ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
कैसा सफ़र राह देख रही हूँ
01-Mar-2019 03:41 PM 449     

कैसा सफ़र

माचिस की तीली-सा जीवन जला बुझा
जो दिखलाती थी ख़्वाब उन रातों का क्या हुआ
ज़िंदगी ने मुझे डाला किस उलझन में
न दौड़ ख़त्म हुई न जीत ही सका
अपनी मर्जी से किस्मत कैसे लिखवाते
एक अधूरापन मेरा हम सफर रहा
खुशी तलाशती थी मुझको मैं खुशी को
इस आँख मिचौली में कोई न मिल सका
दूसरों की आग में खुद को जला दिया
ये किस तरह का जीवन हमने जिया?


राह देख रही हूँ

ये खुला आसमान
ये कैदे बुलबुल की घुटन
दूर-दूर तक फैली हुई मजबूरियाँ
चाँद सितारों को छू लेने की लगन

रुपहले रेगिस्तान में
फूल तलाशने की तलब
और इर्द-गिर्द बिखरे हुए
ज़ख्म पर मरहम लगाने का सबब

ये आजीवन का रोग
और ये नाना प्रकार के भोग
आसमाँ पे उगे सूरज के
ढल जाने का डर

हैं दूरियाँ उन्हीं से जिनसे करीबी
ये संगम के जल-सा मेरा मन
उसे विधाता के चरणों में मेरी प्रीति
और उसी के हाथों ठगा जाने का ग़म

ऐ ज़िंदगी के रहे सहे अंजाम
मैं तेरी राह देख रही हूँ
गले लगा हूँ जब कभी तुम मिलोगे
गिले शिकवे सब दूर ज़िंदगी मुस्कुरायेगी।

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