ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
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आषाढ़ का एक दिन तर्क और दीवानगी के बीच का संवाद
मणिकौल (1944-2011) का सिनेमाई सफ़र चेतना के आंकड़ों के विरुद्ध का सफ़र है। इक्कीसवीं सदी का यह दूसरा दशक जब लगभग ख़त्म हुआ चाहता है और भारत में धर्म और आस्था अपनी नई परिभाषाओं में आकार ग्रहण करती हुई मौजूद होती जा रही है, जहाँ आंकड़ों की भयावहता एक "नय...
सुसंस्कार की कठिन डगर पर...
भारतीय संस्कृति की चर्चा हम सब आए दिन सुनते रहते हैं। कभी मंचों से, तो कभी चाय-वार्ताओं में या घरों की बैठक में। किन्तु दुर्भाग्य यह है कि हममें से अधिकांश यह नहीं जानते कि हमारी संस्कृति क्या है। इस अज्ञान के पीछे, हमारी सोच की जड़ों में बैठा वह न...
काल-चेतना और साहित्य
पश्चिम की दुनिया में परम्परा के प्रति तीव्र असंतोष के अपने ऐतिहासिक कारण हैं परंतु भारत की स्थिति भिन्न है। अंग्रेज़ी राज एक विजयी संस्कृति को व्यक्त करता था, अंग्रेज़ी शिक्षा ने हमारे मनोभाव को बदला, हम पिछड़े देश, विकासशील देश और ...
तुम ही ज़रा पहल कर देखो
जीवन में बहुत बार ऐसा होता है कि बात बहुत छोटी होती है लेकिन वह व्यक्ति की अकड़ और अहंकार से बहुत बड़ी हो जाती है। बहुत बार हमारे मन में यह बात आती है कि आगे बढ़कर शुरुआत करें लेकिन हम दूसरे पक्ष द्वारा पहल किए जाने का इंतज़ार करते रह जाते हैं और समय ...
बिहारी शब्दकोष
आरकुट पर बिहारी कम्युनिटी पर एक पोस्ट में एक्सक्लुसिव बिहारी शब्द सुझाने को कहा गया था। मतलब ऐसे शब्द या वाक्य जो सिर्फ़ बिहार में बोली और समझी जाती है। कुछ शब्द वहीं से कंट्रोल सी कर लिया और कुछ को स्वयं अपने मेमोरी से जोड़ा। और तैयार हो गया यह मिन...
तुम्हारी हिंदी हमारी मैथिली
मैथिलीभाषी समुदाय इन दिनों बहुत गुस्से में है। कुछ अरसा पहले बिहार में एक अख़बार ने मैथिली को बोली करार दिया। नतीजा यह हुआ कि उस अख़बार के कार्यक्रम के बहिष्कार की अपील की गई और जिन्होंने यह अपील नहीं मानी, उनके मुंह पर कालिख पोतने तक की कार्रवाई हु...
बोली और भाषा
बोली और भाषा कैसे एक-दूसरे के विरोधी हैं और साहित्य इन्हें कैसे संयोजित करता है, उसे ही समझने की कोशिश यहाँ हुई है। इतना समझ लेना चाहिए कि बोली और भाषा परस्पर निर्भर हैं। मतलब कि एक-दूसरे के सह हैं। परंतु सहना दोनों का समान नहीं है। एक सहता है, तो...
देह के मुंडेर पर
एक निजी कथन से अपनी बात शुरू करना चाहती हूँ। मैं कवि हूँ, लेकिन हर समय नहीं। स्वतंत्र भी मैं उतनी ही हूँ जितना अपने को होने देती हूँ। लेकिन स्त्री हूँ, इसका बोध मुझे सोते-जागते हर क्षण रहता है। कपड़ों के चुनाव में, उठने-बैठने के ढंग में, बोलचाल की ...
हिन्दी में काम
हिन्दी में काम करती हूँ तो अक्सर अंग्रेज़ी से भी टकराना ही पड़ता है। लैपटॉप पर काम करने और 24 घंटे उपलब्ध इंटरनेट की सुविधा ने गूगल से भी ख़ासा परिचय करा दिया है। फिर भी गूगल पर पूरी तरह निर्भर नहीं रहने की सतर्कता बरतती हूँ। हाँ, राह दिखाने के लिए ग...
अंतरराष्ट्रीय हिंदी उत्सव क्यों?
वर्ष 1989 में एक बहुत बड़े हिदी सम्मेलन का आयोजन किया था। सम्मेलन की विशेषता यह थी कि उसमें चार से अधिक प्रदेशों के मुख्यमंत्रियों ने भाग लिया था। ऐसा लगता था कि हिंदी भाषी प्रदेशों के राजनीतिक प्रमुख हिंदी के लिए कोई संयुक्त रणनीति बनाएंगे। सम्मेल...
गंगा-जमनी तहज़ीब के कमजोर पक्ष
यह देश ईसा पूर्व से ही विदेशी आक्रमणों को झेलता रहा है और बार-बार अपने छोटे-बड़े शासकों की मूर्खता, फूट और स्वार्थ के कारण पददलित होता रहा है। कोई पाँच छह हजार वर्ष पहले घुमंतू आर्य आए और यहाँ की नदी घाटियों में बस गए और यहीं के हो गए। ईसा से तीन श...
स्वभाव, सम्बन्ध, सभ्यता
हम एक बोधमय नित्यता में सदा रहते आये हैं। इसका अनुभव हमें अपने स्वभाव के अनुरूप हुआ करता है। हमारा यह स्वभाव हमें मिली जन्मजात प्रकृति के न्याय से स्वतः संचालित है। इसे हठपूर्वक बदला तो नहीं जा सकता पर बोधमय नित्यता के आइने में अपनी ही प्रतिपल मिट...
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