ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
विजय निकोर
विजय निकोर
दिसम्बर 1941 में लाहौर में जन्म। 1947 में दे¶ा के बँटवारे के बाद दिल्ली में पहुँचे। 1965 से अमेरिका में हैं। हिन्दी और अंग्रेज़ी में अनेक रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रका¶िात। कवि सम्मेलनों में नियमित रूप से भाग लेते हैं एवं पतझड़ में सूखे पत्तों पर चलना अच्छा लगता है।

असंतोष मुझको है गहरा
सोचता हूँ, यह अंत है खेल काया एक और खेल है अंत मेंया तैरते-उतरतेपुण्य और पाप को संकेतित करतीयह अंतिम पलों की लीला है क्याकि हवा में घुल-घुल करप्रकाश-बिम्ब-सेस्पष्ट हो रहे हैं मानो अब अर्थ व्यर्थअजनबी
असंतोष मुझको है गहरा
लौट-लौट आ रहे हैंभूली भीषण अधूरी कहानी-सेदर्दीले दृश्य दूरस्थ हुई दिशाओं सेउलझे ख़याल... तुम्हारे, मेरेमकड़ी के जाल में अटके जैसेहमारे सारे प्रसंगजिनका आघातहम दोनों को लगा।सोचता हूँ, यह अंत है खेल काया
आधा हिस्सा
 मैं उस टूटे रि¶ते का आधा हिस्साआधा भी रह न सकासमय की अभि¶ाप्त आँधी मेंउड़ते तिनके-सा टकराता रहा। वह दिन, जब हमारा रि¶ता टूटाउस दिन क्या-क्या न हुआ? नदी के नीले पानी की छा
QUICKENQUIRY
Related & Similar Links
Copyright © 2016 - All Rights Reserved - Garbhanal - Version 12.00 Yellow Loop SysNano Infotech Structured Data Test ^