ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
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गाँधी, गुरुदेव और हिंदी

पिछली शताब्दी में हिंदी प्रचार के लिए समर्पित लोगों की अगर सूची बनाई जाए तो निश्चित रूप से सबसे पहला नाम राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का होगा। प्रसिद्ध है कि उनके पास आकर जब कोई व्यक्ति यह कहता था कि

गाँधी : रोल मॉडल होने की संभावना

गाँधीजी की 150वीं जयंती के अवसर पर सर्वाधिक प्रासंगिक प्रश्न है कि भारत सहित दुनिया की "युवा" आबादी के लिए बापू की विरासत के क्या निहितार्थ हैं? क्या वे किताबों, इण्टरनेट, सिनेमा और मौखिक आख्यानों

अंतर्राष्ट्रीय पैठ बनाते हिंदी के शब्द

डार्विन और उसके सहयोगी हक्सले, विजविड और कोनिनफार का यह मानना था कि भाषा ईश्वर का दिया हुआ उपहार नहीं है, भाषा शनै:-शनै: ध्वन्यात्मक शब्दों और बोली से उन्नति करके इस दशा को पहुँची है। इसी तरह कई भा

सोशल मीडिया और हिन्दी विमर्श

जिस प्रकार हमारी फिल्मों/सिनेमा में स्क्रिप्ट की मांग के अनुसार "एंटेरटेनमेंट" का तड़का लगता है कुछ उसी प्रकार हिन्दी के बारे में बातचीत करते समय हिन्दी-अंग्रेज़ी की प्रतिस्पर्धा का भाव आ जाता है। ऐस

रोमन लिपि का कपट मृग और देवनागरी

हिन्दी को भारत देश में आज जो सर्वमान्य सम्पर्क भाषा का दर्जा मिला हुआ है वह समय प्रवाह की स्वाभाविक प्रक्रिया है। इतना जरूर है कि इसमें अंग्रेजों के विरुद्ध स्वतंत्रता संग्राम कर रहे गैर हिन्दी भाष

तकनीकी और भाषा

भाषा की विशद् व्याख्या न कर भारतीय भाषाओं और मुख्यत: हिन्दी के संदर्भ में अपनी बात रखूँगा। भाषा की समझ के लिए लिपि, शब्द और व्याकरण को समझना आवश्यक है। लिपि भेद कई हैं - रैखिक, जटिल, बाएं से दाएं,

उत्सव, उत्साह और गौरव के परे हिन्दी का सच

हिन्दी विश्व की सर्वाधिक बोली जाने वाले पहली, दूसरी, तीसरी भाषा है या जैसा भी उत्साही भक्तों को लिखने-बोलने के उस क्षण में उचित लगे। हिन्दी विश्व के कितने देशों में बोली और कितने विश्वविद्यालयों मे

हिन्दी और हिन्दुस्तानी का प्रश्न फिर क्यों

विगत दिनों सिनेमा पटकथा लेखक और उर्दू के कवि श्री जावेद अख्तर ने हिंदुस्तानी का सवाल उठा कर गढ़े मुर्दे उखाड़ने का प्रयास किया है। शायद जावेद जी भूल गए हैं या भूलने का बहाना कर रहे हैं या सुर्खियों म

राष्ट्रभाषा हिन्दुस्तानी और महात्मा गाँधी

आजादी के बहत्तर साल बीत गए। आज भी हमारे देश के पास न तो कोई राष्ट्रभाषा है और न कोई भाषा नीति। दर्जनों समृद्ध भाषाओं वाले इस देश में प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा तक और न्याय व्यवस्था से लेकर प्रशास

हिन्दी भाषा

भा षा वह है, जो सुनाई भी दे और दिखाई भी दे। वह
सुनाती हुई दिखाये और दिखाती हुई सुनाये।
किसी भी भाषा का यही जीवन है और किसी भी जीवन की यही भाषा है। मनुष्य की कोशिश अपने आधार और लक्ष्य को

अनुवाद की चुनौतियां

भाषा हमारे जीवन के सर्वाधिक महत्वपूर्ण पहलुओं में से एक है। यह मनुष्यों के बीच आपसी संवाद का मूलभूत माध्यम है। भाषा का वैज्ञानिक अध्ययन भाषा-विज्ञान कहलाता है। भाषा के उद्देश्य आंतरिक विचारों व भाव

अनुवाद की समस्या

अनुवाद एक अत्यंत कठिन दायित्व है। रचनाकार किसी एक भाषा में सर्जना करता है, जबकि अनुवादक को एक ही समय में दो भिन्न भाषा और परिवेश/वातावरण को साधना होता है। परिवेश और वातावरण पर बल देते हुए राधाकृष्ण

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