ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
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हिन्दी साहित्य में सांस्कृतिक बोध
हिन्दी साहित्य में सांस्कृतिक बोध

भारत में फिरंगियों के रहते और उनके जाने के बाद हिन्दी में विमर्श की परम्परा बहुत गड़बड़ा गयी है, हम अपने शब्द भूलकर जैसे किसी आयातित भाषा में विमर्श कर रहे हैं, किसी और के बीज शब्दों को व्यर्थ ही अपन ...

01-Sep-2017 03:35 PM 87
भाषा की ज़रूरत है क्या?
भाषा की ज़रूरत है क्या?

जिस तरह से अधिकतम मुनाफा कमाने और अपनी, बढ़ी या बाज़ार द्वारा बढ़ाई जा रही, इच्छाओं के कारण आदमी ऐसे भाग रहा है जैसे कि उसके पीछे शिकारी कुत्ते पड़े हुए हैं। गरीब से लेकर समृद्धतम देश के निवासियों को भ ...

01-Sep-2017 03:30 PM 109
पिता और कवि
पिता और कवि

पिता अपनी एक कविता रचते हुए कहते हैं कि – बाँस की पोर ने मुझे पहना है और मेरे भीतर कोई अज्ञात अँगुलियाँ उसे छूती रहती हैं जैसे वे मुझमें कोई स्वर ढूँढ रही हों । उनका यह भाव जानकर लगता है कि प ...

08-Jul-2017 08:13 PM 279
एक-वचन और बहु-वचन के द्वन्द्व
एक-वचन और बहु-वचन के द्वन्द्व

जब भी "संस्कृति' शब्द बहस में आता है, भारत का समूचा बौध्दिक जगत और दलीय राजनीति ग़फलत के गर्क में पड़ जाती है। क्योंकि, सबसे पहले तो उनके सामने इसकी "परिभाषा' का ही प्रश्न आकर खड़ा हो जाता है और वह हर ...

01-Feb-2016 12:00 AM 746
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