ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
किसका सत्य ही जयते?
01-May-2019 04:47 PM 575     

आज बात एक किस्से, एक लोककथा से शुरू करना चाहता हूँ : एक राजा था। उसके सिर पर सींग थे जिन्हें वह अपने बालों, ताज और मुकुट से पीछे छुपाए रहता था। लेकिन जिन पंथों में शरीर का एक भी बाल काटने, कटाने, तोड़ने और रंगने को धर्म-विरुद्ध माना जाता है उनके अनुयायी भी थोड़ी देर के लिए सर्वव्यापी से आँख बचाकर बालों से छेड़छाड़ का यह पाप (!) कर लेते हैं तो उस राजा का तो ऐसा कोई पन्थ भी नहीं था। एक बार केश-विन्यास के लिए उसे एक नाई को बुलाना पड़ गया।
हजामत के दौरान राजा का भेद तो खुलना ही था। राजा का आदेश था कि वह इसकी चर्चा किसी से भी न करे अन्यथा बड़ी सरलता से राजद्रोह का मामला बन सकता था। राजद्रोह तो अच्छे-अच्छों की हवा निकाल दे सकता है फिर वह तो बेचारा एक नाई ही था। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सिर्फ़ बड़े और तथाकथित भद्र-लोक की ही चीज तो नहीं है। सच और वह भी छुपाने की शर्त! बेचारे का घर पहुँचना मुहाल हो गया। गृहणी को बताते हुए भी डर लगे। होने को तो पुरुष भी कम नहीं होते लेकिन कहते हैं स्त्रियों का हाज़मा इस मामले में कमजोर होता है।
किसी तरह करवटें बदलते रात बीती। जब नींद ही नहीं आ रही थी तो नाई समय से पहले ही दिशा-मैदान के लिए चल पड़ा। उन दिनों खुले में शौच करना देशद्रोह घोषित नहीं हुआ था और न ही बिहार की तरह विकट स्वच्छताग्रही खुले में शौच करने वाले की लुंगी ज़ब्त करके उसे कच्छे में घर जाने को मज़बूर करते थे। शौच करते समय नाई ने देखा कि सामने एक सूखा पेड़ है। उसने आव देखा न ताव और जाकर उससे लिपट गया और सारी राम कहानी सुना दी।
संयोग की बात, वह वृक्ष कोई विशेष वृक्ष था। उसे किसी वाद्य यंत्र बनाने वाले ने ढोल और सारंगी बनाने के लिए चुन लिया। ढोल और सारंगी बने। और फिर संयोग कि उन ढोल और सारंगी के वादक दरबार में पहुँच गए बजाने के लिए। फिर तो आश्चर्य! जैसे ही ढोल बजा तो संगीत निकला- राजा के सिर में सींग।
सारंगी ने प्रश्न किया- तुझे किसने कहा? ढोल का उत्तर था- धाँधू नाई ने।
धाँधू नाई पकड़ा गया। उसका क्या हुआ वह तो उस नगरी के न्याय के बारे में जानने वाले बताएंगे लेकिन इस बोध कथा के अनुसार इतना तो तय पाया गया कि सच किसी सूखे पेड़ को भी नहीं पचता। सच जिसके साथ भी होता है वह उसे किसी और को अग्रेषित करने के लिए बाध्य कर देता है। वह हाथ पर रखा एक अंगार है जिसे धारण किए रहना आसान नहीं है। वह एक ऐसी रोशनी है जिसे किसी भी अँधेरे के पीछे छुपाया नहीं जा सकता।
लेकिन आदमी है कि अपने को बड़ा तीस मार खां समझता है। सोचता है कि वह सत्य को धता बताकर, सबकी आँखों में धूल झोंककर अपने झूठ को स्थापित कर देगा। मानवेतर जीवों में यह कुंठा या चतुराई नहीं है। वहाँ जो है वही है। कोई चूहा अपने को शेर प्रचारित और सिद्ध करने में जीवन नहीं बिताता। वह जीता है, चूहे के रूप में और बिना किसी कुंठा के जीता है। वहाँ किसी शेरशाह के लिए किराए के भक्तों से "शेर... शेर..." के नारे नहीं लगवाए जाते। लेकिन मनुष्य की चतुर सृष्टि में जो नहीं है, वह है। जो है, वह नहीं है।
सत्य पर बड़े खतरे हैं। बड़े प्रतिबन्ध हैं। कठोर राजादेश हैं। तभी कामना की जाती है- सत्यमेव जयते- सत्यं एव जयते। सत्य ही विजयी हो।
अमरीका का ध्येय वाक्य है- इन गॉड वी ट्रस्ट- हम ईश्वर में विश्वास करते हैं। जिस भारत को दुनिया में पिछड़ा प्रचारित किया गया, आज जिसे अंधविश्वासों में धकेला जा रहा है वह देश कहता है- सत्य ही ईश्वर है। निर्गुण निराकार ईश्वर को प्रमाणित करने में विवाद हो सकता है लेकिन सत्य के बारे में दो राय नहीं हो सकती। वह भी ईश्वर की तरह एक ही है। सम्प्रदायों के विधि-विधान गढ़े हुए, कृत्रिम और सच से परे हो सकते हैं। हो सकते हैं क्या, प्रायः होते ही हैं। उन्हें सच से डर लगता है। इसलिए सनातन और सार्वकालिक सच के स्थान पर अपनी सुविधानुसार अपना सत्य प्रचारित और स्थापित करते हैं। जबकि हमारे शास्त्र कहते हैं- एकं सद्विप्राः बहुधा वदन्ति। फिर ये इतने सत्य मनुष्य को भटकाने के लिए कहाँ से आ जाते हैं?
अब देखिए, सभी पंथों ने अपने-अपने पर्सनल कानून बना रखे हैं और उन्हें किसी भी हालत में लागू किए जाने के लिए दबाव बनाते हैं। मतलब अपने अनुयायियों को, अपना जीवन भी, अपने अनुसार जीने की स्वतंत्रता नहीं देना चाहते। क्या, एक जीव के रूप में अलग-अलग पंथों और धर्मों के मनुष्य अलग-अलग है? यदि नहीं, तो एक ही बीमारी के लिए उन्हें अलग-अलग दवाओं की ज़रूरत क्यों बताई जाती है?
इस जनवरी को हिंदुओं के एक तथाकथित संगठन ने फर्रुखाबाद जिले में एक न्यायपीठ बनाई है। इसका औपचारिक उद्घाटन हुआ। यहां हिंदू परिवारों में होने वाले विवादों का पंचों के माध्यम से निपटारा किया जाएगा। इसमें एक प्रतिनिधि शिकायतकर्ता की जाति का होगा। इस संदर्भ में कहा गया है कि इसके पीछे अदालत की अवमानना की कोई मंशा नहीं है, लेकिन देश में खुल रहीं शरिया अदालतों (दारुल कजा) का जवाब जरूर है।
ऐसी एक संकुचित, समूहगत और विशिष्ट न्याय व्यवस्था में सत्य के एक होने की संभावना कैसे हो सकती है जिनमें एक ही वर्ग के सभी सदस्य भी बराबर नहीं हैं, पुरुष के लिए अलग, स्त्री के लिए अलग, स्त्री में भी बहू के लिए अलग और बेटी के लिए अलग। धनवान के लिए अलग और गरीब के लिए अलग। और फिर क्या इनमें राजनीतिक पार्टियां (गिरोह) सत्य को प्रभावित नहीं करेंगे?
राजस्थानी में एक कहावत है-
दो राम हो तो मरूँ नहीं
दो राज हो तो डरूँ नहीं।
दो राम हों तो कभी एक और तो कभी दूसरे के नाम से बच जाएंगे। दो राजा होने पर जिसका भी राज होगा उसी का झंडा उठाकर अपनी आपराधिक कार्यवाहियाँ जारी रखी जा सकती हैं। आजकल चल रहे चुनावों में, एक ही दिन में कई-कई बार, किसी ख़ास पार्टी का टिकट मिलने और न मिलने की स्थिति में समस्त जीवन मूल्य और आस्थाएं बदल जाती हैं। किसी ने एक टिकटार्थी से उसके वर्तमान नेता के बारे में राय जाननी चाही तो उसने कहा- टिकट मिल गया तो विकास-पुरुष और न मिला तो विनाश-पुरुष।
सत्य को अपने अनुसार परिभाषित करने की विभिन्न धर्मों और पंथों की कोशिशें वास्तव में सत्य को नकारने की चाल है।
गाँधी इन्हीं सन्दर्भों में सत्य और सत्य के प्रयोगों की बात करते थे। यह वर्ष उसके जन्म का 150वां वर्ष भी है। क्या हम इस अवसर पर ही सही, उसके ईश्वर को जो कि सत्य ही है, जानने की कोशिश करेंगे? वह स्वयं को सामान्य जीव कहते और मानते थे। वे गलती करते थे तो उसे स्वीकार करने का साहस और सुधारने का ज़ज्बा भी रखते थे। मज़े की बात यह है कि अपने-अपने असत्यों के शोर में उस बूढ़े का नाम तक याद रखने की किसी को फुर्सत नहीं है।
सत्य किसी का नहीं होता। जो किसी का नहीं होता वही सबका होता है। सत्य किसी व्यक्ति, जाति, धर्म और नस्ल से बहुत बड़ी चीज है। आइये, उस बड़ी चीज की जीत की कामना करें।

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