ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
हिन्दी के पाठक कहाँ हैं?
CATEGORY : व्यंग्य 01-May-2018 06:55 PM 438
हिन्दी के पाठक कहाँ हैं?

मेरे आसपास ढेरों हिन्दी प्रेमी हैं जो सिर्फ हिन्दी दिवस के दिन ही हिन्दी बोलते हैं, सोच-सोच कर। बाकी दिनों वे हिन्दी की ढपली बजाते हैं और कमा खाते हैं। कई मित्र तो रोमन लिपि पर इतने फ़िदा हैं कि देवनागरी में लिखने में उन्हें लज्जा आती है। देवनागरी में छोटी-बड़ी मात्राओं का भेद उन्हें समझ नहीं आता। नाचना नहीं आए तो आँगन को टेड़ा कहने में ही बुद्धिमानी है। ऐसे में "हिन्दी के पाठक कहाँ हैं?" यह मार्मिक प्रश्न, प्रकाशक लेखक से पूछ रहे हैं। बेचारा लेखक पाठकों के अते-पते क्या जाने! वह टीप-टीप कर लिखना जानता है, संपादकों के पते जानता है। और कुछ विज्ञ संपादक, प्रकाशकों के प्रतिष्ठान जानते हैं। सरकार पुस्तकालयों के लिए अलती-भलती किताबें ख़रीदती है। ऐसी किताबें कि कई तो लाइब्रेरी में आसीन होने के बाद उसकी चौखट पार नहीं कर पातीं। किताबों की सरकारी ख़रीद न हो तो नब्बे प्रतिशत प्रकाशक ही गायब हो जाएँ। इस सबके बावज़ूद, किसी साहित्यकार को नहीं मालूम कि पाठक कहाँ छिप कर बैठा है। क्यों छिप गया है और चाहता क्या है?
मैं हिन्दी भाषी राज्य का मूल निवासी हूँ। यहाँ मुख्यमंत्री जी को चीफ़ मिनिस्टर कहलाना पसंद है, पर रबर की सब मोहरें हिन्दी में हैं। यहाँ "बंद निविदाएँ" सिर्फ़ हिन्दी में आमंत्रित की जाती हैं। मेरी दृढ़ मान्यता है कि यहाँ तो पाठक होना चाहिए। इसलिए मैंने अपने पड़ोसी जी से पूछा। कबीरदास जी ने कहा है निंदक नियरे राखिए। मेरे पड़ोसी सदाशिव जी मेरे एवं मेरे कवि मित्रों के सर्वकाल निंदक हैं। मैंने पूछा - सदाशिव जी, क्या आप हिन्दी के पाठक हैं? वे अचंभित रह गए। प्रश्नवाचक नज़रों से उन्होंने प्रतिप्रश्न किया- "आपकी तबियत तो ठीक है न? मैंने आपका अख़बार नहीं उठाया।" मैं चिंतन करने लगा। मेरी तबियत को क्या हो गया? कहीं सदाशिव जी को तो मतिभ्रम नहीं हो गया। वे मेरा सरल-सा प्रश्न नहीं समझ पाए। मैं कोई आयकर अधिकारी तो था नहीं जो उनकी आय का खुलासा पूछ रहा था। यदि वे पाठक नहीं हैं तो कह देते कि वे पाठक नहीं हैं। कई लोग हिन्दी में पीएच.डी. हैं, पर पाठक नहीं हैं, पाठक बनना तपस्या है। सदाशिव जी के सत्य कथन से भारतीय संस्कृति अपमानित थोड़े ही हो जाती। रही अख़बार की बात, तो हमारा अख़बार सबसे पहले वे ही पढ़ते हैं।
मैंने सदाशिव जी से अपने रिश्तों की सूक्ष्म पड़ताल की। कहीं कोई लोचा नहीं मिला। कोई कवि की निंदा करे तो क्या हुआ। हिन्दी के लेखक को किसी का बुरा नहीं मानना चाहिए। यहीं से तो उसे कुंठा और संत्रास जैसी अनुभूतियाँ होती हैं। यदि उसने भी बुरा मानना शुरू कर दिया तो वह क्या और किस पर लिखेगा, फिर तो मनुष्य का मनुष्य पर से विश्वास उठ जाएगा। सृष्टि में भगवान के बाद एक वह ही तो बचा है जो किसी चीज़ का बुरा नहीं मानता। कबीरदास जी महाकवि थे। वे बुरा ढूँढने निकले और उन्होंने कहा- "बुरा जो देखन मैं चला बुरा न मिलिया कोय। जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।" असल में कवि होना ही बुरा है।
मैं पाठक ढूँढने के अपने मिशन पर आगे बढ़ा। निर्विकार और निर्विचार चलते-चलते मैं गोपाल जी के पानालय पहुँच गया। यह बड़ी धर्मनिरपेक्ष और वर्गनिरपेक्ष जगह है। यहाँ छोटे से लेकर बड़े बिना भेदभाव के आते हैं, गोपाल जी सबको चूना लगाते हैं। गोपाल जी ने मुझे देखा तो वे मुस्कुरा दिए। उनके मुस्कुराने का अर्थ है गोपाल जी के दिमागी डेटाबेस में मेरे पान की रेसिपी दर्ज है। वे बड़े विनोदी हैं। सभी नियमित ग्राहकों से अनियमित संलाप करते हैं। मुझसे से भी करने लगे तो मैंने जिज्ञासावश उनसे पूछ लिया - गोपाल जी हिन्दी के पाठक कहाँ हैं?
किमाम लगाते-लगाते उनकी उँगली रुक गई। उन्होंने पूछा - "तम्बाकू बढ़ाऊँ क्या?" "ना, ना इतनी ठीक है।" मैंने अपना प्रश्न नहीं दोहराया। प्रश्न दोहराने का काम सिर्फ पत्नी ही करती है। जब तक उसे संतोषजनक उत्तर नहीं मिलता, वह अलट-पलट कर प्रश्न का पोस्टमॉर्टम करती रहती है। मेरे और गोपाल जी के बीच संबंध "पान लबों की शान" तक ही सीमित हैं, इसलिए पोस्टमॉर्टम करना ठीक नहीं लगा। मुझे वहाँ से खिसकता देख गोपाल जी बोले - "सर, अख़बार बच जाए तो मैं पान बाँधने के काम ले लूँ, पर किताबें तो रद्दी वाले भी नहीं लेते। आप पाठकों की बात करते हैं।"
हमेशा की तरह बस अड्डे पर आबादी में भारी वृद्धि के स्पष्ट संकेत मिल रहे थे। यहाँ किताबों की दुकान पर चहल-पहल रहती है। कवर पृष्ठ का मुआयना करते-करते कुछ लोग अख़बार और पत्रिकाएँ ख़रीद भी लेते हैं। यहाँ के मालिक मिलन बाबू मेरे परिचित हैं। किसी अख़बार या पत्रिका में सम्पादक के नाम मेरा पत्र छपता है तो मैं उसकी एक प्रति ज़रूर ख़रीदता हूँ। लाइब्रेरी से अख़बार चुराना किसी लेखक को शोभा नहीं देता। मिलन बाबू ने मुझे देख कर पूछा- "आज कहाँ नाम छपा है?"
मैंने कहा- "ना, ना, मैं सर्वे कर रहा हूँ कि हिन्दी के पाठक कहाँ हैं, आप इस पर कुछ प्रकाश डालें।"
वे बोले- "ठहरिए, टॉर्च ढूँढता हूँँ", और खिलखिला दिए। जब भी उन्हें व्यंग्य करना होता है वे पहले ही खिलखिला लेते हैं। व्यंग्य ढंग से न बैठे तो कचरा हो जाता है। जी भर कर हँस लेने के बाद उन्होंने गंभीर हो कर कहा- "हम मनोरंजक किताबें ही रखते हैं। "टेक्स्ट बुक्स" नहीं रखते।" मैं समझ नहीं पाया कि साहित्य कब से सिर्फ़ "टेक्स्ट बुक्स" हो गया। पाठक कब "टेक्स्ट बुक्स" के दायरे में आ गए? यहाँ एक नया विवाद और हो गया कि जो मनोरंजक किताबें पढ़ते हैं वे पाठक नहीं माने जाते!
सरकार ने भ्रष्टाचार उन्मूलन कार्यक्रम चलाया, भ्रष्टा-चार तो बढ़ गया, पर पाठकों का उन्मूलन हो गया। अब, हिन्दी के कितने पाठक हो सकते हैं भला? यह जानने के लिए मैं एक जनगणना विशेषज्ञ से मिला। वे सब तरह के लोगों की गणना कर सकते हैं। गणना तो सीधा-सादा काम है, पर आँकड़ों से निष्कर्ष निकालने में दिमाग़ तेज़ होना चाहिए। उनका दिमाग़, लेखक और कवि से भी तेज़ होना चाहिए। मेरा प्रश्न सुनते ही उन्होंने निष्कर्ष निकालना शुरू कर दिए। जैसे निष्कर्ष गन्ने का रस हो। प्रश्न दिमाग़ में डाला और उत्तर का रस टप, टपाटप।
वे निष्कर्ष बताने लगे। "मोटे तौर पर हिन्दी भाषियों की कुल संख्या तीस करोड़ ठहरी। यदि प्रति हज़ार, एक दशमलव एक व्यक्ति कवि-लेखक आदि हुए तो हिन्दी में तीन लाख जीवित कवि-लेखक हो सकते हैं। इंटरनेट के ब्लॉगों, अख़बारों और लघु पत्रिकाओं की संख्या से भी इन आँकड़ों की पुष्टि होती है। अब तीन साहित्यकारों में से एक को भी ढंग से हिन्दी लिखना आता हो तो कम से कम एक लाख लोग हिन्दी के पेशेवर साहित्यकार ठहरे। बोलिये आप क्या बोलते हैं?"
मैं कैसे बोलता कि पेशेवर साहित्यकार दो सौ-तीन सौ होंगे। सामान्यतः, किसी साहित्यिक किताब का प्रथम संस्करण दो सौ-तीन सौ प्रतियों का छपता है तो भी किताबें गोदाम की शोभा बढ़ाती रहती हैं। साहित्यकार एक-दूसरे से विमर्श करते हैं कि तू मेरी पढ़, मैं तेरी पढ़ूँगा। गोष्ठियों से बाहर निकलने के बाद यह विमर्श उलट जाता है। अपने ग्रुप से बाहर का रचनाकार तो संचालक को दिखता ही नहीं है। तूने मेरी टाँग खीचीं, मै तेरी दोनों टाँगें खीचूँगा। लिखूँगा, तेरी किताब बकवास है। तेरा लिखा और लिखना सब बाहर निकाल दूँगा।
साहित्यकारों के अंतरंग दंगल से पाठकों का क्या लेना-देना। सांख्यिकीविद ने गणित किया - हिन्दी के पास एक लाख जीवित पेशेवर साहित्यकार हैं। इनमें से नब्बे हज़ार तो लब्ध प्रतिष्ठित ठहरे। उनके बहु-प्रचारित परिचय के हिसाब से वे महान लेखक हैं। उनकी रचनाएँ हिन्दी की पाठ्य-पुस्तकों में ठसाठस भरी जाना चाहिए। हर कवि का मानना है कि कबीर और तुलसीदास के बाद उनकी कविता हो। प्रेमचंद के बाद उनकी कहानी हो। फिर देखो हिन्दी के पाठक कैसे बढ़ते हैं। इकबाल ने बड़े गर्व से लिखा था - हिन्दी हैं, हम वतन हैं, हिन्दोस्तां हमारा। आज़ादी के परवाने हिन्दी के दीवाने थे, वे हिन्दी को आंदोलन के केंद्र में रखते थे। अब आंदोलन का केंद्र कॉफ़ी हाउस होता है। वहाँ का मेनू भी अंग्रेज़ी में होता है। हिन्दी पढ़ना-सुनना हो तो अब चाय के ठेले-ढाबे पर जाना होता है। पर हिन्दी के पाठक न कॉफ़ी हाउस में हैं, न ठेले-ढाबे पर।
बेचारे साहित्यकारों को मालूम ही नहीं है कि कुछ दशकों से कान्वेंटी संस्कृति से सम्मोहित माँ-बापों ने हिन्दी के पाठक पैदा करना ही बंद कर दिए हैं। क्या गाँव, क्या शहर, सब जगह बच्चे अंग्रेज़ी रट रहे हैं, ताकि अब कभी अंग्रेज़ों को भारत आ कर राज करने की ज़रूरत न रहे, उनकी अंग्रेज़ी ही राज करती रहेगी।

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