ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
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कस्मै देवाय हविषा विधेम?
01-Jul-2016 12:00 AM 1398
कस्मै देवाय हविषा विधेम?

भारतीय मानस की अनवरत् जिज्ञासा की कथा की यह कड़ी आधुनिक भारत में वैज्ञानिक विकास लिखने के क्रम में बारम्बार यही प्रशन मानस पटल पर उभर कर आता है, "कस्मै देवाय हविषा विधेम?' अर्थात् किस देवता की उपासन

कस्मै देवाय हविषा विधेम?
01-Jun-2016 12:00 AM 1398
कस्मै देवाय हविषा विधेम?

गर्भनाल पत्रिका, मई 2016 अंक में प्राचीन भारत में ज्ञान-विज्ञान की चर्चा करते हुए वैदिक युग की वैज्ञानिक जिज्ञासाओं और संभावनाओं को रेखांकित किया गया था। इस चर्चा की शुरुआत राइबोसोम पर अपने अनुसंधा

करि जतन भट कोटिन्ह,बिकट तन नगर चहुँ दिसि रच्छहीं। कहुँ महिष मानुष धेनु, खर अज खल निसाचर भच्छही। एहि लागि तुलसीदास, इन्ह की कथा कछु एक है कही। रघुबीर सर तीरथ सरीरन्हि, त्यागि गति पैहहिं सही।
01-May-2016 12:00 AM 1089
करि जतन भट कोटिन्ह,बिकट तन नगर चहुँ दिसि रच्छहीं। कहुँ महिष मानुष धेनु, खर अज खल निसाचर भच्छही। एहि लागि तुलसीदास, इन्ह की कथा कछु एक है कही। रघुबीर सर तीरथ सरीरन्हि, त्यागि गति पैहहिं सही।

यह एक रक्ष-संस्कृति है। एक दो हजार लोग नहीं, करोड़ों लोग रक्षा के व्यवसाय में लगे हुये हैं। इसका विस्तार भी बहुत रहा होगा। भाषा भूगोल को भी बताती है। मलय भाषा में उन्हें राक्सासा और जापानी में रासेट


भारतीय अध्यात्म के अबूझ बिम्ब
01-Apr-2016 12:00 AM 163
भारतीय अध्यात्म के अबूझ बिम्ब

एक विज्ञापन में लिखा है, आध्यात्मिक वस्तुएं- माला, चन्दन, अगरबत्ती सस्ते दामों पर उपलब्ध हैं। इसमें अध्यात्म शब्द के प्रयोग से यह भ्रम पैदा करने की कोशिश की है कि अध्यात्म "वस्तु' में हैं जिनके प्र

कृत सुन्दरायतना घना। चउहट्ट हट्ट सुबट्ट बीथीं चारु पुर बहु बिधि बना। गज बाजि खच्चर निकर पदचर रथ बरूथन्हि को गनै। बहुरूप निसिचर जूथ अतिबल सेन बरनत नहिं बनै।
01-Mar-2016 12:00 AM 88
कृत सुन्दरायतना घना। चउहट्ट हट्ट सुबट्ट बीथीं चारु पुर बहु बिधि बना। गज बाजि खच्चर निकर पदचर रथ बरूथन्हि को गनै। बहुरूप निसिचर जूथ अतिबल सेन बरनत नहिं बनै।

इस बिन्दु पर पहुंचकर कथा की रिद्म बदलती है। यहां तुलसी ने जैसे एक स्टेज की सेटिंग की है। कथा-लय में यह परिवर्तन साभिप्राय है। अब हनुमान जो वनचर थे, सहसा एक नगर बल्कि राजधानी से साक्षात्कृत होते हैं

उमा न कछु कपि के अधिकाई। प्रभु प्रताप जो कालहि खाई। गिरि पर चढ़ि लंका तेहिं देखी। कहि न जाइ अति दुर्ग विसेषी। अति उतंग जलनिधि चहु पासा। कनक कोट कर परम प्रकासा।
01-Feb-2016 12:00 AM 88
उमा न कछु कपि के अधिकाई। प्रभु प्रताप जो कालहि खाई। गिरि पर चढ़ि लंका तेहिं देखी। कहि न जाइ अति दुर्ग विसेषी। अति उतंग जलनिधि चहु पासा। कनक कोट कर परम प्रकासा।

तुलसी की आधुनिकता कथा के इन छोटे छोटे ट्रीटमेंट तक में देखी जा सकती है। इसके पहले के अध्याय में हमने इस बात को रेखांकित किया था कि तुलसी के यहां प्रसंग प्रातिनिधिक (Representational) हो जाते हैं। व


तहां जाइ देखी बन सोभा। गुंजत चंचरीक मधु लोभा। नाना तरू फल फूल सुहाए। खग मृग बृंद देखि मन भाए। सैल बिसाल देखि एक आगें। ता पर धाइ चढ़ेउ भय त्यागें।
01-Jan-2016 12:00 AM 88
तहां जाइ देखी बन सोभा। गुंजत चंचरीक मधु लोभा। नाना तरू फल फूल सुहाए। खग मृग बृंद देखि मन भाए। सैल बिसाल देखि एक आगें। ता पर धाइ चढ़ेउ भय त्यागें।

हनुमान प्रकृति के पुत्र हैं। अब वह क्षण आता है जब प्रकृति की सुषमा के एक दूसरे आयाम से साक्षात्कृत होने का मौका उन्हें मिलता है। समुद्र से धरती पर आने का आनंद। बायरन के शब्दों में कहूं कि च्र्ण्ड्ढ

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