ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
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देवनागरी या रोमन हिंदी?
एक बार फिर देवनागरी बनाम रोमन चर्चा में है। इस कंप्यूटर-टैबलेट-मोबाइल के युग में अक्सर यह बात जोर-शोर से उठाई जाती है कि अपनी हिंदी की लिपि देवनागरी की जगह रोमन क्यों नहीं अपनाई जाए। प्रथम दृष्टया यह मुझे सांस्कृतिक हमला नज़र आता है, वह इस तरह कि म...
भविष्य की भाषा और भाषा का भविष्य
जो पराधीन है, जो विवश है, जो निष्प्राण है, जो मूक है या जिसे बोलने का अवसर नहीं है, उसका क्या भविष्य और क्या वर्तमान। "लायी हयात आए, कज़ा ले चली चले", वाली स्थिति है। बकरी का क्या भविष्य और मुर्गे क्या मुस्तकबिल? किसान का क्या भविष्य? उसे तो खेती क...
कारखाने में नहीं बनती भाषा
मनुष्य आरंभ से ही अपने वजूद को लेकर सचेत रहा है। उसकी चेतना ज्यों-ज्यों विकसित होती गयी अपने अस्तित्व को लेकर उसका चिंतन भी प्रबल होता गया। शायद "मनुष्य" और "व्यक्ति" शब्द की सार्थकता यानी मनुष्य का होना उसके मनन करने और खुद को अभिव्यक्त करने की क...
हिन्दी प्रेमी हैं, तो आइए बहुभाषी बनें
हिंदी इस देश की सम्मिलित आवाज है, यह केवल एक भाषा का नाम नहीं है यह इस देश की प्राणवायु का नाम है। देश की विविध संस्कृतियों को जोड़ने वाले पुल का नाम है। एक भरी पूरी संस्कृति और एक जीवनशैली का नाम है। हमने, खासतौर से हिंदी के कर्ताधर्ता लोगों ने एक...
हिंदी पर अंग्रेजी की प्रेत छाया
संविधान के भाग 17 के चार अध्यायों एवं भाग 5 व 6 के तहत क्रमश: नौ एवं एक-एक अनुच्छेद में राजभाषा के संबंध में व्यवस्थाएं दी गयी हैं। ये अनुच्छेद संघ की भाषा, प्रादेशिक भाषाओं, उच्चतम न्यायालय, उच्च न्यायालयों आदि की भाषा, हिंदी के संबंध में विशेष न...
बोली-भाषा-2
पढ़ने-लिखने से समझदारी आती है। पहले भी सुनता था और आज भी सुनता हूँ। आज एक नई बात जुड़ी कि पढ़े-लिखे कम समझदार होते हैं। वे सिर्फ़ अपना हित सोचते हैं सह-हित नहीं। समझदारी में सह की चिंता होती है। सह का मतलब ही दो है और सम्-मझ भी दो का ही इशारा करता है।...
गाँधी, गुरुदेव और हिंदी
पिछली शताब्दी में हिंदी प्रचार के लिए समर्पित लोगों की अगर सूची बनाई जाए तो निश्चित रूप से सबसे पहला नाम राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का होगा। प्रसिद्ध है कि उनके पास आकर जब कोई व्यक्ति यह कहता था कि मैं देशसेवा करना चाहता हूँ, मुझे काम बताइए; तो उनक...
गाँधी : रोल मॉडल होने की संभावना
गाँधीजी की 150वीं जयंती के अवसर पर सर्वाधिक प्रासंगिक प्रश्न है कि भारत सहित दुनिया की "युवा" आबादी के लिए बापू की विरासत के क्या निहितार्थ हैं? क्या वे किताबों, इण्टरनेट, सिनेमा और मौखिक आख्यानों में कैद ज्ञान हैं जिसकी सराहना की जाती है? या वे ए...
अंतर्राष्ट्रीय पैठ बनाते हिंदी के शब्द
डार्विन और उसके सहयोगी हक्सले, विजविड और कोनिनफार का यह मानना था कि भाषा ईश्वर का दिया हुआ उपहार नहीं है, भाषा शनै:-शनै: ध्वन्यात्मक शब्दों और बोली से उन्नति करके इस दशा को पहुँची है। इसी तरह कई भाषा विज्ञानियों का मत है कि मनुष्य बहुत काल तक गूँग...
सोशल मीडिया और हिन्दी विमर्श
जिस प्रकार हमारी फिल्मों/सिनेमा में स्क्रिप्ट की मांग के अनुसार "एंटेरटेनमेंट" का तड़का लगता है कुछ उसी प्रकार हिन्दी के बारे में बातचीत करते समय हिन्दी-अंग्रेज़ी की प्रतिस्पर्धा का भाव आ जाता है। ऐसा शायद इसलिए भी होता है कि अंग्रेज़ी और यूरोपीय भाष...
रोमन लिपि का कपट मृग और देवनागरी
हिन्दी को भारत देश में आज जो सर्वमान्य सम्पर्क भाषा का दर्जा मिला हुआ है वह समय प्रवाह की स्वाभाविक प्रक्रिया है। इतना जरूर है कि इसमें अंग्रेजों के विरुद्ध स्वतंत्रता संग्राम कर रहे गैर हिन्दी भाषी समाजसेवी, साहित्यकार और राजनेताओं द्वारा हिन्दी ...
तकनीकी और भाषा
भाषा की विशद् व्याख्या न कर भारतीय भाषाओं और मुख्यत: हिन्दी के संदर्भ में अपनी बात रखूँगा। भाषा की समझ के लिए लिपि, शब्द और व्याकरण को समझना आवश्यक है। लिपि भेद कई हैं - रैखिक, जटिल, बाएं से दाएं, दाएं से बाएं, ऊपर से नीचे, वर्णात्मक, चित्रात्मक, ...
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