ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
हम क्यों करते हैं भाषा की चिंता
02-Jul-2019 10:28 AM 951     

केवल भारत में ही नहीं दुनिया के किसी भी देश में किसी के भी घर में कोई बेटा या बेटी पैदा हो और वह एक वर्ष के भीतर अगर बोलना शुरू न करे तो मां-बाप चिंतित हो उठते हैं कि बच्चा क्यों नहीं बोल रहा है। दुनिया के किसी भी घर में पहली चिंता यह नहीं होती कि भविष्य में बच्चे का घर कैसा होगा, नौकरी कैसी होगी, पत्नी कैसी होगी, दोस्त कैसे होंगे, यह रोजगार क्या करेगा, बल्कि सबसे पहली चिंता माता-पिता को यही होती है कि इसकी बोली-बानी का क्या होगा। इसीलिये तो हर देश में बोली जाने वाली भाषा और उसकी बोलियाँ माताओं के कण्ठ में बस जाती हैं। दरअसल वे ही शिशुओं की मातृभाषाएँ होती हैं। दुनिया का कोई शिशु अंतरराष्ट्रीय भाषा में बात करना शुरू नहीं कर सकता। उसे जन्म लेने के बाद स्थानीय भाषा के स्वरों में ही और उसके व्यंजनों में ही अपने जीवन की शुरूआत करना पड़ती है। फिर बड़ा होकर वह शिशु जीवन की ज़रूरतों के अनुसार तरह-तरह की भाषाएँ सीख सकता है और किसी अंतरराष्ट्रीय भाषा के चंगुल में फाँसा जा सकता है।
जो बच्चे 21वीं सदी की शुरूआत में पैदा हुए वे 19 साल के हो गये हैं। आमतौर पर संसार के हर देश में वयस्क होना 18 वर्ष ही माना गया है - अगर कहीं 21 हो तो तीन साल बाद हो जायेंगे। ये बहुत सारे बच्चे अपने-अपने देश की भाषाओं में पल बढ़कर एक ऐसी दुनिया की तरफ अपना-अपना वीजा बनवाकर चले जा रहे हैं जो इनसे किसी एक भाषा की मांग कर रही है। कोई हिंदी से जा रहा है, कोई जर्मन से जा रहा है, कोई चीनी से जा रहा है तो कोई रूसी से जा रहा है। कहने का मतलब ये कि हर कोई अंग्रेजी में जा रहा है। हम भारत के लोग यह दावा करते हैं और जो एक हद तक सही भी है कि दुनिया में अंग्रेजी के बाद हिंदी ही दूसरी बड़ी भाषा है और उससे भारत के लोगों को बहुत आशा है, लेकिन व्यवहारिक तौर पर हम यह देख रहे हैं कि वे भारतीय जो सदियों पहले और अब भारत से दुनिया के दूसरे देशों में जा रहे हैं - हिंदी से सरोकार जरूर रखते हैं, उसमें कविता-कहानियाँ भी लिखते हैं और वे जिन-जिन देशों में गये हैं, जाने अनजाने वहाँ के हिंदी लेखक भी कहलाने लगते हैं, हो सकता है उन्हें वहां हिंदी लेखक की एक बड़ी प्रतिष्ठा भी मिल जाती हो, जो संभवतः आज की दुनिया में भारत में सूर्यकांत त्रिपाठी "निराला" की न रही हो - ऐसे लेखक कभी-कभी अपने देश आते हैं, पर उनका देश और उनकी भाषा उनसे हमेशा छूटी रहती है। वे अपनी मातृभाषा का इस्तेमाल सुबह की एक कप चाय की तरह करते हैं और बाद में शाम तक उनका जीवन एक ऐसी भाषा मे गुजरता है जिसमें उनके बने रहने का मकसद सिर्फ अपना पेट भरना है, क्योंकि उनकी बुद्धि उस भाषा से नहीं चलती है। वह तो उनकी मातृभाषा से ही चलती है। इस तरह अपना देश छोड़कर दूर दुनिया में अपनी मातृभाषा की स्मृति ले जाने वाले लोग अपना पेट अंग्रेजी से भरते हैं और उनके मन के किसी दबे-छुपे कोनों के अँधकार में उनकी मातृभाषा कभीकभार चकमक की चिंगारियों की तरह चमकती रहती है। ये ऐसी चिंगारियां होती हैं जिनसे थोड़ी देर के लिये बीड़ी तो जलाई जा सकती है, लेकिन जिंदगी का चूल्हा नहीं फूँका जा सकता है, वह चूल्हा तो अब अंग्रेजी के स्पार्किंग लाइटर से ही जलता है।
हमने कभी पहले भी किसी संपादकीय में यह स्मरण करने की कोशिश की है कि मनुष्य का सबसे मौलिक आविष्कार भाषा ही है। बाकी सब तो खोज है जो दुनिया में पहले से था और हमने पता लगा लिया। विज्ञान इसी को कहते हैं। उदाहरण के लिये अगर न्यूटन महाशय नहीं भी होते और उन्होंने पृथ्वी पर गिरते सेब को न देखा होता, तब भी पृथ्वी में गुरुत्वाकर्षण तो था। सूर्य के चक्कर पृथ्वी लगाती है या सूर्य पृथ्वी के चक्कर लगाता है, यह विवाद भी अगर हल कर लिया जाये तब भी कौन किससे चक्कर लगा रहा है यह तो पहले से तय था। पानी ऊंचाई से नीचे की तरफ बहता है यह भी पहले से तय था। इस तरह की अनेक बातों को अपनी खोज कहना भी शायद गैरजरूरी है। बल्कि कहना यह चाहिये कि यह एक तरह से अस्तित्व की पहचान है। जो समय-समय पर अनेक लोगों को होती रहती है, लेकिन भाषा अस्तित्व की इस पहचान को भावार्थ प्रदान करती है और इस पृथ्वी पर अलग-अलग भाषाएं बोलने वाले जितने भी मनुष्य हैं इस दुनिया के उतने ही भावार्थ है। अगर एक रूपक के सहारे कहें तो भाषा हर व्यक्ति की अपनी तो होती ही है, लेकिन बहुत से व्यक्तियों के मिल जाने के कारण वह एक बहुसंख्यक समाज की भी होती जाती है और अगर समाजवाद के प्रवर्तकों को बुरा न लगे तो कहा जा सकता है कि भाषा ही सबसे बड़ी समाजवादी है, क्योंकि समाजवाद अगर दुनिया में कहीं है और जीवन में शायद नहीं है तो अंततः भाषा में वह अब भी बचा रहेगा।
आजकल दुनिया में अनेक तरह के व्यवसाय चल रहे हैं। पिछली सदियों से भाषायी और अंतरराष्ट्रीय संबंध को लेकर भी लेखकों और कलाकारों के बीच एक व्यापार का सिलसिला शुरू हुआ है। चित्रकार संसारभर की दीर्घाओं में अपने चित्र लगाते हैं। चूंकि संसार में कला करमुक्त है इसलिये उसका एक बड़ा व्यवसाय है। कला के नाम पर अ-कला भी टैक्स बचाने के लिये बिकती रहती है। संगीतकार अपने तानपुरे लिये हुए दुनियाभर में डॉलर कमाने के लिये घूमा करते हैं, लेकिन साहित्य की हालत विचित्र है। जिस किसी भी देश में जाओ, उस देश के साहित्य और वहाँ रहने वाले विदेशियों के साहित्य की एक प्रतियोगिता-सी चलती रहती है। जो बाहर से आये हैं वे अपने देश पर रीझते हैं और जो उसी देश रहते हैं वे उन पर दवाब बनाते हैं कि आप उनके साहित्य के मुरीद हों। पर देखने में यही आता है कि न कोई अपने देश के साहित्य पर रीझा है और न ही कोई किसी का मुरीद हुआ है। साहित्य के नाम पर पूरी दुनिया में कुछ नारे चलते हैं और इन नारों से दूकानदार पैदा होते हैं। 21वीं सदी में दूकानदारों को किसी भी देश में आने-जाने की छूट मिली हुई है। जहाँ वे अपने-अपने ग्राहकों को खोजकर और संस्कृति के नाम पर वहां की सरकारों से भी कुछ आर्थिक मदद लेकर साहित्य और कलाओं की दुनिया को सिर्फ एक पर्यटन व्यापार में तब्दील करते जा रहे हैं। इस पूरी हकीकत में सृजन और विचार कहीं नहीं है। सिर्फ एक विचरण है जो पृथ्वी को रौंद रहा है। जीवन न तो अपनी मातृभूमि से जुड़ रहा पा रहा है न उस भूमि से जहाँ वह पेट पालने गया है। इस दुनिया का सबसे बड़ा संकट यह है कि आंतों की चिंता करने वाले लोग अब हीरो हो गये हैं और आत्मा की चिंता करने वाले लोग मात्र पुस्तक विक्रेता। उनकी किताबें अब इस दुनिया में बिकती नहीं हैं।
दुनिया की दूसरी संस्कृतियाँ अपनी जानें, हम भारत के लोग इतना जानते हैं कि शब्द नहीं तो संसार नहीं। इसीलिये भारत में गूंगा होना अभिशाप है। भले ही यह दिखाई न पड़े पर बोलना और सुनना जरूर आना चाहिये। देखने में क्या है। लोग अपनी-अपनी भावना से पता नहीं क्या नहीं देख लेते हैं और यह देखना हमेशा अधूरा रहा आता है। लेकिन अपना बोला हुआ भीतर से आता है और जो उसको सुनते हैं वह उसके भीतर तक जाता है। इसलिये बोलने का संबंध और सुनने का संबंध वास्तविक है। दुनिया में दिखने जैसा कुछ भी नहीं है, सब कुछ अनुभवगम्य है और यह अंततः भाषा के अलावा और किसी विधि से अभिव्यक्त नहीं होता। इसीलिये हरेक मां-बाप को पूरे संसार में यही चिंता होती है कि जो भी जीवन उत्पन्न हुआ है वह कम से कम बोलने और सुनने में सक्षम हो। देखने में कोई खास सार नहीं। संसार में ऐसे उदाहरण मिलते हैं कि अंधे संगीतकार हुए हैं और लेखक भी। अगर शब्द और स्वर बिना देखे संभव हैं तो कुछ भी देखने की जरूरत ही क्या है। सब कामना करते हैं कि कोई कुछ अच्छा बोले, कोई कुछ अच्छा सुने। ऐसा कौन है जो शोर से भरी दुनिया में बहरा होना चाहता है और शब्दहीन दुनिया में गूंगा होना चाहता है।
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गिरीश कर्नाड नहीं रहे। वे भारत के सुदूर दक्षिण में पैदा हुए। उनकी पहचान एक मेधावी छात्र, जिज्ञासु नाटककार, नाट्य निर्देशक, अनुवादक, कवि और समाजकर्मी के रूप में पूरी दुनिया में बनी। वे 20वीं और 21वीं सदी की सीमारेखा पर एक निर्भय कला मानस से संसिक्त मूल्यवान उपस्थिति थे। उन्हें अपने समय के संघर्षों, राजनैतिक दायित्वों और नागरिक बोध का पूरा ख्याल था। वे एक कलाकार के रूप में साहसी तो थे ही अपने समय की सत्ता के खिलाफ, अपने गले में एक तख्ती लटकाकर, अपने शहर के चौराहे पर खड़े हो सकते थे। उन्होंने हिंदी और कन्नड की अनेक फिल्मों में अभिनेता की भूमिका निभाई। सिर्फ इतना ही नहीं, उन्हें भरत मुनि के नाट्य शास्त्र यानि भारतीय नाट्य परंपरा तथा पश्चिमी नाटक की गहरी समझ थी और उन्होंने अपनी इस समझ को अपनी नाट्य कला में नूतन रूप प्रदान किया।

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