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वो जो चल दिए असमंजस में हो सांझ ढल गई
01-Jun-2018 01:36 AM 1487     

वो जो चल दिए

वो जो चल दिए
अपने सफर पर तनहा
मेरी लिए एक पल रुकना
न मिल सकी उन्हें पनहा

दीपक उजाले के खातिर
अंधेरों से भिडे
राह में साथी मिले
हाथों में सितारे लिये

रोशनी का जिस क्षण
नामोनिशां न होगा
मेरी आँखों से देखना
उजाला हर जहां होगा

मत दुश्मनी रखो
खुद से टूट जायेंगे हम
समेटने को बहुत मिला
ज्यादातर बेहिसाब गम।


असमंजस में हो

असमंजस में इसलिए हो
कि सच बोला गया
या
इसलिए कि तुम
सच को पचा नहीं सके

यह प्रश्न कुछ अनुचित तो नहीं
अहंकार के सिंहासन पर मोहित तो नहीं

तो अनुचित क्या है
मेरा सच या तुम्हारा झूठ
मेरा परोपकार या तुम्हारा अहंकार

सच और झूठ में
उचित और अनुचित में
मात्र एक अंतर है-
मेरा श्रम और तुम्हारा छल।


सांझ ढल गई

दरख्त पर लटके पत्ते
गरीब के ठेले पर
आँच पर भूने हुए भुट्टे
महके कलियां बागों से
झरे नम पत्ते शाखों से
पलकों पर सवाल लिये
साँझ बेसुध ढल गई-
सबेरे से जल गई।

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