ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
काश कि तुमसे मुलाकात कभी न हुई होती
01-Nov-2018 10:17 AM 1388     

दोपहर के समय होस्टल के सुनसान गलियारे में "चौधरी!" पुकार सुनाई दी। इसके बाद दरवाज़े का धड़ाके से बंद करने की आवाज़ और तेज़ कदमों की आहट सुनाई दी।
अनिता का फ़ोन है या कोई उससे मिलने आया। ज़ोरा होस्टल के कमरे के एक ही आरामदेह फ़र्नीचर पलंग पर अधलेटी अधबैठी पढ़ रही थी। वह थोड़ी देर पहले ही यूनिवर्सिटी से आई थी।
होस्टेल में रहने के आरंभ में जब भी "चौधरी..." पुकार सुनाई दी तो सोचती थी- यह कौन-सी लड़की है, यह चौधरी। कोई विदेशी होगी। फिर दो एक बार अनिता को लाल गाउन पहने टेलीफोन बाक्स के पास दौड़ती देखा। सुनहरे बालोंवाली देखने में मामूली लड़की, कोई विदेशी नहीं।
फिर ज़ोरा के नसीब खुल गये। अनिता चौधरी का ध्यान किसी तरह से उस पर गया। अठारह साल की देहाती लड़की राजधानी में आयी और जल्द ही उसे अच्छी सहेली मिली, वह भी कोई मामूली सहेली नहीं, ऐसी जिसका पति भारत में है, कोई दो साल का बच्चा अपने ननिहाल में रहता है और वह ख़ुद बिना किसी दिक्कत के पढ़ती है, तो नसीब खुलने की बात है न? दोनों अपनी फ़ुरसत साथ बिताने लगीं, सिनेमा देखने, घूमने निकलती थीं, कभी-कभी ऐसे ही एक-दूसरे के सामने बैठी पढ़ती थीं।
थोड़ी देर बाद गलियारे में दुबारा तेज़ कदमों की आहट सुनाई दी। कदम दरवाज़े के पास रुक गयी। दस्तक के तुरंत बाद दरवाज़ा खुल गया। करीबी सहेली के कमरे में तो कभी भी घुसा जा सकता है लेकिन अनिता का यह तरीका नहीं था। ज़ोरा चौंक गयी। अपना लाल गाउन पहने पीली पड़ी हुई अनिता दहलीज़ पर खड़ी थी।
"ज़ोरा, क्या आज तुम्हारे पास समय है? लेकिन हो न हो समय, तुम्हें मेरे साथ चलना है। तुमसे करीबी सहेली मेरी कोई नहीं है। चलोगी? मेरे वास्ते?"
"लेकिन कहाँ जाना है? क्या हुआ? आओ, मेरे पास बैठो।" सहेली को जगह देने के लिए ज़रा दीवार के पास सरक गयी।
"अभी-अभी अशोक का फ़ोन आया। तुम्हें शायद याद होगा, अशोक, उसने अमर के साथ यहाँ पढ़ा था, फिर दोनों वापस चले गये। अब काम से इधर आया है। अमर ने उसे मेरे पास भेजा है। अगर कोई बहाना करूँ तो होस्टल में दौड़ा आयेगा। यह नहीं टाल सकती। ज़ोरा, मैं अकेले में उससे मिलना नहीं चाहती। बहुत डरती हूँ।"
"किस चीज़ से डरती हो, यह तो बताओ।"
"अच्छा--- अमर चाहेगा कि मैं भारत आऊँ। इसीलिए अशोक को भेजा होगा।"
अब तक अनिता ने अपने भविष्य के बारे में ठीक-ठीक नहीं बताया था। ज़ोरा की बहुत पूछने की आदत नहीं है। करीबी सहेली से भी नहीं पूछती। अनिता जितना बताना चाहे, बताये, ठीक है। शायद अज बात कुछ स्पष्ट हो जाये।
"अच्छ, तुम नहीं चाहती न? अनिता, वह तुम्हें ऐसे ही नहीं उठा ले जा सकता।"
"लेकिन शायद बच्चे को उठा ले जाना चाहेगा।"
"अनिता, एक सी बात है। अगर अमर ख़ुद आता तो शायद --- लेकिन अशोक बच्चे को नहीं ले जा सकता। अक्ल से काम लो। और बच्चा तो तुम्हारे माता-पिता के पास है।"
"अशोक को पता मालूम है। वह कोई चार दिन तक रहेगा। मैं बहुत डरती हूँ। कम से कम मेरे साथ चलो।"
ट्राम में अनिता पसीने से तर हुई उँगलियों से ज़ोरा का हाथ पकड़े रही। एक सीट ख़ाली हुई।
"बैठो तो, तुम्हारे पैर जवाब दे रहे हैं। और ज़रा होश में आओ। थोड़ा हौसला करो।"
"कहना आसान है।"
ट्राम पुल पर चल रही थी। उजाला बूझ रहा था, मानो दुर्ग और नदी पर अँधेरा छाने से पहले एक बार फिर बीता हुआ दिन देखने का मौका मिल रहा हो। या नया दिन आने का वायदा मिल रहा हो। नया दिन कैसा होगा, क्या लायेगा? अनिता नयी अजीब सी निगाह से दुर्ग की ओर देख रही थी।
"यह सब कुछ छोड़ना है? क्यो?"
क्योंकि तुमने शादी कर ली, प्रिय सखी - यह ज़ोरा ने मन ही मन सोचा लेकिन कुछ नहीं कहा। यह सब कुछ ज़रूर बहुत मुश्किल है। अनिता का ओझल होना भी ज़ोरा के लिए मुश्किल होगा। ज़ोरा इसकी कल्पना तक नहीं कर सकती। और अनिता क्या कल्पना करे।
अशोक काफ़ी हाउस में खिड़की के पास की मेज़ पर इंतज़ार कर रहा था। अनिता ने आश्चर्यजनक हौसला कर लिया। ज़ोरा से उसका परिचय कराकर ख़ूब बातें करने लगी। बच्चे की बातें, नानी-नाना के पास उसका क्या हाल है। अब उसकी ज़बान खुल गई, हाँ चेक बोलता है और क्या, वहाँ उसे अँग्रेज़ी सिखानेवाला कोई नहीं है और क्यों सीखे। फिर अपने माता-पिता की बात की, उसे पढ़ने देने के लिए, बच्चे को सँभालने के लिए कितनी आभारी है, अपना पढ़ना समाप्त करने के बाद उनको बदल देगी। थीसिस लिखने की बात की। राजधानी के एक प्रकाशन-घर में नौकरी मिल सकेगी। बूढ़ी आंटी के पास रहेगी जो बड़े मकान में बहुत अकेली महसूस करती है। बच्चे को अपने पास रखेगी। सब कुछ बिलकुल ठीक रहेगा। एक-दूसरे शहर में भी नौकरी मिल सकेगी, माता-पिता का घर वहाँ नज़दीक है।
सच इतना था कि अनिता प्रकाशन-घर में नौकरी पूछने गयी थी और वहाँ इनकार नहीं मिला। पहले अपना पढ़ना समाप्त कर ले, फिर देखा जाएगा। दूसरा शहर उसके मां-बाप की इच्छा था, अनिता की नहीं। केवल बूढ़ी आँटी का थोड़ा सा भरोसा था जो अकेलापन से और बढ़ते हुए किराये से सच में थक गयी थी। लेकिन ज़ोरा ख़ूब समझ गयी अनिता यह सब कुछ क्यों बताती है और इस तरह से क्यों बताती है।
कुछ देर बाद अनिता घड़ी देखने लगी और सुबह बहुत सवेरे सोकर उठने की बात करने लगी। संकोच में विदा हुई।
"चलो ज़ोरा, नदी के किनारे चलें।"
नदी तक ख़ामोशी में पहुँचीं। कदमों के नीचे गिरे हुए सूखे पत्ते सरसरा रहे थे। नदी के ऊपर मुडेर के पास रुक गयीं। नदी के पार दूसरे किनारे पर ट्राम सरक रही थी।
"देखो, सिर्फ़ नदी के पार है और आवाज़ भी सुनाई नहीं देती। और कितनी दूर---र"
सुनने में इन बातों का कोई तर्क नहीं था लेकिन ज़ोरा अपनी सहेली के बारे में काफ़ी बहुत जानती थी। थोड़ी देर तक दोनों नदी की लहरों की आवाज़ चुपचाप सुनती रहीं।
"य़ूलिया ने किसी दिन युँ ही रेडियो खोला और इत्तिफ़ाक से हमारी नदी के जलपुरुष की कोई लोक-कथा प्रसारित हो रही थी। मैंने अंत तक सुन ली। ज़ोरा, मुझ से नही होगा--- मैं यहाँ से दूर नहीं जा सकती। माता-पिता की वजह से भी, हाँ, लेकिन अपनी वजह से भी---"
इस पर क्या कहना। बाद में ट्राम में दोनों ख़ामोश रहीं।
होस्टल के हाल में नीम अँधेरे में दीवार से लगी हुई आरामकुर्सियों में गिर गयीं। अपने-अपने कमरे में जाने का मन नहीं था। वहाँ दूसरी लड़कियाँ भी होंगी।"
"ज़ोरा, मुझे ख़ौफ़ है। शायद माता-पिता को फ़ोन कर दूँ कि अशोक के चले जाने तक बच्चे का ज़्यादा ध्यान रखें--- क्या राय है तुम्हारी?"
भोली अनुभवहीन ज़ोरा के लिए यह सवाल ज़्यादा मुश्किल था। फिर भी---
"अच्छा मुझसे पूछती हो तो मेरी राय है कि ऐसा न करो। तुम्हारे घर में टेलिफ़ोन भी नही है, पड़ोसी को फ़ोन करना पड़ेगा और ऐसी निजी बातें किसी बाहरवाले को सुननी नहीं चाहिए। लेकिन अगर इतनी ख़ौफ़ है तो यहाँ सब कुछ रहने दो, सुबह की रेल से अपने घर जाकर थोड़े दिन तक बच्चे को ख़ुद सँभालो। हफ़्ते बीच अचानक आने का कोई बहाना सोच लो। घरवालों को सच्ची बात बताना ज़रूरी नहीं।"
"ज़ोरा। मुझे मालूम था कि तुम सबसे अच्छी सहेली हो। तुम बच्ची जैसी लगती हो लेकिन दिमाग तेज़ है और ख़याल बढ़िया आते हैं और तुम से बढ़कर कोई सहेली नहीं है। ऐसा करूँगी। कल सवेरे।"
ख़याल--- अगर अनिता ख़ौफ़ से सन्न न होती तो उसे भी यही ख़याल आ जाता।
"लेकिन कल अपनी थीसिस का एक अध्याय डिपार्टमेंट में दिखाना है। तैयार है। क्या तुम वहाँ ले जा सकोगी?"
"और क्या। किसी बहाने से तुम्हारी क्षमा करा दूँगी। अच्छा अब ऊपर चलो, वह अध्याय दे दो।"
रात के बीच दरवाज़े पर हलकी सी दस्तक हुई। ज़ोरा की नींद वैसे भी अच्छी नही थी, तुरंत दरवाज़ा खोला। दहलीज़ पर अनिता, बहुत परेशान, अँधेरे गलियारे में उसके गाउन का लाल रंग ठीक से नज़र नहीं आता था।
"ज़ोरा, बुरा न मानो। मुझे अभी तक नींद नहीं आई। शायद पागल हो जाऊँगी।"
"यहाँ सोना चाहोगी? तो जल्दी मेरे बिस्तर में घुस जाओ, कहीं दूसरी लड़कियों की नींद ख़राब न हो।"
अनिता गाउन पहने बिस्तर में ज़ोर के कंबल के नीचे सिमट गयी। ज़ोरा भी दरवाज़े में चाबी देकर बिस्तर में घुस गयी।
"सुनो, यूलिया अच्छी रूममेट है लेकिन आजकल बस यही सोचती है कि किस नगरपालिक के दफ़्तर में शादी होगी और शादी के लिए क्या पहने--- ज़ोरा, तुम्हारा क्या विचार है? तुम्हें कैसी लगती हूँ?क्या बुरी औरत हूँ?"
"अरे नहीं, लोग मिलते हैं, बिछुड़ते हैं, ज़िंदगी है, सब चलता है। ऐसा तो हो जाता है। लेकिन कोई समाधान निकाल लेना चाहिए, अनिता, यह अनिश्चित हाल बहुत दिन तक सहन नहीं कर सकोगी।"
"सुनो, जब पेट से थी, अमर चला जा चुका था, माँ-बाप ताने देते थे और लोग फुसफुसाकर चर्चा करते थे तब मुझे लगता था कि इससे बुरा हाल नहीं हो सकता। लेकिन अब यह हाल उससे कहीं बुरा है। या तो अमर को बड़ा दुख दूँगी या अपने माता-पिता को।"
"---"
"हाँ, अब जाकर आख़िर कुछ-कुछ जानती हूँ।"
धीरे-धीरे से दबी हुई आवाज़ में ज़ोरा ने वह पूरा किस्सा सुन लिया जो टुकड़े-टुकड़े पहले से जानती थी।
अनिता के पढ़ने के पहले साल में बढ़ा प्रेम। बच्चे होने वाले का पता चला तो दफ़्तरशाही की दिक्कतों को जीतकर जल्दी-जल्दी शादी हुई थी। शादी के एक हफ़्ते बाद अमर चला गया। तब से मुलाकात नहीं हुई। अनिता के माँ-बाप को ख़ुशी ज़रूर नहीं हुई। लड़की के पढ़ने के शुरू होते ही यह! और छोटे नगर में चर्चा। अनिता का मन तब घर जाने को नहीं चाहता था। सवाल-जवाब, तानों और आँसुओं में सप्ताहांत गुज़रता था। तब ज़ोरा उसे नहीं जानती थी। हाँ आख़िर अनिता को घर जाना पड़ा, नवजात बच्चा लेकर अस्पताल से होस्टल में नहीं आ सकी।
बच्चे की आमद से सब कुछ बदल गया। ताने ख़त्म हुए। नानी ने नौकरी से निवृत्त होकर मुन्ने को सँभाल लिया और अनिता प्राग वापस आयी। पढ़ने में कोई विलंब भी नहीं हुआ। बच्चे का नाम बाप पर रखा - अमर। उसे मालूम था कि भारत में यह रिवाज नहीं है, फिर भी जब अमर दूरी में ओझल हुआ तो छोटे अमर को अपने पास रखना चाहती थी।
कभी-कभी छोटे देहाती घर के दरवाज़े पर दुÏश्चता की दस्तक होती थी। कहीं अनिता भी प्यारे मुन्ने को लेकर दूरी में ओझल न हो। लेकिन भविष्य की बातें कम होती थीं। वर्तमान की तरह-तरह की बातें करने का बहुत अवसर मिलता था।
"ज़ोरा, मुझे लगता है कि इस बीच बहुत बदल गयी हूँ। अमर भी बदल गया होगा। वह अपने व्यापार के बारे में लिखता रहता है। मानती हूँ यह महत्व की बातें हैं लेकिन उसे मालूम होना चाहिए कि यह सब कुछ मेरी समझ में ज़रा भी नहीं आता। कोई ख़ास दिलचस्पी भी नहीं है। और मैं उसको क्या लिखूँ। लड़के की दो चार बातें। वैसे भी उसने लड़के को कभी नहीं देखा। शायद हम एक-दूसरे को जानते भी नहीं हैं। सच यह है कि हम साथ कभी नहीं रहे। और अब यहाँ सब छोड़कर इतनी दूर चली जाऊँ, एक आदमी के पास जिसको वास्तव में नहीं जानती, जो मुझे नहीं जानता होगा। वहाँ क्या करूँगी? अगर वह इधर आकर बस जाए तो शायद काम चले--- उसके लिए यहाँ इतना अजनबीपन नहीं होगा।"
ज़ोरा और अनिता की दोस्ती लगभग दो साल से चली। इस बीच में सच में तरह-तरह के परिवर्तन हुए। अनिता अमर की बातें पहले से बहुत कम करती है। और ज़ोरा कभी-कभी स्वार्थ में सोचती है कि अनिता आख़िर यहाँ रहेगी, दूर नहीं चली जाएगी।
अनिता आगे बोली - "प्रेम हो जाता है" यह बीमारी जैसा है। इसके ख़िलाफ़ कुछ नहीं कर सकती। और फिर धीरे-धीरे ठीक हो रही हो। समझीं?"
"---"
"ज़ोरा, सुनो। कोशिश करो कि ऐसे झमेले में फँस न जाओ। मुझे तुमसे प्यार है, मेरा कहना मान लो। थोड़ा सा सुख इतने दुख के योग्य नहीं है। यह मान लो।"
"अच्छा, मेरी दादी का कहना था कि एक मिनट सुख, एक घंटा दुख।"
"मैं तो इस मुहावरे का शोध करती हूँ। एक मिनट सुख, चौबीस घंटे दुख। मुझे तो देखो। तेईस की हूँ और कितनी थक गई हूँ, बहुत बहुत, क्या बताऊँ।
आज तक अनिता ज़ोरा को कोई ख़ास थकी हुई नहीं लगी थी। सब होस्टलवाले खेलों में भाग लेती थी। फ़ोन का खेल!
शाम के समय "सच बोलो" खेल से शुरू होता था। जो हार गयी उसे अगले दिन टेलिफ़ोन करना पड़ा। दिन का ऐसे समय चुना गया जब सब खेलनेवालियाँ होस्टल में मौजूद थीं। टेलिफ़ोन बक्स में सब इकट्ठी हुईं। हारी हुई लड़की ने किसी सँस्था का नंबर घुमाया। सबसे अच्छा किसी मंत्रालय का नंबर था।
"प्लीज़, क्या डॉक्टर मूर्ख जी मौजूद हैं? या इन्जीनियर मूर्ख, यह सँस्था के मुताबिक चुना गया।"
सबसे अच्छा ऐसी सँस्था का नंबर होता था जिससे किसी लड़की को शिकायत थी।
"एक बार फिर बताइये।"
"डॉक्टर मूर्ख।"
एक मिनट ख़ामोशी। फिर जवाबः "नहीं, ऐसा कोई आदमी यहाँ काम नहीं करता।"
"अरे, मेरी तो राय है कि बहुत हैं।"
रिसीवर में खट और फ़ोन बक्स में कहकहे। लड़कियों का दिल कभी नहीं भरा। ऐसी सँस्थाएं बहुत थीं जिनसे किसी लड़की को शिकायत थी।
यह खेल अनिता का आविष्कार था।
हाँ एक दिन होस्टल के रसोईघर में कोई गड़बड़ हुई थी। लड़कियों को बताया गया कि जिनको फ़ुरसत है वे कुछ देर के लिए किचन में मदद करने आएँ। आलू छीलने थे। अनिता और ज़ोरा मदद करने गयीं। काम करते करते लड़कियाँ गाने सुनाने लगीं। अनिता को गाना कोई ख़ास अच्छी तरह से नहीं आता था। लेकिन उस दिन ज़ोरा का ध्यान इस पर गया कि गीत के शब्द "वह हाथ मिलाकर रो पड़ी, काश कि तुमसे मुलाकात कभी न हुई होती" गाते अनिता की आवाज़ सबसे ऊँची थी। अच्छा वह गीत उसके जन्मस्थान के आसपास का लोक-गीत था, हाँ। लेकिन अनिता के हाथ का आलू आधा रह गया और अनिता अन्यमनस्क आलू छीलती रही - छीलती रही---
यह अनिता को आज याद आ गया।
अनिता शायद उसका मन समझी।
"हाँ मैं अकसर ऐसी नहीं लगती हूँ। सुनो, अमर के चले जाने के बाद मुझे सिर्फ़ फिर मिलने के दिन का इंतज़ार था। यहाँ हो या भारत में। हाँ यहाँ मिलने की सोचती थी। बाद में मैंने सोचा कि ऐसे काम नहीं चलेगा, मुझे मामूली जीवन जीना है जैसा दूसरे लोग जीते हैं। पहले मुश्किल था लेकिन बाद में आदत पड़ गयी, मामूली जीवन जीने लगी।
इसी अवस्था में ज़ोरा उससे मिल गयी।
"सप्ताहांत को छोटा अमर, हफ्ते में स्कूल और होस्टल। मुझे यही बहुत होने लगा कि अमर कहीं ज़िंदा है, दूर ही सही। दुनिया से ओझल नहीं हुआ। और अब तो छोटा अमर, तुम और दो एक और सहेलियाँ बहुत हैं। पता नहीं आगे क्या होगा। शायद अगर अमर इधर आकर बस जाए तो --- लेकिन न अगर किसी दिन बच्चे को लेने इधर आये, उसे ले जाना चाहे?"
ज़ोरा के लिए, भोली ज़ोरा के लिए यह बहुत कठिन सवाल था। उसे अभी मालूम भी नहीं था कि माँ के लिए अपना बच्चा क्या है।
"देखो अनिता, अभी तक नहीं आया। शायद आएगा भी नहीं। और बच्चे को ऐसे ही नहीं उठा ले जा सकता। तुम्हें तो बस अपना निश्चय कर लेना है।
"---"
"चलो, अब थोड़ा सो लेना चाहिए। थोड़ी देर बाद हम दोनों को सोकर उठना है, तुम्हें रेलवे स्टेशन, मुझे यूनिवर्सिटी जाना है।"
अगले दिन तीसरे पहर ज़ोरा होस्टल में वापस आयी, बस बिस्तर में घुसने का मन था। लेकिन कपड़े भी नहीं बदल पायी जब उसका फ़ोन आया। भगवान के वास्ते, अनिता का घर से फ़ोन तो नही है? वहाँ क्या हुआ?
अनिता का फ़ोन नहीं था, अशोक का था।
"ज़ोरा, क्या तुम्हारे पास आज समय है? या किसी और दिन लेकिन मुझे यहाँ सिर्फ़ चार दिन तक रहना है। तुम से ज़रूरी बात करनी है।"
"मुझसे? अनिता से न? लेकिन अनिता यहाँ नहीं है।"
"नहीं तुम से। अच्छा आज मिल सकती हो?"
"ठीक है, मिल सकती हूँ।" मन ज़रा भी नहीं था, बहुत थक गयी थी। फिर भी --- मिलने का समय और स्थान कल जैसा तय हुआ। अशोक उसी मेज़ पर खिड़की के पास इंतज़ार कर रहा था।
"सुनो, कल अनिता की बातों से कान भर गये। मैं कोई बेवकूफ़ नहीं हूँ, यह तो देखता हूँ कि वह भारत जाना नहीं चाहती। फिर अमर को जो पत्र लिखती है, क्या बताऊँ, क्या यहाँ उसका कोई दोस्त है?"
अनिता के लिखे पत्र ज़ोरा ने कभी नहीं पढ़े। लेकिन ख़ूब याद रहा कि सहेलापन के आरंभ में अनिता अपने लाल गाउन पहने दरबान से पूछने दौड़ा करती तथा- "क्या डाक आयी है? क्या मेरे लिए कोई चिट्ठी आयी है?" और अब कभी-कभी यूँ ही बातों ही बातों में कहती है - हाँ, अमर को चिट्ठी लिखनी है। कल की बातचीत में भी अमर के पत्रों का उल्लेख किया।
तो ज़ोरा ने सवाल का बस इतना जवाब दिया - "जहाँ तक मुझे मालूम है, उसका कोई नहीं है।" होता तो ज़ोरा को ज़रूर पता होता। अनिता की समय-सारणी मोटे रूप से जानती थी। तो उसने निश्चय से जवाब जोड़ दिया - "उसका कोई दोस्त नहीं है। सत्यं एवं जयते।"
"अच्छा", अशोक ने बड़बड़ाया, फिर आगे बोला- "कल वह बोलती रही, बोलती रही, अमर ने जो संदेश भेजा वह उसे नहीं दे पाया। और अमर को सच बताना है कि अनिता का क्या इरादा है। अमर तो --- समझती हो न आदमी बदलता है। उसके घरवालों की इच्छा कभी नहीं थी कि वह शादी बाहर करे, लेकिन जो हुआ सो हुआ। अनिता से कोई शिकायत नहीं थी। यहाँ तक कि उन लोगों का कहना था कि उसका नाम कितना अच्छा है, हमारे नाम अनीता जैसा। फ़ोटो भी अच्छा लगा। लेकिन अब अनिता नहीं आती, उसका आना स्थगित होता जा रहा है। अब वे अधीर हो रहे हैं।"
"लेकिन शायद उनको मालूम है कि अनिता को अपना पढ़ना समाप्त करना है।" ज़ोरा ने आपत्ति की।
"यह मुझे मालूम नहीं। इससे उनको कोई ख़ास दिलचस्पी भी नहीं है। ख़ैर, अमर के लिए लड़की ढूँढ ली। अमर को अच्छी लगती है। इतनी अच्छी नहीं जितनी अनिता लगती थी। लेकिन यह ज़िंदगी है, आदमी अकेला रहना नहीं चाहता। और अमर को लगता है कि अनिता बदल गयी होगी। तो अगर अनिता ज़रा भी चाहे तो उस लड़की के घरवालों से ना कहेंगे, हालांकि वह लड़की काफ़ी अच्छी लगती है। अमर ईमानदार आदमी है, यहाँ उसका बेटा है --- यह तो तुम्हें बताना ज़रूरी नहीं।"
वह बातें करता रहा तो ज़ोरा मेज़ के मर्मर के तख़्ते को देखती रही। बारी बारी से बची हुई काफ़ी में चम्मच गुमाती और मर्मर के तख़्ते पर उंगली घुमाती रही। मर्मर का तख़्ता एक कोने से दूसरे कोने तक फूटा हुआ था। हमेशा ऐसा ज़रूर नहीं था। कैसे फूट गया? ज़रूर अचानक नहीं फूटा।
तख़्ता रहने दो, अशोक की बातें सुनो।
"कल अनिता को कुछ नहीं बता पाया और तुम्हारी मौजूदगी भी मुझे थोड़ा बरी लगी। फिर मैंने सोचा --- तुम दोनों अच्छी सहेलियाँ हो न? जैसे मैं और अमर दोस्त हैं न? दोनों एक दूसरे को तफ़सीली जानती होगी?"
ज़ोरा अनिता के बारे में बहुत कुछ जानती है। ज़ोरा के बारे में अभी भगवान की कृपा से या अफ़सोन की बात? - बहुत कुछ जानने को नहीं है। उसकी अध-भूली हुई छोटे-छोटे प्यार उसे बेतुके लगते हैं। क्या उसे कभी ऐसी समस्या हल करनी थी? कभी नहीं। चुप रही, सिर्फ़ हामी भरी।
"अच्छा तो अब अनिता को यह सब कुछ बताओ। एक बार फिर कहता हूँ। अगर अनिता ज़रा भी चाहे तो अमर उसका इंतज़ार करता है। अगर न चाहे तो उसे पूरी आज़ादी है। सिर्फ़ कानूनी समाधान होना है। मैंने ख़ुद अमर से कहा - यार, तुम्हारे बहुत बच्चे हो सकते हैं, बस इसका कुछ करो। हाँ, एक बात बाकी है। अनिता को पूरी आज़ादी मिल सकती है। हाँ लेकिन आज़ादी के अलावा अमर से कुछ नहीं मिल सकेगा। हाल ऐसा है और उस लड़की के घरवाले अनिता के बारे में कुछ नहीं जानते और --- वैसे भी---
"वह कुछ नहीं चाहेगी", यह ज़ोरा के मुँह से निकल गया और तुरंत अपने को थप्पड़ मारने का मन हुआ। क्यों बीच में बोली? लेकिन जो हुआ सो हुआ। तो आगे बोली- "मेरी राय है --- हाँ कानूनी हल होना चाहिए। और यह भी ज़रूरी है कि अमर अनीता को यह सब कुछ चिट्ठी में लिख दे। अनिता भी अमर को लिख दे। दोनों के पास यह समझौता लिखित रूप में रहे।"
इस बार विदाई बिना संकोच के हुई। ज़ोरा आती हुई ट्राम में जल्दी चढ़ गयी। कौन-सी ट्राम है इस पर ध्यान भी नहीं दिया। गनीमत से ट्राम पुल की ओर मुड़ गयी।
ट्राम पुल पर चल रही थी तो ज़ोरा ने अनिता की कलवाली जैसी निगाह से दुर्ग की रूपरेखा की ओर देखा। नदी की सतह पर सड़क-बत्तियों की रोशनी पड़ती थी। एक धारा रोशनी, एक धारा अँधेरा। शायद जीवन में भी ऐसा होता है। शायद अनिता अब रोशनी की धारा में दाख़िल हुई। अभी उसे मालूम नहीं है। कितने दिन के लिए? नदी की सतह चमकती है। हमारी अपनी नदी। इससे दिल लगी हुई है, बहुत बहुत। फिर भी सतह के नीचे नदी अंधेरी है, रहस्यात्मक, अपारदर्शी है। वहाँ क्या छिपता है? यह किसे मालूम है? एक सी नदी में दुबारा प्रवेश कोई नहीं कर सकता, नदी का जल बहता रहता है, बह जाता है, नया जल आता है। नदी का रूप बदलता रहता है---
ट्राम थियेटर के पास से गुज़र गयी, रहस्यात्मक नदी पीछे रह गयी। ज़ोरा को थोड़ी सी राहत मिली। आज ज़रूर अच्छी नींद आयेगी।
कल अनिता को फ़ोन करे? नहीं, तब तो पड़ोसियों के घर फ़ोन करना पड़ता। काश अनिता जल्दी वापस आये, ताकि उसे पता चले कि इत्मीनान से जी सकती है।
काश कि अमर अपना इरादा न बदले। देहाती घर के दरवाज़े पर दुÏश्चता का खटखटाना बंद होगा। अनिता किसी को दुख नहीं देगी। इत्मीनान से प्राग वापस आयेगी, अपनी थीसिस पूरी कर देगी, आख़िरी इम्तिहान की तैयारी करेगी। ज़ोरा की सहेली कहीं दूरी में ओझल नहीं होगी। सब बिलकुल ठीक होगा।
सिर्फ़ दो एक ज़रा-सी बातें रह गयीं।
अनिता को सब कुछ अकेले संभालना पड़ेगा।
अमर अपने पहलौटे को कभी नहीं देख पायेगा।
छोटा अमर अपने बाप को कभी नहीं देख पायेगा।

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