उनका बचपन पाकिस्तान में सिसकते हुए गुजरता है और बड़े होने पर भी दो मजहब और दो सभ्यताओं के बीच फंसी वह बेचारियाँ अपनी माँ को कभी नहीं भूल पातीं और ना ही उनकी आयरिश माँ उन्हें। अपनी माँ के जीते हुए भी वह उससे बिछड़ी रहती हैं। और उसका अभाव उन्हें कुरेदता रहता है।
प्रवासी कहानियों में गोरे समाज की स्त्रियों का भी त्रास देखा जा सकता है जो "अंतिम चरण" में जाहिर है। इस कहानी में वीरा नाम की एक बूढ़ी औरत के पास कई मकान और काफी संपत्ति होते हुए भी वह बिना शादी किये अपने प्रेमी की याद में ही सारा जीवन बिता देती है। लेकिन इतनी संपत्ति होते हुए भी बुढ़ापे में इंसान किस कदर लाचार होकर दूसरों पर निर्भर हो जाता है यह कहानी उसका उदाहरण है। एक दिन बिना किसी वारिस के दूसरों से सेवायें लेते हुए वीरा के जीवन का अंत हो जाता है। आजकल के खुले बिचारों वाले समाज में लोगों के बिना शादी के भी बच्चे हो रहे हैं। किन्तु वीरा के जमाने में भारत की तरह रूढ़िवादी परिवार हुआ करते थे। माँ-बाप की बिना अनुमति के अपनी पसंद के व्यक्ति से बेटियाँ शादी नहीं कर सकती थीं। ऐसा करने पर माँ-बाप को आपत्ति होती थी। और बिना शादी के बच्चे पैदा करने से तो पूरे परिवार पर कलंक लगने का डर रहता था। लेकिन वीरा की नर्स जो आज की पीढ़ी की है उसके लिए इन सब बातों की कोई समस्या नहीं। वह अपने बॉयफ्रेंड के साथ रहती है और उससे एक बच्चा भी है। इसलिए वह वीरा के बारे में सोचती है, "मैं इसकी तरह लावारिस नहीं मरूँगी।"
आज की सभ्यता में पली बेटियों के लिए सांस्कृतिक बंधनों का पालन करने में घुटन सी होती है। एक तरफ भारतीय माता-पिता और उनके संस्कार दूसरी तरफ उनके बच्चे जिनका बचपन घर के बाहर स्कूल, कॉलेज, युनिवर्सिटी और संगी साथियों के साथ खुले माहौल में सांस लेते बीतता है। कॉलेज के दिनों से ही बहुतेरी बेटियाँ पार्ट टाइम जॉब करने लगती हैं और बाहर दोस्तों के साथ अपनी स्वतंत्रता का आनंद लेती हैं। और इस तरह फ्रीडम लविंग हो जाती हैं। हर बात के अपने फैसले खुद करती हैं। एक अंग्रेज लड़की जब अपने बॉयफ्रेंड के साथ कहीं घर शेयर करती है तो उसके परिवार व उसके संप्रदाय के लोगों को जरा भी आपत्ति नहीं होती। लेकिन जब एक स्वतंत्र विचारों वाली भारतीय लड़की घर से दूर कई बार किसी बॉयफ्रेंड के साथ रहने लगती हैं तो इस पर उसके रिश्तेदार व जाने-पहचाने लोग ताने मारते हैं और माता-पिता को शर्मिंदगी उठानी पड़ती है। लेकिन उतना बवाल नहीं होता जितना भारत में हो सकता है। इन बेटियों के बातचीत करने का लहजा व विचार आदि सभी अंग्रेज लड़कियों की तरह ही होते हैं। और शादी करने में भी जाति-पांति के बंधन नहीं सहना चाहतीं। इनके लिये पारिवारिक रिश्तों और अपनी स्वतंत्रता के बीच सामंजस्य रखना बड़ा मुश्किल होता है। समय के अनुसार आज के हर माता-पिता के विचार भी बदल रहे हैं। अपनी बेटियों की खुशी के आगे झुकना वह सीख गये हैं। और बेटियाँ पूरी स्वतंत्रता से अपनी शादी व अपने भविष्य के निर्णय स्वयं लेने लगी हैं। लेकिन ज्यादा मीन-मेख निकालने वाली लड़कियों की या तो शादी नहीं हो पाती या फिर कभी-कभी ऐसा जीवन साथी चुन लेती हैं जिससे शादी करके वह धोखा खा जाती हैं। "रूपगर्विता" कहानी में भी कादम्बरी जी ने एक ऐसी ही प्रज्ञा नाम की लड़की का नक्शा खींचा है जो अपनी पसंद से शादी करने की जिद में सबमें मीन-मेख निकालती रहती है और सालों शादी के लिए टाल-मटोल करती रहती है। और अंत में अपनी पसंद के लड़के से ही शादी करके धोखा खा जाती है।
देखा जाये तो किसी न किसी रूप में कहानियाँ वास्तविक जीवन की घटनाओं से ही अंकुरित होती हैं। औरत को अपने जीवन में कितनी परेशानियों को झेलना पड़ता है। कभी-कभार पति के विदेश चले जाने पर संयुक्त परिवार में रह रही जवान औरत को अजीब रिश्तों व विषम परिस्थितियों से गुजरना पड़ता है। ऐसी बातें वह घर में किसी से खुल कर कह भी नहीं सकती। अपनी इज्जत बचाते हुए वह कैसे जीती है इसका अनुमान "साँप और तोरी की बेल" में लाजो की दशा को पढ़कर लगाया जा सकता है।
और "वृश्चिक दंश" सास-बहू के संबंधों को दर्शाती एक ऐसी कहानी है जिसमे पीढ़ी का फर्क होने के साथ-साथ उनकी सोच व संस्कारों में भी कोई ताल-मेल नहीं। आजकल की बहुओं में सहनशीलता नहीं होती। यह कहानी उस सच को साबित करती है। न तो उन्हें जिम्मेदारियाँ निभानी आती हैं न ही उनमें कोई दिलचस्पी दिखाती हैं। सुषमा के समय में बहुयें परिवार में सबसे निभा कर चलती थीं और सहनशील बन कर रहती थीं। किसी से अपशब्द नहीं बोलती थीं। कभी किसी को पलटकर जबाब देने की हिम्मत नहीं करती थीं। किन्तु आजकल की बहुयें पढ़ी-लिखी तो बहुत होती हैं किन्तु सास व ससुराल वालों के लिए अपनापन नहीं होता उनके मन में। उनकी बातों में चालाकी व मन में कुटिलता रहती है। परिवार के साथ मिलकर रहना उन्हें भाता नहीं। अपमान भरी बातें करने में हिचकिचाती नहीं। सास का प्यार-दुलार पाकर भी वह मन की कठोर बनी रहती हैं। बात-बात पर सास को नीचा दिखाने में उन्हें जैसे आत्मसंतुष्टि मिलती है। सास-बहू का आपसी रिश्ता अधिकतर कैसा होता है इसकी पुष्टि करती यह कहानी बड़ी दिलचस्प है। इसे पढ़कर वह कहावत झूठी लगने लगती है कि, "बेटी ब्याह कर परायी हो जाती है और बेटा ब्याह कर बहू अपनी।" नैना में न कोई सहनशीलता है और न ही उसके मन में अपनी सास सुषमा के लिए कोई सम्मान या संवेदना। उसकी बातें व व्यवहार सुषमा को बिच्छू के डंक की तरह चुभते रहते हैं।
अकेलापन जीवन को कितना भयावह बना देता है इसे वही लोग समझ सकते हैं जिन्होंने इसका अनुभव किया हो। आजकल के व्यस्त जीवन में किसी को किसी के लिए फुर्सत नहीं। जब तक कोई अपना न हो बात कहने-सुनने वाला इंसान बहुत अकेला महसूस करता है। "वार्ड नंबर चार" की कहानी मित्रता और संग-साथ पर निर्भर है जिसमें सरू पति को खोकर और तनीषा अविवाहित जीवन के अकेलेपन से आपस में दोस्त बन जाती हैं। और अक्सर ही काम से अवकाश लेकर यहाँ-वहाँ की सैर करती रहती हैं। सरू के चोट लगने पर जब वह अस्पताल जाती है तो हर दिन तनीषा खाना आदि जरूरत की चीजें लेकर उससे मिलने आती है और उसका ख्याल रखती है। सरू के साथ काम करने वाला पीटर भी तनीषा का बहुत ख्याल रखता है। सरू का बेटा अमेरिका में है किन्तु सरू के जीवन का अकेलापन उसके मित्रों ने बाँट लिया है। पीटर के व्यवहार में सरू के लिए केवल मित्रता के भाव ही नहीं बल्कि उसके व्यवहार में जो कोमलता और शिष्टता है उससे सरू को बहुत सुकून मिलता है। जिसे वह नजर अंदाज नहीं कर पाती। और अपने दिवंगत पति के ऐंठन और झुंझलाहट भरे व्यवहार से तुलना करने लगती है। सोचती है कि पति होकर पुरुष क्यों बदल जाते हैं? क्या उनसे मित्रता की उम्मीद नहीं की जानी चाहिए?
पत्नी के प्रति असंवेदनशील होने वाले पुरुषों का कोई खास वर्ग नहीं होता। कोई भी पुरुष किसी भी बात को लेकर असंवेदनशील हो सकता है। जो औरतें अपने पति को देवता की तरह पूजती हैं उनके साथ भी ऐसा व्यवहार होते देखा जाता है। और यह बात बड़ी मुश्किल से पच पाती है। "क्षमारूपेण संस्थिता" में एक ऐसे मजदूर पति-पत्नी का वर्णन है जिसमे पत्नी की गर्भावस्था में भी पति बिना उसका ख्याल किये सारा भोजन स्वयं खा जाता है। और नीता इस बात को देखकर नाराज होती है। कहते हैं कि एक औरत ही औरत के लिए अपनी संवेदना प्रकट करती है।
इस देश में तमाम युवतियाँ ऐसी हैं जो काम करते हुए किसी तरह गुजारा करती हैं पर उनके पास रहने के लिए कोई ढंग की जगह नहीं होती और किसी ऐसे व्यक्ति को फंसाने की तरकीबें ढूंढती हैं जो अकेला और पैसे वाला हो। लेखिका ने इसे अपनी कहानी "पिछले पहर का चाँद" में बहुत अच्छी तरह से बयां किया है। जिसमें साठ साल के ऊपर के डेविड नाम के एक विधुर को, जिसके कोई बच्चा नहीं है, एक आधी उम्र की ईस्टर्न यूरोपियन लीडिया नाम की लड़की अपने जाल में फंसा लेती है। और उनके शादी करने के एक साल बाद एक बच्चे की वह माँ बन जाती है। डेविड जिसके अब तक कोई बच्चे नहीं थे उसकी खुशी का ठिकाना नहीं रहता। लेकिन करीब एक साल बाद लीडिया अचानक गायब हो जाती है। और डेविड की मौत के बाद जब उसका पता लगता है तो वह कठोर हृदय की औरत अपना बच्चा भी वापस नहीं लेने आती। वह बच्चा अनाथालय भेज दिया जाता है। औरत के ऐसे रूप की कल्पना करके मन काँप उठता है।
"बुरी बला" कहानी पढ़कर पता चलता है कि जब एक औरत पर बुरी बला आती है तो वह कभी-कभी स्वयं भी एक बुरी बला बन जाती है। आप पूछेंगे कैसे? तो इसे समझने के लिए पाठक को इस कहानी के पेंचीदा गलियारों में से गुजरना होगा। इसमें विभा नाम की एक औरत की मनोदशा को समझना होगा जो अपने पुत्र की खातिर जुबान बंद रखती है और पति को मनमानी करने देती है। लेकिन कब तक? जब पति की हरकतें सारी सीमायें तोड़ देती हैं तो उसके जीते जी भी एक पत्नी विधवा हो जाती है। पति के जीते जी ही कोई उसका संसार उजाड़ दे और उसका मंदिर खंडित कर दे वह यह सहन नहीं कर पाती। इस परिस्थिति में औरत की मनोदशा का अंदाजा लगाया जा सकता है। और तब उससे कुछ ऐसा हो जाता है जिसकी उसने कभी कल्पना भी नहीं की होगी। सबकी सहानुभूति पाते हुए एक दिन जब सच का खुलासा होता है तो उसे "बुरी बला" का खिताब मिल जाता है।
इस संसार में पुरुषों की वेवफाई के भी अलग-अलग नमूने देखने को मिलते हैं। औरत पर खुद को हावी करने में और उसके साथ वेवफाई करने में पुरुष बहुत चतुर होते हैं फिर वह चाहें कोई राजा हो या सामान्य पुरुष। "शो" कहानी इस बात का उदाहरण है। जिसमें सिम्मी की दो ऐसी स्त्रियों से मुलाक़ात होती है जिनसे एक ही पुरुष प्यार का नाटक रचाता रहा और उनकी भावनाओं से खेलकर उन्हें वेवकूफ बनाता रहा। सचाई जानने पर वह औरतें उस व्यक्ति को लात मार कर आपस में मित्र बन जाती हैं। और अपना गम भुलाने के लिए एक-दूसरे के साथ खाती-पीती और घूमती फिरती हैं। और एक दूसरे के साथ खूब खुश और मस्त रहती हैं।
देखा जाए तो यूके में रंग और जातीय भेद-भाव को लेकर गोरों की सोच में काफी परिवर्तन हो चुका है। पर यह एक अफसोस की बात है कि कभी-कभी लोग काले लोगों के संग असभ्यता का व्यवहार कर बैठते हैं। "ये दो हाथ" कहानी इसका सबूत है जिसमें बस में चढ़ने पर एक काली लेकिन ईमानदार महिला को बस का ड्राइवर अपनी गलतफहमी से बिना टिकिट की सवारी समझकर उसे चोर होने की गाली देता है। लेकिन वह महिला अपना बस पास दिखाकर प्रमाणित करती है कि वह चोर नहीं है।
और "डैफनी" एक ऐसी साहसी मिडवाइफ की कहानी है जो अपने आदिवासी पुरखों की स्मृतियों व उनकी मान्यताओं को संजोये हुए ऑस्ट्रेलिया "आयर्स" रॉक देखने आती है। उसे अपने पूर्वजों के इतिहास की पूरी जानकारी है। जिसके बारे में वह लोगों को बताती है और अपने मन में अपने पूर्वजों की आत्माओं का सम्मान करते हुए वह उस जगह को अपना तीर्थस्थल मानती है। उसके पूर्वजों का समय प्रकृति के संपर्क में गुजरता था और उनकी अपनी मान्यताएं हुआ करती थीं। वह लोग अपने पूर्वजों की बातों का उल्लंघन नहीं करते थे।
वह उन-उन जगहों का भ्रमण करती है जहाँ कभी उसके पूर्वजों के पदचिंह्न हुआ करते थे। उसका कहना था कि सभी धर्म पारलौकिक जगत में विश्वास करते हैं। लेकिन उन आदिवासियों के साथ जिस तरह का जातीय भेद-भाव और निर्मम व्यवहार हुआ उसके बारे में बताते हुए उसकी पीड़ा और कड़वाहट उसकी बातों में झलकते हैं। जो पाठक के मन पर भी अपनी छाप छोड़ जाते हैं।
सभी औरतों की भावनाएं एक सी होती हैं लेकिन उनकी अपनी भाग्य-रेखाएं अलग होने से उन सबकी अपनी एक अलग कहानी है। आज के समय ने स्त्री के जीवन व उसकी सामाजिक स्थिति को बदल दिया है। और इन कहानियों में नारी की तमाम तरह की छवियाँ उभरी हैं। सबके ही जीवन में कोई न कोई जख्म भरा हुआ है। जिन्हें पढ़कर लगता है कि औरत का जीवन हमेशा से ही अभिशप्त रहा है। लेखिका ने इस देश में रहते हुए यहाँ के माहौल को बहुत अच्छी तरह से देखा व समझा है व लोगों के जीवन की बारीकियों को समझते हुए उसका कोई भी पहलू उनसे छिपा नहीं रहा। उनके हृदय की संवेदनशीलता को उनकी लेखनी ने बखूबी उकेरा है। जीवन की हर समस्या और हर पहलू को उन्होंने अपनी कहानियों में जगह दी है।

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