ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
विदेश में देश
01-Oct-2016 12:00 AM 3352     

देश से बाहर निकले करीब उन्नीस साल हो गए लेकिन इन उन्नीस वर्षों में से शुरू के लगभग तेरह वर्ष ऐसे थे, जिनमें हर दिन, हर पल अपने देश लौट जाने की चाह थी। उन्हीं, पीछे छूटी, भीड़-भाड़ वाली गलियों और चौराहों के सपने थे। जोर-जोर से बजने वाले लाउडस्पीकरों, शादी के बैण्ड-बाजों और माता के जागरणों की गुनगुनाहट थी।  चिड़ियों, कबूतरों व कौओं की चहचहाहट थी। रिश्तों की नरमी और चुगलखोरों की गरमी थी।
लेकिन फिर न जाने कैसे, इसी विदेश के इसी राज्य में, अपने ही घर के आसपास कुछ ऐसा संजोग बना कि देश-विदेश का सभी भेद जाता रहा। विदेश में भी देश की ही खुशबू महसूस होने लगी या फिर यूं कहिए कि जो एक कमी या खोज जीवन में इतने सालों तक महसूस होती रही वो सब ख़त्म हुई और आभास हुआ कि ये कमी बाहरी कम और आत्मिक या आतंरिक ज़्यादा थी।
अब सवाल ये उठता है कि आखिर यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ़ अमेरिका के वर्जिनिया राज्य में मुझे ऐसा क्या मिल गया कि फिर ना देश की कसक रही ना विदेश की भनक! अब देश-विदेश सब एक ही धरती के हिस्से होने का आभास कराने लगे। सारी दुनिया मुझे स्वयं में ही समाहित नज़र आने लगी और मैं इस सारी दुनिया में। सब कुछ बहुत सुन्दर, बेहद मनोरम, हर तरफ़ ख़ुशियाँ ही ख़ुशियाँ! धरती, नदियाँ , पर्वत सब पहले से कहीं ज़्यादा रोमांचक ओर मनमोहक। अब ज़हन में बस एक ही ख़याल था कि दुनिया बनाने वाले ने किस जतन से इतनी ख़ूबसूरती इस दुनिया में समेटी होगी! चप्पा-चप्पा, बूटा-बूटा आने वाले कल के लिए उत्साही एवं प्रेरणादायी प्रतीत हो रहा था।
मेरी मानसिक स्थिति पढ़कर आपको ऐसा लग रहा होगा कि मुझे किसी से प्यार हो गया हो। नहीं क्या?
जी हाँ, सही समझा। जीवन में इतने सालों बाद मुझे अपना सच्चा प्यार अमेरिका के वर्जिनिया राज्य में मिला और वो था-- भारत की सांस्कृतिक कलाओं से जुड़ा मेरा अथाह प्रेम। प्रेम, हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत से, नृत्य से, कविताओं से ओर अपनी मातृभाषा से। अपने जीवन की इस नई खोज एवं सुखद अनुभूति के लिए, अपने दिल की गहराइयों से, श्रीमती एवं श्री धनन्जय कुमार का आभार प्रकट करना चाहूँगी जिन्होंने वर्जिनिया के शैनटिली शहर में कई सालों पहले इन्डिया इन्टरनेशनल स्कूल खोलने के ख़याल को मूर्त रूप दिया और इस क्षेत्र के सभी गुणीजनों एवं भिन्न-भिन्न कलाओं मे निपुण श्रेष्ठ शिक्षकों को अपनी-अपनी कला की शिक्षा आम प्रवासी भारतीयों तक पहुँचाने की व्यवस्था प्रदान की। यह स्कूल श्री एवं श्रीमती कुमार के घर के तहख़ाने से शुरू होकर एक अच्छी-खासी इमारत तक तब्दील होने की एक लम्बी कहानी है।
इस विद्यालय में हिन्दुस्तानी संगीत के अलावा कर्नाटक संगीत, कथक, कुचिपुडी, भरतनाट्यम, विभिन्न भारतीय वाद्य-यन्त्रों एवं भाषाओं की शिक्षा भी दी जाती है। यहाँ समय-समय पर कवि सम्मेलन एवं हिन्दी के प्रचार-प्रसार हेतु विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। योग शिक्षा के लिए निःशुल्क अथवा अल्प शुल्क में शिविर लगाए जाते हैं। होली-दिवाली के उत्सवों पर सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।
कुल मिलाकर इस विद्यालय की बदौलत मेरे देश विछोह की पीड़ा का अन्त हुआ और मेरी स्वयं की सभी कलाओं को प्रदर्शन एवं निखरने का मौक़ा मिला। इस विद्यालय एवं इसमें कार्यरत शास्त्रीय संगीत के जाने-माने शिक्षकों (पंडित विश्वास शिरगांवकर एवं हुमायूँ खान) को समर्पित मेरी एक कविता में कुछ यूँ बयान हुआ है -
इन्डिया स्कूल है एक धरा / जिसका आँचल गुणियों से भरा / ना कोई बैर, ना कोई गिला / एक सुन्दर, सौम्य, सरल चेहरा / नीला आकाश, हरी धरती / ओर रंग उजाले का गहरा / जहाँ जाति-पाति का बोझ नहीं / दिल पर, ना धर्म का ही पहरा / अपनी संस्कृति को खोज रहे / गुणियों का तन-मन यहाँ ठहरा / होकर आलोकित, मृदुल मेरा / जीवन गुणगान करे तेरा / कि इन्डिया स्कूल है एक धरा / जिसका आँचल गुणियों से भरा।

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