ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
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हिंदी की चुनौतियों का अद्र्ध-सत्य
शायद दुनिया में पलायन के लिए मज़बूर किए जाने वाले लोगों में संख्या के हिसाब से यहूदी सबसे ऊपर हैं और इसी तरह जिनके समूल विनाश के लिए जघन्यतम तरीके अपनाए गए वे भी यहूदी ही थे। हिटलर द्वारा उन पर किए गए अत्याचार अभूतपूर्व हैं जिसके लिए आज भी जर्मनी क...
अरण्यरोदन बहुत हुआ, अब हिंदी का उत्सव मनाएँ
हिंदी को लेकर अरण्यरोदन की परंपरा नेहरू युग से आज तक जारी है। आजादी के 73 साल बाद भी स्थितियां बदलने का नाम नहीं ले रही। आखिर कब तक हिंदी भारत की राष्ट्र भाषा बनने से वंचित रहेगी। आजादी के बाद आई क्रमागत सरकारों और जन प्रतिनिधियों ने हिन्दी के साथ...
भारतीय साहित्य का परिप्रेक्ष्य
भारतीय साहित्य का दुर्भाग्य रहा कि इसे अन्य भारतीय कलाओं की तरह तरजीह नहीं मिली। इसी का परिणाम है कि भारतीय साहित्य का इतिहास जैसी कोई व्यवस्था सामने नहीं आई। जबकि "भारतीय साहित्य" यह अवधारणा बनी रही और इसकी चर्चा भी होती रही। कुछ विद्वानों के लिए...
भारतीय भाषाओं का भविष्य
सारी भारतीय भाषाएं अपने जीवन के सबसे गंभीर संकट के मुहाने पर खड़ी हैं। यह संकट अस्तित्व का है, महत्व का है, भविष्य का है। कुछ दर्जन या सौ लोगों द्वारा बोली जाने वाली छोटी आदिवासी भाषाओं से लेकर 45-50 करोड़ भारतीयों की विराट भाषा हिंदी तक इस संकट के ...
हां, बच्चों को छुट्टियां दें और सचमुच छुट्टी की तरह दें!
विगत माह मध्यप्रदेश विधानसभा में सर्वानुमति से जो पारित हुआ, वह था तो अशासकीय संकल्प पर वास्तव में इसे लोक संकल्प होना चाहिए। राज्य सरकार को भी इसे खानापूर्ति न मानकर इस पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। क्योंकि इस संकल्प के माध्यम से कांग्रेस विधाय...
भारतीय भाषाओं का हाशियाकरण
मैथिली के महान महाकवि विद्यापति की पंक्ति ज़रा देखें और समझें "हम नहि आजु रहब अहि आंगन जं बुढ होइत जमाय, गे माई। एक त बैरी भेल बिध बिधाता दोसर धिया केर बाप। तेसरे बैरी भेल नारद बाभन। जे बुढ आनल जमाय। गे माइ।।" विद्यापति की काव्य संपदा से जो बेहद सह...
शिक्षा, भूख और भय
जीवन का क्या महान लक्ष्य है, किसी को पता नहीं। लेकिन यह तय है कि जीवन की पहली शर्त और आवश्यकता इसे कायम रखना है। तभी अधभूखे रहकर, कंद-मूल फल खाकर चिंतन करने वाले, जीवन को नश्वर तथा पानी का बुदबुदा और माया को भ्रम बताने वाले, आत्मा-परमात्मा से कम प...
भाषाओं का नस्लवाद और 8वीं अनुसूची
यह बात लगभग सर्वमान्य है कि भाषा और बोली में कोई भेद नहीं होता, इसलिए अगर किसी बोली का उपयोग लाख और हजार लोग नहीं बल्कि केवल दो व्यक्ति भी करते हों तो उसे भाषा कहना ही उचित होता है। कुछ साल पहले अंडमान की बोआ सिनियर की मृत्यु के साथ "बो" भाषा समाप...
भाषा की इज्ज़त का सवाल
गत शताब्दी के अंतिम वर्षों में हैदराबाद से प्रकाशित साप्ताहिक पत्र "दक्षिण समाचार" में मैंने एक लेख प्रकाशित किया था, जिसमें मैंने मत प्रकट किया था कि आज के युग में यदि कोई आधुनिक शूद्र हैं तो वे हैं हिंदी वाले या भारतीय भाषाओं का प्रयोग करने वाले...
विश्वभाषा हिंदी : उद्देश्य, कल्पना, माया?
हिंदी बहुत कुछ है। भारत की औपचारिक भाषा, क़ौमी आवाज़, हिंदुस्तान की पहचान का महत्त्वपूर्ण स्वरूप, 22 राष्ट्रीय भाषाओं में से एक, घर की बोली, गंगा-जमुनी तहज़ीब का मज़हर, संस्कृत की सुपुत्री, उर्दू की छोटी या तो बड़ी बहिन, अंग्रेजी की अपने को छिपाती हुई ...
शिक्षा : अतिक्रमण और अनुसरण का द्वंद्व
जब गाँधी जी कहते हैं कि जो शिक्षा केवल जीविकोपार्जन के योग्य बनाती है वह निकृष्ट है। यह वैसी ही एक अतिवादी उक्ति है जैसे कि वह शिक्षा जो केवल शाब्दिक और वैचारिक वाग्विलास तक सीमित रह जाती है। जीवन रूपी धारा इन दोनों किनारों के बी...
हिंदी के पास न लोक है न शास्त्र
जितने बड़े क्षेत्र की भाषा हिंदी है उसे दो चार सौ ग्रियर्सनों, रामचंद्र शुक्लों और रामविलास शर्माओं की आवश्यकता थी परंतु हम किए क्या? रामविलास शर्मा के "भाषा और समाज" को प्रकाशित हुए 60 साल हो चुके हैं, हम उससे कितना आगे बढ़े? हिं...
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