ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
हिंसा ढ़ोती परम्परा मौनम् स्तुति
01-Nov-2018 10:37 AM 140     

हिंसा ढ़ोती परम्परा

हिंसा ढ़ोती क्रूर, कुरुप परम्परा
लगता है यह अजीब बड़ा।
"बलि" कहता "धर्म" पशुवध को,
कालप्रश्न कौंधता, मेरे जेहन में
है धर्म "पशु" कारण खतरे में?

पशु घास, चारा चरता,
निरीह, कुदरत बसर, बेचारा,
अकाल पड़ जाय, किसी बरस,
बेल खोल चौपाये की,
स्वतंत्र, करता महसूस दोपाया।

धर्मान्धता धकेलती, पशुवध को,
चलता दोपाया, लिये धारदार हथियार
निरीह निहत्थे पशु के वध को।
निरीह पशु पर चलता, हथियार धारदार,
ताकता लिए, धार हथियार हाथ,
"महाबली" कहलाने को मुँहबलि।

दोपाया मानवता से मुँह मोड़ता,
बँधा मुँह साँस, फैलती आँखें,
दर्द से, निरीह पशु की,
चीरता चमड़ी माँस मज्जा,
शरीर फड़फड़ाता, दम तोड़ता,
"पशुवध" को करता यथार्थ "पशुबलि"।

पशुवध "बलि" कहलाए,
कहत "धर्म" मुकुटधारी, वाह वाह पशुबलि,
है धर्मधारी, कहता हर पागल नर नारी।
गलती कहीं इतिहास गर्द पन्नों में,
जन-चैतन्य है अहिंसा दर्शन में।

"हिंसा" ढ़ोती क्रूर, कुरुप परम्परा,
लगता है यह अजीब बड़ा,
"बलि" पशुवध, सुन स्तब्ध मन,
देख, जनचेतना का, जलता चिथड़ा।


मौनम् स्तुति

विचार-पाथर, है फिरता जोड़ता
है और अब का पल्लू छोड़ता
"मैं" जीवन का अर्थ खोजता।

हिन्दू-मुस्लिम भाई-भाई
पल भर में मैं बनूँ कसाई
"मैं" जीवन का अर्थ खोजता।

मैं की मस्जिद, मैं का मन्दिर,
खोजता है मैं इन दो में अन्तर
"मैं" जीवन का अर्थ खोजता।

मैं ने ही दिया जहर मीरा को
सिद्ध, मस्त, नृत्य-गीत, गुनहगार
"मैं" जीवन का अर्थ खोजता।

महावीर-सच, नंगधड़ंगा
मैं ने किया वस्त्र-श्रृंगार
"मैं" जीवन का अर्थ खोजता।

मैं ने झपटा, मौन-बुद्ध का
हुआ पाण्डित्य-पाठ सरोकार
"मैं" जीवन का अर्थ खोजता
है और अब का पल्लू छोड़ता।

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