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क्यों और कैसी शिक्षा
01-Mar-2018 02:05 PM 1830     

सृष्टि में जीव और उसके जीवन की एक निष्पक्ष और निरपेक्ष व्यवस्था आदिकाल से है। यह व्यवस्था सृष्टि के संतुलन को बनाए रखती है। उसमें किसी प्रजाति का बढ़ना, नष्ट होना, परिस्थितियों के अनुसार परिवर्तित होकर नया रूप धारण करना आदि सब स्वाभाविक हैं। वे किसी के भले बुरे के लिए सायास किए गए काम नहीं है। इसलिए समस्त सृष्टि की व्यवस्था निरपेक्ष होने के साथ-साथ निर्दोष भी है। जीना एक मूल प्रवृत्ति है। सृष्टि में सब अपना जीवनयापन कर रहे हैं। उसमें न तो व्यापार है, न शोषण है। सब अपनी क्षमता से जीते हैं और न जी सकने की स्थिति में मर जाते हैं।
भोजन ढूँढ़ने वाले मनुष्य की स्थिति भी अन्य पशुओं से भिन्न नहीं थी। पशुपालन और कृषि से यह स्थिति बदलनी शुरू हुई। इसी के कारण गुलाम प्रथा और गुलामों का व्यापार शुरू हुआ जिसने अमरीका के विशाल भूभाग के विकास और उसमें काले पसीने की कहानी लिखी। मशीनों के आने से ये महत्त्वपूर्ण गुलाम अचानक अप्रासंगिक हो गए। कल के संसाधन काले लोग "ह्वाइट मैन्स बर्डन" हो गए। अब तो यदि काम नहीं है या गुलाम बूढ़ा हो गया तो वह भारतीय समाज में गाय जैसी स्थिति में आ जाता है। फिर भी कितनी ही मशीनें आ जाएँ, कितने भी रोबोट बना लें लेकिन अंततः मनुष्य की ज़रूरत तो रहेगी। सबसे बड़ी समस्या यह है कि काम न होने या काम न करने या काम न कर सकने की स्थिति में भी मनुष्य को सब कुछ चाहिए। यही समस्या है। उन्हें मशीन की तरह बंद करके रख देने और जब चाहे उसे काम में ले सकने की सुविधा नहीं है।
मशीनों से होने वाले उत्पादन के युग में हर मनुष्य नौकर हो गया। किसान अपने लिए स्वाभाविक खेती नहीं करता बल्कि अधिक उत्पादन लेने के लिए कृषि को यंत्रीकृत करता है, नकदी फसलें करता है। इससे उसकी लागत बढ़ती है और बिक्री के लिए बाज़ार पर निर्भर होना पड़ता है। किसानों की आत्महत्याओं का यह एक मुख्य कारण है। ऐसे ही पहले जो कारीगर अपने श्रम और उत्पाद का मालिक होता था अब वह किसी कारखाने के मालिक का नौकर हो गया। अब सभी पढ़े लिखों को भी कोई उद्योग या संस्थान का मालिक ही नौकरी देता है। ऐसे में सब किसी अदृश्य और सर्वशक्तिशाली मालिक के लिए पढ़ रहे हैं। अब शिक्षा का कोई दर्शन नहीं है। अब तो केवल किसी की नौकरी के लिए स्वयं को तैयार करना है। और सभी तरह से योग्य होने पर भी किसी तरफ से कोई गारंटी नहीं है कि नौकरी मिल ही जाएगी। मिल भी गई तो कब तक चलेगी पता नहीं। तनख्वाह कितनी मिलेगी, पता नहीं। निजी क्षेत्र में देख लें, पाँच-दस हजार में एमए, बीएड या एमए, पीएचडी चाहिए। इसीलिए चपरासी के पद के लिए दस हजार गुना प्रार्थना-पत्र आते हैं और वे भी स्नातक, इंजीनियर और एमबीए आदि। इसलिए जब तक नौकरी की आशा है तब तक व्यर्थ में डिग्रियां लिए जा रहे हैं। इसी शिक्षा को गाँधी जी ने सबसे निकृष्ट कहा है। इसकी व्यर्थता सब जानते हैं लेकिन किसी भी सत्ता या समाज को इसका विकल्प समझ में नहीं आता। जो विकल्प है सादगी और मितव्ययिता का वह इस चमकीली दुनिया में पसंद नहीं आता।
अभी इसी वर्ष उत्तर प्रदेश में दसवीं बारहवीं की परीक्षाओं में कोई 60 लाख विद्यार्थी बैठे और नक़ल की सुविधा कम होने से 10 लाख परीक्षा देने नहीं गए। अब यदि सारे पूर्व निर्धारित व्यवस्था के तहत परीक्षा देकर पास हो जाते तो क्या दृश्य होता? वैसे 50 लाख भी कम नहीं होते। गली-गली में इंजीनियरिंग कॉलेज, कोचिंग संस्थान, नौकरियाँ दिलाने वाले दलाल, जाने कितनों का धंधा चल रहा है। कई नेता तो नौकरियाँ बेचने के अपराध में जेल की हवा खा रहे हैं। व्यापम घोटाले जैसे जाने कितने घोटाले दबे पड़े हैं। कितने नकली डिग्रियों से नौकरी कर रहे हैं। कई बार अध्यापकों से बात करके उनकी योग्यता को प्रमाणित करते कई खोजी चैनलों के वीडियो देखने को मिलते हैं। टॉपर घोटाले भी सुनने को मिलते ही रहते हैं। नकली डिग्रियों वाले नेता भी पकड़े जाते हैं।
देश के अन्य भागों में भी किसी भी कक्षा के लिए निर्धारित दक्षता मुश्किल से दस-बीस प्रतिशत बच्चों में मिलती है। प्रतियोगी परीक्षाओं में भी समझने से अधिक रटना है। कॉलेजों और विश्वविद्यालयों तक में विद्यार्थी ही नहीं अध्यापक भी मूल पाठ्य पुस्तकों की बजाय गाइड से ही काम चलाते पाए जाते हैं। यदि कोई तीक्ष्ण बुद्धि वैज्ञानिक आविष्कार करता भी है तो उसका उसे थोड़ा सा लाभ मिलता है शेष तो उस अनुसंधान के लिए फंड देने वाले धनिक का होता है जो उसे बाद में वर्षों तक बेचकर अरबों-खरबों कमाएगा।
इसके बावजूद यदि इस शिक्षा की कोई उपादेयता है भी तो उसके अन्दर का हाल भी कोई सुखद नहीं है। स्कूलों में बच्चों की हत्या, शोषण और गोलीबारी में कभी भी मारे जा सकने का डर। अब अमरीका में अध्यापकों को भी बंदूक दी जाने की आवश्यकता अनुभव की जा रही है। दुनिया के एक सबसे समृद्ध और स्वतंत्रता के हामी देश में स्कूल युद्ध के मैदान हो गए हैं। इसे शिक्षा की उपलब्धि माना जाए या व्यापार की?
विद्या से मिलने वाली मानवता, करुणा, सदाचार, विवेक, सहयोग, संवेदना, मितव्ययिता, अपरिग्रह और अस्तेय की बातें बहुत झूठी और काल्पनिक लगती हैं। अब तो यही लगने लगा है कि बच्चे को गुंडा, जालसाज़, दलाल, जुगाडू, लम्पट ही बनाया जाए क्योंकि किसी सज्जन बच्चे और मनुष्य का तो इस दुनिया में जीवन ही दुष्कर होता जा रहा है। वैसे ही दुनिया का सारा बोझ किसान, कारीगरों और कामगारों पर पड़ता है। इन में अब इतनी क्षमता नहीं बची है कि इन पर और बोझ बढ़ाया जा सके। इसलिए ज़रूरी है कि अधिकाधिक लोगों को स्वावलंबी बनाया जाए और इनका बोझ कम किया जाए।
किसी का पासवर्ड चुराकर उसके बैंक खाते में से रुपए निकालने का ज्ञान, नकली माल, कम तौल, कोई घोटाला करने का ज्ञान और लेटर ऑफ़ अंडरस्टेंडिंग कबाड़ने आदि के लिए ज़रूर सिक्स्थ सेन्स चाहिए अन्यथा सभी जीव अपने काम का ज्ञान अपने आप अपने माता-पिता या प्रकृति से सीख जाते हैं। स्कूल न जाने वाले भी अपना हिसाब-किताब कर ही लेते हैं। शिक्षा को मात्र जीवनयापन का नहीं बल्कि जीवन सँवारने का साधन बनना चाहिए। इसके लिए किसी बड़ी तकनीक की नहीं बल्कि साफ़ नीयत और दिशा की ज़रूरत है।

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