ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
हिन्दी और हिन्दुस्तानी का प्रश्न फिर क्यों
01-Sep-2018 08:01 PM 1071     

विगत दिनों सिनेमा पटकथा लेखक और उर्दू के कवि श्री जावेद अख्तर ने हिंदुस्तानी का सवाल उठा कर गढ़े मुर्दे उखाड़ने का प्रयास किया है। शायद जावेद जी भूल गए हैं या भूलने का बहाना कर रहे हैं या सुर्खियों में आने के लिए ऐसे ब्यान दे रहे हैं। उन्हें अगर ध्यान न हो तो बता दें कि स्वतंत्रता-प्राप्ति के समय गठित संविधान सभा में संविधान-निर्माताओं के बीच हिन्दी और हिंदुस्तानी के पक्ष और विपक्ष में कई मुद्दों पर बहुत ही लंबी बहस और चर्चा हुई थी और हिन्दी तथा हिंदुस्तानी के बीच मतदान भी हुआ था। अंतत: 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने हिन्दी को राजभाषा का दर्जा दे दिया था। फिर क्यों जावेद अख्तर जी इस संवैधानिक मुद्दे को 70 साल बाद उठा रहे हैं। यह देखा गया है कि सिनेमा जगत से जुड़े लोग सुर्खियों में बने रहने के लिए कोई-न-कोई विवादास्पद मुद्दा उठा देते हैं और हम लोग भी उसमें अकारण शामिल हो जाते हैं।
आज़ादी की लड़ाई के दौरान हिन्दी और उर्दू का मामला भी उठा था, बाद में राजनैतिक कारणों से हिंदुस्तानी शब्द की चर्चा होने लगी। वास्तव में उर्दू भाषा का प्रयोग सर्वप्रथम 18वीं शताब्दी में मुहम्मद शाह रँगीले के समय से माना जाता है। 18वीं शताब्दी से पहले तो उर्दू का नाम ही नहीं मिलता जबकि मुसलमान भारत में छठी-सातवीं शताब्दी से आने लगे थे। 13वीं शताब्दी में अमीर खुसरो (1253 ई. 1325 ई.) अपने को हिंदुस्तानी तुर्क मानते हुए हिन्दी या हिंदवी को हिंदुस्तान की भाषा मानते थे। 1347 ई. में बहमनी शाह के समय हिन्दी का प्रयोग मिलता है। मुहम्मद बाकर आगाह (1743-1805) और सैयद इंशा की दरियाए लताफ़त (1808) के अनुसार उर्दू शब्द का प्राचीनतम प्रयोग मसहफी की रचना में (18वीं शताब्दी के उत्तराद्र्ध) में मिलता है। उस समय अरबी-फारसी मिश्रित हिन्दी को उर्दू नहीं "पुड़दूँ" कहा जाता था। बाद में हिन्दी और संस्कृत के प्रभाव से उर्दू शब्दों का हिन्दीकरण होने लगा। फारसी में जंगल के बहुवचन जंगलात, सुल्तान के बहुवचन सलातींन, मुल्क के बहुवचन ममालिक और ज़िला के बहुवचन अज़ला होते हैं जिनका उर्दू में क्रमश: जंगलों, सुल्तानों, मुल्कों और जिलों के रूप में इस्तेमाल किया जाने लगा। उर्दू कोई अलग भाषा नहीं है बल्कि अरबी-फारसी लिपि में लिखी जाने वाली खड़ी बोली हिन्दी का ही एक रूप है। वास्तव में लखनऊ में "मतरुकात (अलगाववादी) सिद्धांत" के अनुसार हिन्दी में अरबी-फारसी के शब्द रखे जाने लगे। उर्दू पहले शाही घरानों और दरबारों की भाषा थी, किंतु आज़ादी के समय जन-सामान्य में प्रयुक्त होने लगी। इसलिए हिन्दी और उर्दू के अलग-अलग भाषा होने के पीछे यही मतरुकात या अलगाववादी सिद्धांत है। मैं एक घटना का यहा ज़िक्र कर रहा हूँ। 1975 में पंजाब के पटियाला में पंजाबी विश्वविद्यालय में एक अखिल भारतीय उर्दू सम्मेलन आयोजित हुआ था। उसमें मैंने जब हिन्दी और उर्दू की समानता बताते हुए और उर्दू को हिन्दी भाषा की एक शैली या रूप के प्रमाण देते हुए कहा था तो उस समय उर्दू के अनेक प्रोफेसर और विद्वान मुझसे नाराज़ हो गए थे। उस समय इस अधिवेशन की अध्यक्षता जामिया मिलिया इस्लामिया के वाइस चांसलर प्रो. मसूद हुसैन खान कर रहे थे। वे भाषा विज्ञान और उर्दू के एक प्रतिष्ठित विद्वान भी थे। उन्होंने उस गरमागरम बहस को बंद कर अपने अध्यक्षीय भाषण में मेरे शोधपत्र का बचाव करते हुए कहा था कि भाषाविज्ञानी निष्पक्ष रूप से अध्ययन और विश्लेषण करता है। इसलिए शोधपत्र के वाचक गोस्वामी जी के निष्कर्ष सही हैं कि हिन्दी और उर्दू एक ही भाषा के दो रूप हैं। वास्तव में इस अलगाववादी सिद्धांत का लाभ उठाते हुए अंग्रेजों ने गहरी साजिश रची थी। फोर्ट विलियम कॉलेज के गिलक्राइस्ट ने "हिंदुस्तानी" के नाम से उर्दू की तीन शैलियाँ बताईं - (हाई कोर्ट की) फारसी शैली, (मुंशियों की) बीच की शैली अर्थात मध्यमार्गी शैली और जनसामान्य की हिंदवी अर्थात गँवारू शैली। उन्होंने बीच की शैली हिंदुस्तानी को बढ़ावा देने पर बल दिया। सेना और पुलिस में हिंदुस्तानी के नाम से उर्दू की कामचलाऊ शिक्षा दी जाती थी। निचली अदालतों में तो उर्दू का बोलबाला था ही। इसलिए अरबी-फारसी मिश्रित उर्दू हिंदुस्तानी के रूप में ढलती गई। 1872 में एक विदेशी विद्वान डाउसन ने हिंदुस्तानी भाषा का जो व्याकरण लिखा, उसे उर्दू का पर्याय ही माना गया। एक अन्य ब्रिटिश विद्वान रिचर्ड टेंपल ने हिन्दी और उर्दू में कोई अंतर नहीं माना। 1869 में मद्रास के गवर्नर विलियम्स ने लिखा कि फोर्ट विलियम कॉलेज की देख-रेख में जो हिंदुस्तानी पनपी है, जिसे मुंशियों ने अपनाया है और जिसे मुसलमानी मदरसों में लड़कों ने सीखा है, वह हिंदुस्तान के किसी भी भाग में नहीं बोली जाती।
भाषाविज्ञानी हिन्दी की तीन मुख्य शैलियाँ मानते हैं - 1 संस्कृतनिष्ठ हिन्दी, 2. अरबी-फारसी मिश्रित हिन्दी (जिसे उर्दू कहते हैं) और सामान्य बोलचाल की हिन्दी (जिसे हिंदुस्तानी कहा जाता है)। एक चौथी शैली अंग्रेज़ी मिश्रित हिन्दी (अर्थात हिंगलिश) भी पनपी है। संरचना की दृष्टि से हिन्दी के इन सभी रूपों में पूरी-पूरी समानता मिलती है। प्रो. अशोक केलकर जैसे भाषाविज्ञानी ने हिन्दी और उर्दू के इस मिश्रित रूप को हिंदुस्तानी न कहकर "हिर्दू" कहा है। जब किसी भाषा का व्यापक प्रयोग होता है तो उसके कई रूप जन्म लेते हैं। इसी प्रकार हिन्दी के भी कई अन्य रूप मिलते हैं, जैसे मुंबइया हिन्दी, कलकतिया हिन्दी, मद्रासी हिन्दी, पंजाबी हिन्दी, फ़िजी हिन्दी, मॉरीशसी हिन्दी, सूरीनामी हिन्दी।
इसी प्रकार अंग्रेज़ी के भी कई रूप हैं- ब्रिटिश इंगलिश, अमेरिकन इंगलिश, ऑस्ट्रेलियन इंगलिश, इंडियन इंगलिश, बंगाली इंगलिश, मद्रासी इंगलिश आदि। मेरे निर्देशन में हैदराबादी हिन्दी, कोचीनी हिन्दी, इंडियन इंगलिश विषयों पर शोधकार्य हुए हैं।
स्वतंत्रता संग्राम के दौरान हिन्दी-उर्दू की जो लड़ाई चली थी, वह भाषा की लड़ाई नहीं थी, बल्कि भाषायी अस्मिता की लड़ाई ही थी। महात्मा गांधी ने इस बात को भाँप लिया था और उन्हें यह आशंका थी कि इस विवाद से भारत के स्वतंत्रता-संग्राम में बाधा पड़ सकती है। इसलिए उन्होंने उर्दू-नुमा भाषा-शैली को हिंदुस्तानी की संज्ञा दी जो पुरुषोत्तम दास टंडन जैसे विचारकों और हिन्दी-समर्थकों को उचित नहीं लगा। गांधी जी समय-समय पर अपनी बात कहते रहते थे। सन् 1909 में उन्होंने ने "हिन्दी, स्वराज और होमरूल" लेख में लिखा था "सारे हिन्दुस्तान के लिए तो हिन्दी होनी ही चाहिए। उसे उर्दू या नागरी लिपि में लिखने की छूट रहनी चाहिए। ऐसा होने पर हम आपस के व्यवहार में से अंग्रेजी को निकाल बाहर कर सकेंगे।"
उन्होंने हिन्दी बनाम उर्दू, हिन्दी या हिन्दुस्तानी, हिन्दुस्तानी, हिन्दी और उर्दू के बारे में "हरिजन सेवक" के 17 जुलाई, 1937, 3 जुलाई, 1937, 29 अक्तूबर, 1938 और 8 फरवरी, 1942 के अंकों में हिन्दी, उर्दू और हिंदुस्तानी के विवाद पर अपनी लेखनी चलाई थी और इसी समस्या पर वे अपने विचार प्रस्तुत करते रहे। उस समय एक वर्ग हिन्दी का प्रबल समर्थक था और दूसरा वर्ग उर्दू का। इस विवाद से गांधी जी काफी आहत थे। उन्होंने दोनों वर्गों की गलतफहमी दूर करने के लिए कहा कि हिन्दी, उर्दू और हिन्दुस्तानी शब्द उस एक ही ज़बान के सूचक हैं, जिसे उत्तर भारत में हिन्दू-मुसलमान बोलते हैं, जो देवनागरी या अरबी-फ़ारसी लिपि में लिखी जाती है। इस बारे में उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि हिन्दी देवनागरी लिपि में लिखी जाती है और उर्दू अरबी-फ़ारसी लिपि में लिखी जाती है, किंतु इन दोनों भाषा-रूपों का मौखिक रूप हिन्दुस्तानी है जिसे सभी वर्ग बोलते हैं। यहाँ यह बात उल्लेखनीय है कि मुसलमानों ने अपने मज़हबी अस्तित्व को अलग बनाए रखने के लिए इस मध्यमार्गी हिंदुस्तानी को नकार दिया था। इसका अभिप्राय यह है कि हिंदुस्तानी कोई भाषा नहीं है। गांधी जी ने दोनों वर्गों के तुष्टीकरण के लिए राजनीतिक आधार का आश्रय लेते हुए हिन्दी-उर्दू के बोलने वाले रूप को हिंदुस्तानी नाम ही दे दिया। वास्तव में उस समय हिन्दू-मुस्लिम में अविश्वास और अलगाव की जो भावना पैदा हो रही थी उसे वे दूर करना चाहते थे।
एक बात और आज़ादी के बाद हिन्दी में पारिभाषिक शब्दावली के निर्माण में उस्मानिया विश्वविद्यालय ने सामान्य बोलचाल अर्थात हिंदुस्तानी भाषा के शब्द अपनाने या गढ़ने पर बल दिया था किंतु यह अनुभव किया गया कि इस प्रक्रिया में कोई सिद्धांत नहीं बन पा रहा था। यह बात उर्दू वालों को खुश करने के लिए कही गई थी, किंतु पारिभाषिक शब्दावली के निर्माण में आ रही कठिनाइयों को देखते हुए संस्कृत भाषा को आधार बनाना पड़ा जिसमें शब्द-निर्माण की उर्वरा शक्ति विद्यमान है। उर्दू ने शब्द-निर्माण में अरबी-फारसी के शब्दों को अपनाया है, जैसे अंग्रेज़ी ने लेटिन और ग्रीक भाषाओं से शब्द लिए हैं।
राजनीतिक तुष्टीकरण के कारण हिन्दी और उर्दू अलग-अलग भाषाओं के रूप में बंटकर अपनी-अपनी जगह काम में तो आ रही हैं, लेकिन हिंदुस्तानी का क्या हश्र हुआ। यह इस बात से स्पष्ट होता है कि 1971 की जनगणना के अनुसार हिंदुस्तानी बोलने वालों की संख्या मात्र 11 हज़ार थी और 1991 की जनगणना की सूची में से दक्खिनी के साथ-साथ इसे भी हटा दिया गया। वस्तुत: हिन्दी जन-जन की भाषा है, हिंदुस्तानी नहीं। हिन्दी ने अपनी सार्वदेशिकता, सार्वभौमिकता, सर्वसमावेशिकता, व्यापकता, बहु-प्रयोजनीयता, सहजता और जीवंतता के कारण विश्व के मानचित्र में अपना स्थान बना लिया है। इसने संस्कृत, अरबी, फारसी, तुर्की, अंग्रेज़ी, भारतीय भाषाओं आदि अनेक भाषाओं के शब्दों को अपनाकर सर्वसमावेशी रूप धारण कर लिया है। इसलिए अब समय आ गया है कि हिन्दी को केवल राजभाषा तक सीमित न रख उसे राष्ट्रभाषा के पद पर गौरवान्वित किया जाना चाहिए। हिंदुस्तानी भाषा के बारे में सोचना यथार्थ से परे जाना है और एक मिथ्या विवाद खड़ा करना है। दु:ख तो इस बात का है कि कुछ लोग ऐसे विवाद खड़े कर अपनी अहमियत दिखाने का प्रयास करते हैं। भाषा के अर्थात हिन्दी, उर्दू और हिंदुस्तानी के ऐतिहासिक संदर्भ को जाने बिना, हिन्दी और हिंदुस्तानी की वर्तमान स्थिति को पहचाने बिना तथा भाषायी विवादों से पैदा होने वाले परिणामों को समझे बिना ऐसे वक्तव्य देश, समाज और भाषा का अहित ही करते हैं।

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