ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
व्यंग्य के त्रिदेव
01-Nov-2017 02:29 PM 2284     

चौंसठ कलाओं में पारंगत त्रिदेवों पर 64 अध्याय लिखवा देने के बाद
डॉ. महावीर को संतोष तो हो गया कि यह शोधग्रंथ ऐतिहासिक बन पड़ा है और
पीएचडी डिग्री के लिये सर्वथा उपयुक्त भी। अंगदको भी अच्छा लगा कि कलयुगी
देवों ने अंतत: स्वीकार कर लिया है कि उनके द्वाराजो कुछ भी गड़बड़ियाँ जाने
अनजाने में फैलाई गई थी, उनके लिये वे खेद प्रकटकरते हैं।

सभी आश्चर्यचकित थे कि त्रिदेवों का, व्यंग्य के त्रिलोक पर आधिपत्य होने के बावजूद भी व्यंग्य का आज तक देवलोकगमन कैसे नहीं हुआ?
वरिष्ठ किन्तु अपने आदर्श कलयुगी देवों के पदचिह्नों पर चलकर सहदेवों ने भी वही पावन पंथ अपना लिया। हेराफेरी, पक्षपात और मनमाने ढंग से व्यंग्य के सम्मान बाँटने शुरू कर दिये। रागिनी दुर्गा को सम्मान देने की, सहदेवों की अनुशंसा पर, आँख मूंदकर वरिष्ठ देवों ने भी हस्ताक्षर कर दिये। किन्तु जब सम्मान मूर्ति का साक्षात दुर्गा स्वरूप, मंच पर सबने देखा तो वरिष्ठ देवों के भी होश उड़ गये! माना कि सम्मान पाने में उसके रूपवती होने का ही सर्वाधिक हाथ रहा था, लेकिन मंच पर वह इस रूप में उपस्थित हो जायेगी, किसी ने भी नहीं सोचा था।
रागिनी दुर्गा ने मंच पर कलयुग के देवों को, रिटर्न गिफ्ट देने के लिये, चप्पल लेकर जब पीछा करना शुरू किया, तो सभी दर्शक हतप्रभ रह गये। सैकड़ों दर्शकों के जीवन का वह प्रथम सर्वाधिक मनोरंजक दृश्य था किन्तु कम रोमांचकारी नहीं। सभी की आँखों के सामने कलयुगी देव, कोनों में, पर्दों के पीछे, टेबिल के नीचे, छुपते हुये, भागते हुये, दृष्टिगोचर हो रहे थे। रूपवती कवयित्री नयी नवेली थी, गाती भी अच्छा थी। पुरस्कारों के निर्णायकों ने शायद इसी प्रभाव में उससे एक आश्वासन ले लिया था कि ""यह बड़ी राशि वाला दुर्लभ सम्मान हम तुझे दे तो रहे हैं, बदले में हमें रिटर्न गिफ्ट देनी होगी।""
मंच पर उसने पुरस्कार भी ले लिया, लेकिन अब उसके रिटर्न गिफ्ट को चुकाने की बारी थी। वह देवों की पूजा हितार्थ, मंच पर चप्पल लेकर सबके सामने खड़ी थी। उस तांडव नृत्य से अपने जीवन भर की कमाई पर बट्टा लगते देख, वरिष्ठ देवों ने अपनी जिम्मेदारी स्वीकार कर खेद प्रकट करना ही उचित समझा।
चौंसठ कलाओं में पारंगत त्रिदेवों पर 64 अध्याय लिखवा देने के बाद डॉ. महावीर को संतोष तो हो गया कि यह शोधग्रंथ ऐतिहासिक बन पड़ा है और पीएचडी डिग्री के लिये सर्वथा उपयुक्त भी। अंगद को भी अच्छा लगा कि कलयुगी देवों ने अंतत: स्वीकार कर लिया है कि उनके द्वारा जो कुछ भी गड़बड़ियाँ जाने अनजाने में फैलाई गई थी, उनके लिये वे खेद प्रकट करते हैं। यहाँ तक तो ठीक था, फिर भी कुछ अद्यतन जानकारियों के समाविष्ट न होने के कारण, अंगद को अपना शोधग्रंथ अभी भी अपूर्ण लग रहा था। आज उसने एक नया प्रश्न अपने गाइड की ओर उछाल दिया, ""सर मेरी अद्यतन खोज के अनुसार, जिन दावेदारों ने यह दावा किया था कि अस्वस्थ और बिस्तरायमान व्यंग्य को बढ़िया धावक बनाकर ही वे दम लेंगे, उस विचार के मूल में दो चिकित्सा के और एक साहित्य के डॉक्टर थे। दावा करने के साथ-साथ कई वर्षों बाद तक यद्यपि वे दवा भी देते रहे, व्यंग्य की मसाज भी करते रहे किन्तु न जाने कौन-सी पेथी वाली औषधि दे दी, कि व्यंग्य अधिकाधिक विकृत और बीमार होता चला गया। एक के बारे में तो त्यागीजी ने लिखित में ही प्रमाण पत्र दे दिया था कि इन्होंने वीभत्स उपन्यास लिखकर व्यंग्य को काफी अलंकृत किया।""
डॉ. महावीर ने उत्तर दिया, ""मुझे भी पुष्ट सूत्रों से जानकारी मिली है कि शुरू में बहस इसी बात पर चली थी कि नयी तिकड़ी में कितने हिन्दी के और कितने चिकित्सा के डॉक्टर हों, जिनकी देखरेख में व्यंग्य का समुचित इलाज हो सके। व्यंग्य का स्वास्थ्य तो उसी दिन से बिगड़ना शुरू हो गया था जब एक औषधि वाले ने यह जानते हुये भी कि दूसरा डॉक्टर स्वयं ही व्यंग्य में अस्वस्थ चल रहा है, अतिशय मित्रता या कहें भाई-भतीजावाद के पावन सिद्धांत का पालन करते हुये जगह-जगह उसकी ही संस्तुति की। चहुँओर बताया कि मेरे बाद व्यंग्य के इलाज हेतु यही सर्वश्रेष्ठ डॉक्टर हैं, कोई अन्य इलाज करने में असमर्थ रहेगा। अत: इसी से दवा-दारू करायी जाये। अर्थ लगाने वालों ने बात का सार संक्षेप निकाल लिया कि वह दवा का कम, दारू का अधिक विशेषज्ञ होना चाहिये। फिर तो व्यंग्य का इलाज या उसका तीया-पांचा करने में समर्थ होगा। अंतत: निर्णय यही हुआ कि तिकड़ी में दो औषधि के और एक हिन्दी का, ऐसे तीन डॉक्टर ही रहेंगे।""
""सर आपने भी ये अमर पंक्तियाँ सुनी होंगी, एक तो यह कि प्रभुता पाय काय मद नाहीं, और दूसरी यह कि घुटना पेट की तरफ ही मुड़ता है। यह भी कि इस युग में संगठन ही शक्ति है। संगठन बनाकर ही तो एक मित्र को दूसरे ने येन-केन-प्रकारेण फिट कर व्यंग्य का उद्धार किया। उधर हिन्दी वाले ने पता नहीं किस लोभ लालच में बिना ना-नुकुर किये हुये, आज्ञा को शिरोधार्य कर तुरंत युद्ध स्तर पर योजना का कार्यान्वयन भी शुरू कर दिया।""
डॉ. महावीर ने पुष्टि की ""यह बात सच है, तिकड़ी के बनते ही, जगह-जगह हास्य व्यंग्य के सम्मानों और पुरस्कारों को रेखांकित किया जाने लगा। जगह-जगह तीनों के दौरे होने लगे। जनसम्पर्क बढ़ाया जाने लगा। सम्मानों और पुरस्कारों पर आँखें गड़ायी जाने लगी, क्योंकि तिकड़ी का मुख्य लक्ष्य उन पर आधिपत्य करना/करवाना था। मतभेद रखने वालों के पत्ते काटने थे, जबकि समर्थकों को सम्मान दिलवाने थे। यही आज के अर्थ वाले युग के अच्छे मर्मज्ञ होने का संकेत भी है। उनका दृढ़ विश्वास था कि साहित्य में अमरत्व प्राप्त करने के लिये अधिकाधिक सम्मान और पुरस्कार जुगाड़ने होंगे। इस तरह साहित्य वालों को इस त्रिचक्री ने, चक्कर में डालना शुरू कर दिया। इन त्रिचक्रों से व्यंग्य के विमान को शुरू-शुरू में उड़ाने की असफल कोशिश भी की गई, किन्तु पाया यह गया कि एक पहिया तो हमेशा पंचरावस्था में ही रहता है। आखिर इस निरर्थक पहिये की सहायता से कितनी दूर तक यात्रा की जा सकती थी? उससे मोह भी इतना कि संग्रहालय में रखकर उसे भूला भी नहीं जा सकता।""
""तो सर आपका मतलब यह है कि पंचर चल रहे पहिये की जगह किसी दूसरे पहिये को त्रिचक्री में मजबूरी में डालना पड़ा?""
डॉ. महावीर बोले ""और क्या, मुझे पिछले दिनों ही जानकारी मिली है जो अक्षरश: सत्य भी है कि त्रिदेवों द्वारा उस रहस्य को अंत तक गुप्त रखा गया। असल में वे जितने जमीन से ऊपर दिखाई देते हैं, उससे कहीं अधिक अंदर तक धंसे हुये हैं। तिकड़ी के अस्तित्व और उसकी योजनाबद्ध शैली की दिन दूनी रात चौगुनी तिकड़मों की सूचनाएँ तो सार्वजनिक होने लगी थी, किन्तु अंत तक सबको भ्रम ही दिया जाता रहा कि तिलंगों में औषधि का एक और हिन्दी के दो डॉक्टर हैं, जबकि यह बात गलत थी। भले ही तिकड़ी में पहले या बाद में, तीनों ही डॉक्टर रहे, किन्तु इस महत्वाकांक्षी योजना/संगठन के कर्ताधर्ता/सूत्रधार वही तीनों याने दो औषधि के और एक हिन्दी का डॉक्टर थे। वर्तमान तिकड़ी याने तीनों डॉक्टरों ने निर्णय तो बहुत तार्किक लिया। उनका कथन था कि ""व्यंग्य इसीलिये बीमार और दुर्बल रह गया था, क्योंकि पुरानी त्रयी में एक भी डॉक्टर नहीं था।"" वैसे सही डॉक्टर उसी को कहते हैं जो स्वस्थ व्यक्ति को भी पूर्णत: बीमार घोषित कर दे। डॉक्टर की दुकान स्वस्थ व्यक्ति से नहीं, बीमार व्यक्ति से चलती है। इसलिये भले ही व्यंग्य स्वस्थ था किन्तु तिकड़ी ने उसे बीमार और दोनों ओर से काला घोषित कर दिया। देखते ही देखते व्यंग्य पर तिकड़ी का आधिपत्य हो गया। सामान्य और भोले-भाले पाठक को भी परिवर्तन लगा और विश्वास होने लगा कि अब व्यंग्य का भला होने से कोई रोक नहीं सकता। किन्तु अंदरूनी बात यह थी कि तीनों डॉक्टर किसी भी क्षेत्र के रहे हों, जुगाड़ के क्षेत्र में विशेष रूप से पारंगत थे। ईमानदारी से तो उन्हें उसी एक क्षेत्र में विशेषज्ञता के लिये डॉक्टरेट मिलनी चाहिये थी।""
""वैसे क्या यह चिकित्सा के एक डॉक्टर की उदारता नहीं कही जायेगी कि उसने स्वत: पद छोड़कर साहित्य के डॉक्टर को तिकड़ी में बैठने दिया, पद छोड़ने में उसने तनिक भी हीला हवाला नहीं किया?"" अंगद ने उत्सुकतावश पूछा।
""असल में चिकित्सा का दूसरा डॉक्टर व्यंग्य से कहीं अधिक और आकर्षक, दूसरी जुगाड़ों में व्यस्त हो चुका था, उसे अपनी जमीन भी समझ में आने लगी थी। जब व्यंग्यरोगी की लगातार उपेक्षा होने लगी, तब हारकर गुप्त रूप से हिन्दी एक एक डॉक्टर को औषधि के उस डॉक्टर को निष्क्रिय बतलाकर साहित्य के दूसरे डॉक्टर को जगह देनी पड़ी। तिकड़ी का कोरम तो पूरा करना ही था। इस तरह नई तिकड़ी तेजी से चल निकली।"" डॉ. महावीर ने उत्तर दिया।
यही बात तो मैं कह रहा हूँ, कि दीर्घकालीन योजना तो औषधि के दो डॉक्टरों और हिन्दी के एक डॉक्टर को व्यंग्य के जाज्वल्यमान नक्षत्र घोषित किये जाने की थी किन्तु मजबूरी में स्टेपनी के रूप में हिन्दी के एक अन्य डॉक्टर का उपयोग करना पड़ा क्योंकि एक के पंचरावस्था में होने से त्रिचक्रीय वाहन को कहाँ तक खींचा जा सकता था? हिन्दी का दूसरा डॉक्टर तो निष्क्रिय दांता है। उस गरीब को तो पहले दिन से मात्र बरगलाया जाता ही रहा कि ""त्रयी का तू भी सम्माननीय सदस्य है, जबकि वास्तविकता यह नहीं थी।"" वास्तविकता को सामने रखते हुये अंगद ने अपना निवेदन डॉ. महावीर के सामने रखा। कुछ क्षण बाद अंगद ने धीरे से पूछा, ""यदि आप अनुमति दें तो विस्तार से इस कथा का श्री गणेश कैसे हुआ, यह बताऊँ?""
""हाँ, हाँ, अवश्य बताओ प्रियवर अंगद। यह तो अतिरिक्त शोध सामग्री है। इसे आपके शोध ग्रंथ में अवश्य जोड़ा जाना चाहिये।"" डॉ. महावीर बोले।
हुआ यह कि 90 के दशक में बड़ी राजधानी के एक मनीषी के पास, दिल्ली का ही हिन्दी का एक डॉक्टर पहुँचा। (इस बात को मैं पूरी जिम्मेदारी और पूर्णत: पुष्ट समाचारों के आधार पर बता रहा हूँ) और निवेदन किया कि हरिशंकर परसाई, शरद जोशी और त्यागी की पुरानी त्रयी तो अब समयातीत हो चुकी है, अब अपने सर्वश्रेष्ठ लेखन से छोटी राजधानी के दो औषधि के डॉक्टर तथा बड़ी राजधानी का एक हिन्दी का डॉक्टर, ऐसे तीन व्यंग्यकार नई तिकड़ी बनाकर, लंगोट कसकर, मैदान में उतर चुके हैं। पुरानी त्रयी को तो अब कालातीत ही समझें (जबकि त्यागीजी तब भी सक्रिय थे, त्यागीजी तो 2004 में स्वर्ग सिधारे)। अत: आप एक विस्तृत लेख लिख दें कि ""व्यंग्य में पदन्यास करने वालों, सावधान, अब निराश होने की जरूरत नहीं, व्यंग्य को वेंटीलेटर से खड़ा कर देने, नेतृत्व देने और धावक बना देने के लिये, दो चिकित्सा के तथा एक हिन्दी के डॉक्टर ने कमर कस ली है। वे व्यंग्य को आसमान की ऊँचाई तक उड़ा कर ही दम लेंगे।""
भले ही बड़ा न हो छोटा सा लेख भी लिख देंगे तो हमारी बात बन जायेगी। बाद में हम पर छोड़ दीजिये, हम उसका कैसा उपयोग करते हैं।
उन मनीषी ने उत्तर दिया, ""भैया मैं आपकी बात से बिल्कुल सहमत नहीं हूँ। इस विषय पर मैं लेख कैसे लिख दूँ, इस क्षेत्र में अनेक तपस्वी देश के विभिन्न कोनों में बैठकर अपने-अपने कर्म में जुटे हैं, उन्हें कैसे भूला जा सकता है? आप तीनों में ही तो सुर्खाब के पर नहीं लगे हैं।""
इस कल्पनातीत उत्तर को सुनकर, गुस्से में पैर पटकता हुआ हिन्दी का वह डॉक्टर, पीछे पाँव भागा। मन ही मन बड़बड़ाता गया ""क्या हम आपके मोहताज हैं? याद रखें आपके सहयोग के बिना भी हम बहुत कुछ कर सकते हैं! मेरे व्यापक संपर्कों की, आपको कभी जानकारी नहीं है। आपको कल्पना भी नहीं है कि हम क्या कर सकते हैं?""

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