ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
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शिक्षा : अतिक्रमण और अनुसरण का द्वंद्व
जब गाँधी जी कहते हैं कि जो शिक्षा केवल जीविकोपार्जन के योग्य बनाती है वह निकृष्ट है। यह वैसी ही एक अतिवादी उक्ति है जैसे कि वह शिक्षा जो केवल शाब्दिक और वैचारिक वाग्विलास तक सीमित रह जाती है। जीवन रूपी धारा इन दोनों किनारों के बी...
हिंदी के पास न लोक है न शास्त्र
जितने बड़े क्षेत्र की भाषा हिंदी है उसे दो चार सौ ग्रियर्सनों, रामचंद्र शुक्लों और रामविलास शर्माओं की आवश्यकता थी परंतु हम किए क्या? रामविलास शर्मा के "भाषा और समाज" को प्रकाशित हुए 60 साल हो चुके हैं, हम उससे कितना आगे बढ़े? हिं...
हिंदी की चुनौतियों का सच
आजकल देश में हिंदी का सन्दर्भ अचानक राष्ट्रीय से अंतर्राष्ट्रीय हो गया है। जो भी सेमिनार होते हैं वे सभी अंतर्राष्ट्रीय होने लगे हैं। यह अलग बात है कि वे कितने अंतर्राष्ट्रीय होते हैं और कितने एकांगी और स्थानीय, इस सच को उसमें शा...
हिन्दू, हिन्द, हिन्दी और नदी संस्कृति
तमिल से लेकर संथाली, खासी तक, मणिपुरी से लेकर मलयालम तक सब विशाल हिंदी जाति में समाहित हों और हम व्यवहार के स्तर पर स्थापित करें कि हिन्दी इन सभी भाषाओं को गले लगा रही है। किसी भी भाषा का विकास उसके क्षेत्र और परिवेश विशेष से गह...
किसका सत्य ही जयते?
आज बात एक किस्से, एक लोककथा से शुरू करना चाहता हूँ : एक राजा था। उसके सिर पर सींग थे जिन्हें वह अपने बालों, ताज और मुकुट से पीछे छुपाए रहता था। लेकिन जिन पंथों में शरीर का एक भी बाल काटने, कटाने, तोड़ने और रंगने को धर्म-विरुद्ध माना जाता है उनके अन...
भाषाओं का परिवारवाद और हिंदी
हिंदी, भारत की राजभाषा है। इसे बोलने वालों की संख्या लगभग 50 करोड़ है। एक बड़ा तबका इसे राष्ट्रभाषा के रूप में मान्यता देता है। यह भी तथ्य है कि भारत के बाहर अनेक देशों में हिन्दी का उपयोग होता है और नये संचार माध्यमों के आने के बाद यह तेजी से अहिन्...
प्रमोशन और साहित्य का संकट
सेमीनारों में वक्ताओं के भाषण साधारण पाठक की चेतना से भी निचले स्तर के होते हैं और सेमीनार के बाद सभी लोग एक-दूसरे की पीठ ठोंकते हैं, गैर शिक्षक श्रोता फ्रस्टेट होते हैं, वे मन ही मन धिक्कारते हैं और कहते हैं कि वे सुनने क्यों आए...
साहित्य का कुल-गोत्र
आज जब समानता और न्याय आधारित, सबकी स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति, गरिमा और सम्मान की रक्षा करने की गारंटी देने वाले संविधान से संचालित देश को चलाने के लिए प्रतिनिधियों का चुनाव होने जा रहा है तो अचानक आस्थाओं, गोत्र, जाति और धर्म के परिचय पत्र माँगे जा र...
परिवारवाद और भाषा
जब भी भाषाओं की बात आती है तो उनके जिक्र के साथ एक पदक्रम जैसा संबंध भी आता है। सेना के अधिकारियों/सिपाहियों की तरह भाषाओं का भी पदक्रम निर्मित किया जाता है। किसी भाषा विशेष के लिए देव भाषा, ईश्वरीय भाषा, खुदा की भाषा, गॉड की भाषा के साथ-साथ देवी ...
देवनागरी या रोमन हिंदी?
एक बार फिर देवनागरी बनाम रोमन चर्चा में है। इस कंप्यूटर-टैबलेट-मोबाइल के युग में अक्सर यह बात जोर-शोर से उठाई जाती है कि अपनी हिंदी की लिपि देवनागरी की जगह रोमन क्यों नहीं अपनाई जाए। प्रथम दृष्टया यह मुझे सांस्कृतिक हमला नज़र आता है, वह इस तरह कि म...
भविष्य की भाषा और भाषा का भविष्य
जो पराधीन है, जो विवश है, जो निष्प्राण है, जो मूक है या जिसे बोलने का अवसर नहीं है, उसका क्या भविष्य और क्या वर्तमान। "लायी हयात आए, कज़ा ले चली चले", वाली स्थिति है। बकरी का क्या भविष्य और मुर्गे क्या मुस्तकबिल? किसान का क्या भविष्य? उसे तो खेती क...
कारखाने में नहीं बनती भाषा
मनुष्य आरंभ से ही अपने वजूद को लेकर सचेत रहा है। उसकी चेतना ज्यों-ज्यों विकसित होती गयी अपने अस्तित्व को लेकर उसका चिंतन भी प्रबल होता गया। शायद "मनुष्य" और "व्यक्ति" शब्द की सार्थकता यानी मनुष्य का होना उसके मनन करने और खुद को अभिव्यक्त करने की क...
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