ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
व्यावसायिक नज़रिये ने तरक्की की राह दिखायी - विष्णु ताम्बी
01-Jan-2016 12:00 AM 830     

इंजीनियरिंग के हजारों विद्यार्थियों में कुछेक ऐसे होते हैं जो नया करने के जुनून में चुनौतियों का डटकर मुकाबला करते हैं। विष्णु ताम्बी भी ऐसा ही एक नाम है, जिन्होंने व्यावसायिक सफलता के मुकाम तक पहुँचने के लिये अनेक उतार-चढ़ावों का सामना किया। 1988 में कम्प्यूटर इंजीनियरिंग में स्नातकोत्तर करने के लिए वे अमेरिका पहुँचे और भविष्य में कंप्यूटर तकनीकि के वृहत्तर प्रयोग का पूर्वानुमान लगाते हुए 1996 में ड्ढ-ड़ठ्ठथ्त्डड्ढद्ध क्ष्दड़. नामक संस्था की अमेरिका के कनेक्टिकट राज्य में स्थापना की जो आज कन्ड़ड्ढथ्थ्दृद च्दृढद्यध्र्ठ्ठद्धड्ढ के नाम से जानी जाती है। इस सॉफ्टवेयर प्रोडक्ट कंपनी को भारत और एशिया में अनेकों पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है। इस कंपनी द्वारा बड़े सेल्स एंड डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क को क्लाउड के माध्यम से लैपटॉप और मोबाइल फ़ोन से जोड़ा जाता है जो हजारों डीलर्स, सर्विस सेंटर्स और डिस्ट्रीब्यूटर्स के विभिन्न स्थानों और प्रतिष्ठानों को आसानी से न केवल जोड़ता है बल्कि संचालित करने में भी सहायक है। समय की मांग को पहचानने और कुछ नया करने की सोच की बदौलत विष्णु ताम्बी ने अनेक उद्योगों की स्थापना की, उद्यम पूंजी जुटाई, स्टार्ट उप कंपनी की शुरूआत की। 18 वर्षों तक अमेरिका में सॉफ्टवेयर के क्षेत्र में कार्यरत रहने के बाद ग्लोबल सॉफ्टवेयर कंपनी की स्थापना के सपने को साकार करने 2007 में वे भारत लौट आये। भारत और एशियाई देशों के उभरते हुए बाज़ारों के लिए आवश्यक समाधानकारक सॉफ्टवेयर के निर्माण के लिये सशक्त और अनुभवी उद्योगी सहयोगी विनोद ताम्बी के साथ जुट गए। 1999 से अब तक कम्पनी को अनेक कठिन परिस्थितियों से जूझना पड़ा, लेकिन संघर्ष करते हुए यह आज भारत की ख्याति प्राप्त संस्थाओं की सूची में शामिल है। भारत और एशिया की अनेक नामी ऑटोमोबाइल कम्पनियाँ इस भरोसेमंद, अभिनव, तकनीकि रूप से सम्पन्न सॉफ्टवेयर का उपयोग करती हैं। भारत में रहते हुए विष्णु ताम्बी अब भी शिक्षक और विद्यार्थी की भूमिका अपनाये हुए हैं। वे स्थानीय विद्यार्थियों के प्रेरणारुाोत हैं और सामाजिक मेलजोल के अवसरों में भागीदारी बनाये रखते हैं। उनका मानना है कि अमेरिका की उच्च शिक्षा, अच्छी कार्य प्रणाली और कामकाज की व्यवस्था भारतीय संस्थानों में अपनायी जानी चाहिये। बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी विष्णु ताम्बी आध्यात्म और योग में भी सकारात्मक ऊर्जा प्रवाहित होते हुए देखते हैं। उनसे हुई बातचीत के प्रमुख अंश : संस्थान की शुरूआत कैसे हुई? विष्णु ताम्बी : शुरुआती दौर में कन्ड़ड्ढथ्थ्दृद च्दृढद्यध्र्ठ्ठद्धड्ढ, सॉफ्टवेयर सर्विस के रूप में 1999-2000 में अमेरिका में स्थापित ड्ढ-ड़ठ्ठथ्त्डड्ढद्ध क्ष्दड़ की भारतीय शाखा के रूप में उभरा। किंतु ज्ञ्2ख़् के पश्चात करीब 2001 के दौरान हमने अपना ध्यान स्थानीय व्यापार और ग्राहक वर्ग के लिए केंद्रित किया। जिसके तहत विभिन्न उद्योगों के लिए उपयुक्त पैकेज सॉफ्टवेयर की आवश्यकता और निर्माण पर जोर दिया। हमने शुरुआत स्थानीय हॉस्पिटल और रिटेल उद्योगों से की, किन्तु शीघ्र ही महसूस किया कि यहाँ अच्छे सॉफ्टवेयर की आवश्यकता है जो सेल्स, डिस्ट्रीब्यूशन और सर्विसिंग के क्षेत्र में प्रभावी साबित हो सके। 2006 में इसकी प्रामाणिकता एक बड़ी ऑटोमोबाइल कंपनी के साथ हुए सौदे में हमने साबित की। इसके बाद हमें सफलता मिलती गयी और यही कारण रहा कि हम भारतीय सॉफ्टवेयर प्रोडक्ट इंडस्ट्री में एक वि?ासनीय रुाोत के रूप में उभरे। पहला बिजनेस कॉन्ट्रैक्ट मिलना दुर्लभ माना जाता है। आपको यह सफलता कैसे मिली? विष्णु ताम्बी : इसे अतिश्योक्ति समझे या अपरिहार्य, किन्तु बड़ी कंपनी से छोटी कम्पनी के झंडे तले संधि करना टेढ़ी खीर है। अशोक लेलैंड जैसे पहले बड़े कस्टमर, प्राथमिक दौर में हमें लेकर बहुत संकुचित थे। हमारा छोटा आकार, इनफार्मेशन टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में भारत में नागपुर जैसी छोटी समझे जाने वाली जगह और क्या हम उन्हें समय पर आवश्यक समर्थन और सहायता दे पाएंगे, जैसे तमाम सवाल उन्हें आ?ास्त करने में रोड़ा थे। हमने सामयिक भागीदारी हेलवेट-पिकर्ट और माइक्रोसॉफ्ट जैसी वि?ा विख्यात कंपनियों से की। व्यापारिक रणनीति और नवोन्मेष के जरिये हमने अपने अशोक लेलैंड द्वारा चयन किये जाने को सही साबित कर दिया।

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