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हिन्दी के अंतरंग शत्रु
इन दिनों अपनी हिन्दी दो तरह के अंतरंग शत्रुओं से जूझ रही है- एक हैं हिन्दी के "विभीषण" और दूसरे हैं हिन्दी के "घुन"। हिन्दी के "विभीषण" तो संसद भवन की पावरफुल कुर्सियों या तरह-तरह के पुरस्कारों की लालच में सीधी- सादी जनता को अपने लच्छेदार भाषणों से ग...
साहित्य को साहित्य ही क्यों न रहने दें
साहित्यकार अपने समय का निरपेक्ष द्रष्टा होता है जो राम झरोखे बैठकर सबको उनकी चाकरी के हिसाब से भुगतान करता है। आजकल यह बहुत चिंतनीय बात है कि विदूषक और चाटुकार इस श्रेणी में घुस गए हैं और कुकर्मी सत्ताधारी और सशक्त वर्ग अपनी साधन सम्पन्नता के बल प...
प्रवासी हिन्दी साहित्य अस्मिता की चुनौतियाँ
बीसवीं शताब्दी में हिन्दी साहित्य विभिन्न शाखाओं में विभाजित होने लगा। दलित साहित्य, स्त्री- विमर्श, प्रवासी साहित्य आदि विभिन्न नामों से हिन्दी साहित्य विकसित होने लगा। इस संबंध में कई विवाद भी हुए। कुछ विद्वान साहित्य को सर्जनात्मक और कलात्मक वि...
शोध समझ में आए तो नवाचार बढ़ जाए
स्वतंत्र भारत में चर्चा होती आ रही है कि जन-जन में वैज्ञानिक दृष्टिकोण और आविष्कारोन्मुखी प्रवृत्ति का संवर्धन हो। विज्ञान और तकनीकी के कई संस्थान खुले। लक्ष्य था कि उद्योग जगत को सुयोग्य जन शक्ति मिले जिससे नवाचारमय उत्पादन हो, लाभ हो, अर्थिक प्र...
हिन्दी के अंतर्विरोध-1
किसी भी भाषा की सक्षमता का पता इस बात से चलता है कि उसमें बहुलता भरी आवाजों के लिए कितनी जगह है। यानी बिलकुल भिन्न आवाज़ों को समाहित करने की क्षमता कितनी है। उदाहरण के लिए अगर हम महाभारत ग्रंथ को देखें तो उसकी सबसे बड़ी विशेषता अनेक कथाओं और विविध ज...
हिंदी को समर्पित एक दिन
हिंदी मास गुजर गया। ग़नीमत है कि गुजरा सम्पूर्ण महीना हिंदी को समर्पित है। वरना आज के दौर में हम मातृ-दिवस, पितृ-दिवस, भाईमना, बहन, बेटा, बेटी दिवस यहाँ तक कि प्रेम दिवस यानि वैलेंटाइन दिवस मना कर कर्तव्य पूर्ति कर लेते हैं। एक दिन दुर्गा या गणपति ...
भाषा पढ़ें, संस्कृति सीखें
आजकल कोई भी भाषा सीखने के लिए आवश्यक सामग्री काफ़ी आसानी से मिल सकती है और पढ़ाई के साधनों की जगह सबसे बड़ी चुनौती बन रही है भाषा सीखने के लिए प्रेरणा। आजकल की पीढ़ी को इंटरनेट के द्वारा सारी आवश्यक जानकारी और हर विदेशी शब्द, लेख, निबंध या फ़िल्म का अप...
हिंदी की चुनौतियों का अद्र्ध-सत्य
शायद दुनिया में पलायन के लिए मज़बूर किए जाने वाले लोगों में संख्या के हिसाब से यहूदी सबसे ऊपर हैं और इसी तरह जिनके समूल विनाश के लिए जघन्यतम तरीके अपनाए गए वे भी यहूदी ही थे। हिटलर द्वारा उन पर किए गए अत्याचार अभूतपूर्व हैं जिसके लिए आज भी जर्मनी क...
अरण्यरोदन बहुत हुआ, अब हिंदी का उत्सव मनाएँ
हिंदी को लेकर अरण्यरोदन की परंपरा नेहरू युग से आज तक जारी है। आजादी के 73 साल बाद भी स्थितियां बदलने का नाम नहीं ले रही। आखिर कब तक हिंदी भारत की राष्ट्र भाषा बनने से वंचित रहेगी। आजादी के बाद आई क्रमागत सरकारों और जन प्रतिनिधियों ने हिन्दी के साथ...
भारतीय साहित्य का परिप्रेक्ष्य
भारतीय साहित्य का दुर्भाग्य रहा कि इसे अन्य भारतीय कलाओं की तरह तरजीह नहीं मिली। इसी का परिणाम है कि भारतीय साहित्य का इतिहास जैसी कोई व्यवस्था सामने नहीं आई। जबकि "भारतीय साहित्य" यह अवधारणा बनी रही और इसकी चर्चा भी होती रही। कुछ विद्वानों के लिए...
भारतीय भाषाओं का भविष्य
सारी भारतीय भाषाएं अपने जीवन के सबसे गंभीर संकट के मुहाने पर खड़ी हैं। यह संकट अस्तित्व का है, महत्व का है, भविष्य का है। कुछ दर्जन या सौ लोगों द्वारा बोली जाने वाली छोटी आदिवासी भाषाओं से लेकर 45-50 करोड़ भारतीयों की विराट भाषा हिंदी तक इस संकट के ...
हां, बच्चों को छुट्टियां दें और सचमुच छुट्टी की तरह दें!
विगत माह मध्यप्रदेश विधानसभा में सर्वानुमति से जो पारित हुआ, वह था तो अशासकीय संकल्प पर वास्तव में इसे लोक संकल्प होना चाहिए। राज्य सरकार को भी इसे खानापूर्ति न मानकर इस पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। क्योंकि इस संकल्प के माध्यम से कांग्रेस विधाय...
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