ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
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देह के मुंडेर पर

एक निजी कथन से अपनी बात शुरू करना चाहती हूँ। मैं कवि हूँ, लेकिन हर समय नहीं। स्वतंत्र भी मैं उतनी ही हूँ जितना अपने को होने देती हूँ। लेकिन स्त्री हूँ, इसका बोध मुझे सोते-जागते हर क्षण रहता है। कपड़ ...

01-Oct-2018 08:05 PM 83
हिन्दी में काम

हिन्दी में काम करती हूँ तो अक्सर अंग्रेज़ी से भी टकराना ही पड़ता है। लैपटॉप पर काम करने और 24 घंटे उपलब्ध इंटरनेट की सुविधा ने गूगल से भी ख़ासा परिचय करा दिया है। फिर भी गूगल पर पूरी तरह निर्भर नहीं र ...

01-Sep-2018 08:13 PM 253
अंतरराष्ट्रीय हिंदी उत्सव क्यों?

वर्ष 1989 में एक बहुत बड़े हिदी सम्मेलन का आयोजन किया था। सम्मेलन की विशेषता यह थी कि उसमें चार से अधिक प्रदेशों के मुख्यमंत्रियों ने भाग लिया था। ऐसा लगता था कि हिंदी भाषी प्रदेशों के राजनीतिक प्रम ...

01-Aug-2018 05:08 PM 389
गंगा-जमनी तहज़ीब के कमजोर पक्ष

यह देश ईसा पूर्व से ही विदेशी आक्रमणों को झेलता रहा है और बार-बार अपने छोटे-बड़े शासकों की मूर्खता, फूट और स्वार्थ के कारण पददलित होता रहा है। कोई पाँच छह हजार वर्ष पहले घुमंतू आर्य आए और यहाँ की नद ...

01-Apr-2018 02:35 AM 705
स्वभाव, सम्बन्ध, सभ्यता

हम एक बोधमय नित्यता में सदा रहते आये हैं। इसका अनुभव हमें अपने स्वभाव के अनुरूप हुआ करता है। हमारा यह स्वभाव हमें मिली जन्मजात प्रकृति के न्याय से स्वतः संचालित है। इसे हठपूर्वक बदला तो नहीं जा सकत ...

01-Feb-2018 10:15 AM 996
भारतीय कलाओं का स्मरण

कल देर रात टीवी पर अलग-अलग इंडियन चेनल्स पर नृत्य प्रतियोगिताओं के कार्यक्रम देर रात तक देखती रही। वीकेंड भी था और ठंड भी कड़ाके की शुरू हो चुकी है। करने के लिए कुछ खास था नहीं। नृत्य मेरा दूसरा प्य ...

01-Jan-2018 02:55 PM 1047
नए रूप की हिन्दुस्तानी

अभी हाल में ही बेंगलुरु मेट्रो के उद्घाटन के मौके पर अप्रत्याशित घटना सुनने को आई। वहां के स्टेशनों पर हिन्दी में लगे साइन बोर्डों का वहां के स्थानीय लोगों ने यह कहकर विरोध शुरू कर दिया कि यह हिन्द ...

01-Nov-2017 02:10 PM 1050
हिन्दी की वर्तमान स्थिति पर ढाई विचार

हिन्दी की सेवा करने का मतलब क्या है, क्या होना चाहिये? हम किसी भाषा की सेवा क्यों करें? जब मैं इस बात पर विचार करना शुरू करता हूँ, तो हजारी प्रसाद द्विवेदी का एक निबंध याद आता है। द्विवेजी जी कितने ...

01-Nov-2017 02:04 PM 2136
अहंकार और मनुष्य

प्रभु की महिमा अपरम्पार है, ये जीवन भर कहते और सुनते आये हैं, पर गम्भीरता से विचार करने पर उनकी दूरदर्शी, अनोखी सूझ-बूझ पर अचम्भा अवश्य होता है कि कैसे उन्होंने हर स्थिति और समस्या की कल्पना कर के ...

01-Oct-2017 01:09 PM 1191
हिन्दी साहित्य में सांस्कृतिक बोध

भारत में फिरंगियों के रहते और उनके जाने के बाद हिन्दी में विमर्श की परम्परा बहुत गड़बड़ा गयी है, हम अपने शब्द भूलकर जैसे किसी आयातित भाषा में विमर्श कर रहे हैं, किसी और के बीज शब्दों को व्यर्थ ही अपन ...

01-Sep-2017 03:35 PM 1429
भाषा की ज़रूरत है क्या?

जिस तरह से अधिकतम मुनाफा कमाने और अपनी, बढ़ी या बाज़ार द्वारा बढ़ाई जा रही, इच्छाओं के कारण आदमी ऐसे भाग रहा है जैसे कि उसके पीछे शिकारी कुत्ते पड़े हुए हैं। गरीब से लेकर समृद्धतम देश के निवासियों को भ ...

01-Sep-2017 03:30 PM 1287
पिता और कवि

पिता अपनी एक कविता रचते हुए कहते हैं कि – बाँस की पोर ने मुझे पहना है और मेरे भीतर कोई अज्ञात अँगुलियाँ उसे छूती रहती हैं जैसे वे मुझमें कोई स्वर ढूँढ रही हों । उनका यह भाव जानकर लगता है कि प ...

08-Jul-2017 08:13 PM 1444
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