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विलायती मामा
01-Jan-2016 12:00 AM 1738     

1.
उन दिनों "प्रवासी' शब्द इस्तेमाल नहीं होता था। शायद इसीलिए इंग्लैंड में रह रहे अपने मामा को हम विलायत गया बताये थे। वे इंग्लैंड में रहकर दूर अवश्य रह रहे थे पर प्रवासी नहीं थे। उनके दूर होने का दु:ख हमारे नाना-नानी की बूढ़ी आँखों की गहरायी में कभी-कभी हमें भी बिजली की कौंध-सा दीख जाता था पर इसमें सिर्फ़ एक ऐसी दूरी का एहसास था जिसे न मामा पाट पा रहे थे और न नाना-नानी और हाँ, हमारी माँ, मामा जिनके सबसे छोटे भाई थे। पर यह इस तरह नहीं था कि मामा पराये देश में रह रहे हों। वे प्रवासी नहीं थे पर दूर देश के वासी थे मानो वह दूर देश हमारे ही देश का विस्तार रहा हो। तब से लेकर आज तक यह देश कितना सिकुड़ गया है कि पड़ोसी देश में रहने वाले को भी हम अपने से पराया मानने और मनवाने पर अमादा रहते हैं। नानी हमेशा उनके लौटने की चर्चा चलाये रखती थी पर मामा पूरी तरह लौटना तो दूर हर साल भी नहीं लौट पाते थे। मेरे होश में आने के बाद वे पहली बार अपनी शादी के लिये भारत आये थे। भारत यानि सागर। उस समय वे बहुत युवा नहीं थे, लगभग अधेड़ होने की देहरी पर खड़े थे। नानी को इस बात का भी जोश था कि उनके विलायती बेटे ने उनकी पसन्द की लड़की से शादी कर ली थी। यह एक ऐसी बात थी जो न मैं तब- जब मैं छह या सात बरस का था- समझ पाता था और न बरसों बीत जाने के बाद अब। अपनी पसन्द की लड़की से अपने बेटे की शादी करवा देने में माँओं को क्या सुख मिलता है? बल्कि क्यों सुख मिलता है? यह बात सिर्फ भारतीय उपमहाद्वीप के लिये ही नहीं शायद सारी दुनिया के लिये सही है। इतना अवश्य है कि पश्चिमी जगत में मांओं को ऐसे अवसर लगभग नहीं के बराबर मिल पाते हैं। इसके मूल में ममता का विस्तार है या नियंत्रण की तृष्णा? कहना कठिन है। शायद दोनों ही हो, एक दूसरे से इतने गुँथे हुए और एक-दूसरे से इतने मिलते-जुलते कि एक को दूसरे से अलगाना नामुमकिन हो। नाना की इस सबमें कितनी दिलचस्पी थी, मैं नहीं जानता पर आज सोचने पर लगता है कि शादी की व्यवस्था में जुटे रहे होंगे, ज़ाहिर है इस काम में मेरे पिता, दूसरे मामा और दो-तीन मौसाओं की भी भूमिका रही होगी। वह शादी जिनके घर में हो रही थी, वे हमारे शहर से कुछ दूर भोपाल में रहते थे। वे शादी के बाद भी - जब मामा और नयी मामी इंग्लैंड चले गये - आते रहे। उनका नाम मुझे अब याद नहीं पर इतना ध्यान है कि वे लुटे-पिटे से नजर आते थे। शायद थे नहीं। उनका अंदाज फकिराना रहा हो। हमारी तीखी नानी के सामने वे चुप बैठे रहते। जैसे अपनी बेटी को विलायत भेज कर उन्होंने कोई अपराध किया हो। मानो हमारी मामी के पत्थर से बाँध कर हमारे मामा को इंग्लैंड नामक तालाब में फेंक दिया गया हो जिससे वे कभी निकल ही न पायें। पर नानी जानती थी ग़लती मामी के पिता या मामी की नहीं मामा की थी कि वे लौट नहीं रहे थे। उन दिनों लोग अपने बेटों के विदेश में रहने पर गर्व का अनुभव नहीं करते थे। उनके लौटने की प्रतिक्षा करते थे। उनके लिए कमरे खाली रखे जाते थे, उनके बिस्तरों की चादरें निरन्तर बदली जाती थीं और उन बिस्तरों पर कोई सोता नहीं था, सिर्फ़ खिड़की से झरती धूप कुछ पलों के लिये फैल जाती थी।
2.
मैं स्विट्जरलैंड से भारत लौट रहा था। वहाँ मैं कुछ हफ्तों के लिए राईटर-इन-रेसिडेंस था और मैं उस स्विस गाँव में जीवन में पहली बार उपन्यास लिखने की चेष्टा कर रहा था। वह अजब गाँव था जो हर सुबह खाली हो जाता था क्योंकि लोग अपने कामों पर या तो लोसाँ या जेनिवा चले जाते थे। जो रह जाते थे, वे फ्राँसीसी बोलते थे। वहाँ की गलियाँ दिन भर सूनी पड़ी रहती थीं, कभी कोई बच्चा या बूढ़ा या बूढ़ी दिखायी दे जाते थे। जब आसपास का जीवन इस तरह अपरिचय से भर जाता है, जाने कैसे पुरखे आपको चारों ओर से घेर लेते हैं और अदृश्य ढँग से ढाँढस बँधाने लगते हैं। यह वह समय था जब माँ और पिता, नाना और नानी संसार से विदा ले चुके थे। उन्हें मैं अपने सब ओर महसूस करता उपन्यास लिखने में जुटा रहता। इस घटना को चौदह बरस बीत गये, उपन्यास लिखा जाकर अपने कुछ हिस्सों के पूरे होने की राह ताकता मेरी मेज़ पर रखा है। स्विस गाँव लेविनी से मैं कभी-कभी छोटे मामा को फोन करता। वे बड़ी देर तक मुझसे बात करते रहते। ज़्यादातर मेरे भाई-बहनों के बारे में पूछते। वे सबों के बारे में छोटी से छोटी जानकारी पाना चाहते। रज्जन कहाँ हैं? आजकल क्या कर रहा है? क्या उसने सागर में ही मकान बना लिया है? बच्चू के कितने बच्चे हैं? उसकी बीबी क्या करती हैं? क्या वह जीजा के मकान में रहता है? गुड्डो क्या प्रोफेसर हो गयी? वह किस कॉलेज में है? वि?ाविद्यालय क्यों नहीं चली जाती? उन्हें सबकी जानकारी देते-देते मुझे लगता कि मेरा सारा परिवार वहाँ स्विट्जरलैंड के छोटे-से गांव में इकट्ठा हो गया है।
3.
वे शेफील्ड के पास रहते थे। स्विट्जरलैंड से लौटते हुये मैं कुछ समय उनके पास गुज़ारने लन्दन रुक गया। हीथ्रो हवाई अड्डे से शेफील्ड तक की बस की दु:खदायी और सुखदायी दोनों ही थी। दुखदायी इस तरह कि लंदन के हवाई अड्डे पर ही मुझे पेशाब लगी हुई थी पर मैं यह सोचकर उसके बाहर निकल गया कि बस अड्डे पर पेशाबघर चला जाऊँगा। मैंने बस का टिकट खरीदा और बस में अपना सामान रखकर इधर-उधर नजरें दौड़ायी। वहाँ पेशाबघर नहीं था। मैंने संकोच में किसी से पूछ भी नहीं सका। सोचा यहाँ न सही बस के अगले ठहराव पर होगा। बस चल दी। वह बहुत तेज़ चल रही थी और पास से दूसरी ओर गाड़ियाँ दिखतीं और ओझिल हो जातीं। बस के खाने-पीने की पैक्ड चीज़ों की ट्रॉली सीटों के बीच की जगह में चलायी जा रही थी। मुझे भूख थी पर मेरा पूरा ध्यान अपने फूलते पेशाब के थैले पर लगा था। मुझे लग रहा था कि जल्द ही बस कहीं रुक जाये और मैं भागकर अपने को खाली कर लूं। ठहराव आ नहीं रहा था। मेरी बेचैनी बढ़ती जा रही थी। इस पराये देश में बस को रास्ते में रुकवा कर झाड़ियों के बीच भी खाली नहीं हुआ जा सकता था। अगर कोई रास्ता जल्दी नहीं निकला, मैं फट जाऊँगा या बेहोश हो जाऊँगा। यहां इस अजनबी यात्रा में ऐसा कुछ घट गया तो सारे लोगों की परेशानी का सबब बन जाऊंगा। मैं उस चलती हुई बस में आशंकाओं से घिर गया। मैंने तभी देखा कि एक अधेड़ अंग्रेज़ बस के पीछे से गीले हाथों को एक दूसरे पर मलता सीटों के बीच की जगह से आगे चला जा रहा है। मुझे तुरन्त रास्ता मिल गया : पेशाबघर बस पिछले हिस्से में है, हवाई जहाज की तरह। इस तरह लंदन से छोटे मामा के घर जाते हुए जीवन ने एक बार फिर अपने को मेरे शरीर में बचा लिया। मामा शेफील्ड के बस अड्डे पर कार लेकर खड़े थे। मैं भागकर उनकी कार में चढ़ गया। हम करीब आधा घंटे में शेफील्ड से हर्लिंगटन पहुँच गये। रास्ते में मामा ने फिर से परिजनों के बारे में पूछना शुरू कर दिया। जैसे मैं उनके लिए उनका छूटा हुआ परिवार लेकर आया होऊँ। ऐसा ही कुछ वे मेरे बड़े भाई के साथ भी करते होंगे जब वे उनसे मिलने यहाँ आते होंगे। हर्लिंगटन में उनके घर पर हम देर तक बैठे बातें करते रहे। इनमें वे मुझे अपने बचपन और युवा अवस्था के बारे में विस्तार से बताते रहे। उनके वर्णन में इतने अधिक सूक्ष्म विवरण थे कि मैं चमत्कृत हो गया। वे लगभग सुबह तक बोलते रहे, मैं व्हिस्की का गिलास पकड़े हुए उन्हें सुनता रहा।
वे मेरे देखते ही देखते बिल्कुल युवा लगने लगे मानो अपनी बातों के सहारे वे समय में पीछे जा रहे हों। दो दिन बाद जब वे मुझे लंदन के लिए विदा करने स्टेशन पर आये। उनके चेहरे की मुस्कराहट कहीं अधिक खुली हुई थी। उस चेहरे पर ऐसी ताज़गी थी मानो वे मेरी उपस्थिति के सहारे अपने देश होकर लौट आये हों।
4
विलायत से आये छोटे मामा मेरे साथ हमारे शहर सागर में बंगाली मिठाई की एक ऐसी प्रसिद्ध दुकान गये जिसके विषय में यह अफ़वाह थी कि वह कलकत्ते से बेहतर सोशोगुल्ला बनाता है। मामा इंग्लैंड जाने से पहले वे खा चुके थे। उन्हें लगा कि उस शाम वे ढेर सारे बल्कि उस दुकान के सारे रोशोगुल्ले खरीद लें और इस तरह बंगाली बूढ़े पर कृपा करें, पर बूढ़े बंगाली दुकानदार ने साफ इंकार कर दिया। बाकी ग्राहकों का क्या होगा, वह बोला। मामा को तुरन्त अपनी भूल का एहसास हुआ। पर उनका चेहरा उदास होने से रुक नहीं सका। आप न बीता हुआ समय वापस ला सकते हैं या बीते हुए रोशोगुल्ला।
5
उनकी भारत लौटने की कई कोशिशें अलग-अलग कारणों से विफल होती गयी पर वे जैसे जैसे बूढ़े होते गये, उनकी भारत आने की चाह बलवती होती गयी। एक बार वे यहां तक सोच बैठे कि अगर वे अन्तकाल तक भारत न लौट सकें तो उनके शव को उनके देश ले जाया जाये। पर क्या ऐसा कहीं होता है?
6
नानी जब तक रही, उसे उम्मीद थी कि उनका छोटा बेटा विलायत से वापस लौट आयेगा। इसके लिए उसने बहुत हवन कराये, व्रत रखे। नाना जब तक रहे, वे जान चुके थे कि उनका बेटा वापस नहीं आ पायेगा। वे उसे देखने चाह लिये चले गये।
माँ अपने बूढ़े पिता के दु:ख में ही अपने भाई को देख लेती थी शायद। वह उसकी ओर से भी उनकी सेवा करती रही कि उसकी कमी उन्हें महसूस न हो। एक तरह से वह स्वयं अपना भाई बन गयी।

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