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वेश मे पदार्पण करेगा - ललित याज्ञिक
01-Jan-2016 12:00 AM 1023     

ठीक ही कहा है, भ्रष्टाचार-भ्रष्टाचार चिल्लाने से कुछ नहीं होगा। उसे दूर करने के उपाय ढूंढने में लग जाना चाहिये। लेकिन क्या इस क्षेत्र में तकनीकी कुछ मदद कर सकती है? इतिहास साक्षी है छोटे-मोटे तकनीकी-नवीनीकरण का श्रेय भले व्यापार-विश्लेषण को जाता है पर शत-प्रतिशत नवीनीकरण में सफलता तब मिली है जब हालात से चिढ़ी हुई जनता को तकनीकी विशेषज्ञों की टीम का सहारा मिला हो। तो तकनीकी क्षेत्र के दुरूह प्रश्नों के जवाब के लिये हम श्री ललित याज्ञिक से रूबरू होते हैं जो उभरती तकनीकी को उपयोग में लाने के विशेषज्ञ हैं। ललित आईटी के क्षेत्र में व्यवसायिक समस्याओं के सलाहकार हैं। आईबीएम की "स्मार्टर प्लेनेट सोल्यूशन्स' टीम जो भारत, आस्ट्रेलिया और पूर्वी यूरोप आदि देशों में विकास के व्यवसाय से संबंध रखती हैं, उसमें कार्यकारी शिल्पकार हैं तथा आईबीएम एकेडमी ऑफ़ टेक्नोलोजी में तकनीकी नेतृत्व की टीम के सदस्य हैं और दक्षिण पूर्वी एशिया के राष्ट्रीय संघ (ॠच्कॠग़्) में तकनीकी विशेषज्ञों की काउन्सिल के चेयरमेन हैं। एक शिक्षक-पुत्र होने के नाते आपने ज्ञान अर्जित किया और बाँटा। सरकारी विभागों में याने बेहरीन, भारत और सिंगापुर के विभागों में, औद्योगिक प्रतिष्ठानों में और वि?ाविद्यालयों में। सीखने के जुनून में आपने इन देशों में अनेक बार यात्रा की। क्योंकि जैसा कि ऊपर लिखा है इन क्षेत्रों में श्री याज्ञिक अत्याधुनिक तकनीकी में आईटी व्यापार की समस्या-विश्लेषण के लिये कार्यकारी शिल्पकार हैं, आईबीएम के विकास बाजार में। और अब 40 हजार सदस्यों से बनी आईबीएम एशिया पेसिफिक आईटी के विशेषज्ञों की टीम का नेतृत्व कर रहे हैं। 1976 में कम्प्यूटर का क्षेत्र भारत में नया-नया था तब बिट्स पिलानी से कम्प्यूटर विज्ञान में परास्नातक डिग्री प्राप्त की और बेहरीन की सरकार ने अपने विभागों के कार्य को स्वत: याने कम्प्यूटर चालित करने व ई-शासन की स्थापना के लिये इन्हें सलाहकार नियुक्त किया। शैक्षणिक संस्थाओं से कोई नाता तो न था पर सीखने और बाँटने की रुचि ही थी जो आपको वहाँ के एकमेव वि?ाविद्यालय के पाठ¬क्रम निर्धारण के लिये ले आई तथा आप "बेहरीन कम्प्य़ूटर सोसाइटी' के संस्थापक सदस्य बने। यही धुन थी कि परास्नातक की दूसरी डिग्री उदयपुर से लेने के 30 साल बाद ङग्क्ष्च्र् से तीसरी परस्नातक डिग्री प्राप्त की। 1985 में आपको आईबीएम आस्ट्रेलिया द्वारा सिस्टम इंजीनियर नियुक्त किया गया, नई तकनीकी को मूर्तरूप देने के लिये। यहाँ भी मोनाश वि?ाविद्यालय ने आपको अतिथि-व्याख्याता के रूप में आमन्त्रित किया। तत्पश्चात सिंगापुर की सरकार ने सिंगलैब द्वारा, जो कि एक संयुक्त उद्यम है, आपको तकनीकी परामर्श में सक्षम करने के लिये बुलाया। आपका कार्य सिंगापुर, भारत, चीन व आस्ट्रेलिया से योग्य व्यक्तियों का चयन कर तकनीकी में नवीनीकरण की सुविधा प्रदान करवाना था। कहते हैं अच्छी तरह बस जाने के बाद भी ज्ञान का पिपासु ऊँचे उद्देश्य के लिये पुन: भ्रमण शुरू करता है। भारत के बाद बेहरीन और उसके बाद मेलबोर्न में बस जाने के बाद 2000 से 2009 के बीच फिर से श्री याज्ञिक के सामने आया, भारत के उभरते बाजार और वै?िाक प्रतिभा पूल में तकनीकी क्षमताओं का विकास कार्य और इसके साथ ही 700 कॉलेज में 80 हजार विद्यार्थियों को प्रदान करने के लिये बहुत कुछ संलग्न था और वह था - नवीनतम तकनीकी को कार्यान्वित करने के लिये आईबीएम का यूनिवर्सिटी-प्रोग्राम। फिर तो आस्ट्रेलिया के केरियर की ओर मुड़ कर न देखा। इसका नतीजा यह हुआ कि भारत में मुड़ मुड़ कर दिल्ली, महाराष्ट्र और उत्तरांचल की सलाहकार परिषद ने आपको आमन्त्रित किया। साथ ही ग़्ॠच्च्क्ग्र्ग् याने मुख्यमन्त्री की गुड़गाँव टास्क फोर्स में तथा केन्द्र सरकार के ई-संचालन में कार्य करने के पश्चात क्तक्ष्च्र्कक् याने हरियाणा की आई.टी सेवा संगठन में चेयरमेन के रूप में कार्य किया। 2014 से उद्यमी (एन्टरप्रेन्योर) के रूप में एसजीएस (स्किल गैप सोल्युशन) के सह-संस्थापक और निदेशक का कार्य कर रहे हैं। साथ ही एंजेल फंड नामक एक वेंचर कैपिटल फंड के लिये अनुभवी परामर्शदाता (मेन्टोर) के रूप चुन लिये गये हैं। कोई आश्चर्य नहीं कि हाल ही में आईसीटी समाधान के द्वारा राज्यों के समग्र विकास के लिये तीन सलाहकारों के पैनल की आवश्यकता पड़ी तो इन्हें फौरन चुन लिया गया। प्रस्तुत हैं ललित याज्ञिक से हुई बातचीत के अंश : हरिहर : आपने इस नई याने 21वीं सदी का अधिकांश भाग भारत में गुजारा है। बतलाइये अगले 5 से 10 सालों में आप भारत की नई प्रौद्योगिकी के क्षेत्र का भविष्य किस रूप में देखते हैं? ललित याज्ञिक : सूचना-प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भारत का भविष्य दो दृष्टिकोण से देखा जा सकता है - वै?िाक आईटी का समाधान देने के लिये और घरेलू उद्देश्य के लिये। मेरी दृष्टि में इन दोनों क्षेत्रों में अगले 5 से 10 साल में भारत का भविष्य बहुत उज्ज्वल है। क्योंकि भारत ने एक स्थायी वै?िाक आईटी समाधान प्रदाता के रूप में स्वयं को साबित किया है। कम लागत पर विशाल प्रतिभा-पूल उपलब्ध हो जाना दुनिया की सभी कंपनियों के लिये आकर्षण ही नहीं बल्कि एक आवश्यकता है, आज के लागत-प्रभावी बाजार के समाधान के लिए। स्पष्ट शब्दों में कहें तो लागत की बचत और क्ष्क्च्र् (सूचना और संचार प्रौद्योगिकी) की समस्या-समाधान पर केन्द्रित आज के वि?ा में कोई भी कंपनी भारत को शामिल किये बिना अपना गुजारा नहीं चला सकती। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि विधिवत मॉडल द्वारा भारत को शामिल न करने की कोशिश भी की गई किन्तु भारत के पास जो अँगरेज़ी बोलने वाली आईटी प्रतिभा का क्रांतिक समूह है उसकी कोई देश लगभग रूप में भी बराबरी नहीं कर सकता। किन्तु इसका यह मतलब नहीं कि भारत को सफलता की गारंटी मिली हुई है। कंपनियों, शैक्षिक संस्थानों तथा केन्द्र और राज्य की सरकारों को अपने वै?िाक ग्राहकों (विशेषतया अन्यत्र चले जाने वाले जोख़िम-ग्राहकों) के लिये अपने मूल्य-सृजन की ड्राइव में सुधार करने के लिए निरंतर प्रयास करना आवश्यक है। दूसरी श्रेणी में घरेलू याने भारत की कम्पनियां, सरकारें, स्वास्थ्य, शिक्षा आदि क्षेत्र में आईटी अंगीकृत करने की तथा प्रगति की रफ्तार को पकड़ पाने में गति धीमी रही है। जो प्रतिभा भारत में सुलभ है उसकी तुलना में विकास बहुत ही कम हुआ है। यह हाल वैसा ही है कि गंगा आँगन में और घर के लोग प्यासे। इतना अवश्य कह सकते हैं कि बहुराष्ट्रीय कंपनियां अब भारत के विकास बाजार में आ चुकी हैं जिससे आईटी कंपनियां भारत के बाजार को गंभीरता से ले रही हैं वर्ना तो वे ग्राहकों की खोज में केवल यूरोप और अमेरिका की तरफ टकटकी लगाये हुये थी। इसका एक अच्छा परिणाम यह है कि जब इन कंपनियों ने एक बार भारत में बाजार के अवसर को पहचान लिया है तो आईटी के लिये प्रारूप के साथ मजबूत समाधान देना मुश्किल न होगा क्योंकि वे दुनिया के समक्ष बहुत बार ऐसा कर चुकी है अत: भारत में निश्चय ही आईटी-प्रसारण की उम्मीद रखी जा सकती है। पर आलोचकों का तर्क है कि भारत में व्यापार, सरकार और सामाजिक क्षेत्र में हर जगह याने सिस्टम की शुद्ध आवश्यकता में भी समझौतावादी "चलेगा' वाली आदत गुड़ गोबर कर देगी। यह तो समय ही बतायेगा कि गुड़ गोबर किस प्रकार का होगा? लेकिन लगता है वह होगा एक शराबी की राह की तरह याने 5 कदम आगे फिर 4 कदम पीछे और इस तरह भी मंजिल मिल ही जायगी। हरिहर : एशिया प्रशांत क्षेत्र में अपने व्यापक अनुभव के आधार पर आप यह बतलायें कि चीन के तकनीकी नवीनीकरण या नवाचार की तुलना में भारत की क्या स्थिति है? भारत के पास प्रजातन्त्र और अँगरेज़ी भाषा, दो अस्त्र होते हुये भी क्या आपको लगता है कि लोकतंत्र भारत की प्रगति में बाधा उत्पन्न कर रहा है? ललित याज्ञिक : भारत में प्रौद्योगिकी-नवीनीकरण परंपरागत रूप से आईटी सेवाओं के वितरण और मुख्यतया अनुप्रयोगों के प्रबंधन और नए विकास में किया गया है और जैसा कि हम जानते हैं कि बहुत सी शोध और विकास की लैब और बहुराष्ट्रीय कंपनियां किस तरह प्रतिभावान और योग्य भारतीय वैज्ञानिक और इंजीनियरों से लाभान्वित हुई हैं पर अब वे ही वैज्ञानिक और इंजीनियर लम्बे समय तक अमेरिका में रहने के बाद भारत वापस लौट रहे हैं। इसके मुकाबले में चीन ने वि?ा के और स्थानीय बाजार के लिए हार्डवेयर उत्पादों का नवीनीकरण किया है। सॉफ्टवेयर उत्पादों की पहुँच उसके अपने स्थानीय बाजार तक सीमित है । इसका परिणाम यह हुआ है कि भारत और चीन प्रतिस्पर्धा नहीं कर रहे क्योंकि वे अलग-अलग बाजार में काम कर रहे हैं। वास्तव में भारत की बहुत सी आईटी सेवा की कंपनियां चीन में इसलिये खुल रही हैं कि चीन की प्रतिभा का लाभ उठाया जाये और चीन का बाजार भी खटखटाया जाय। इसी प्रकार चीन की कंपनियों ने त्वरित और लागत-प्रभावी विकास के लिये भारत में सॉफ्टवेयर लैब खोले हैं। यहाँ तक केवल वर्तमान स्थिति का बयान है लेकिन भविष्य का परिदृश्य अलग हो सकता है। भारत के लिये अँगरेज़ी एक बहुत बड़े लाभ के खाते में चल रही है और लोकतन्त्र ने भी आईटी उद्योग पर कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं डाला। हालाँकि भारत-सरकार ने आईटी उद्योग में अगर कोई व्यवधान नहीं डाले तो वह कोई मददगार के रूप में भी आगे नहीं आई। चीन की सरकार के पास प्रजातन्त्र की वोट-प्रणाली का अभाव होने से दीर्घकालिक दृष्टि रखने की और निवेश करने की क्षमता है जो भारत की अब तक आईटी सेवाओं में लगभग एकाधिकार की स्थिति के लिये चुनौती बन सकती है। भारत के आगे निकल जाने के कारण चीन ने अब तक क्या-क्या खोया है यही सोचकर चीन त्वरित गति से निवेश कर रहा है लेकिन अब तक उसे केवल थोड़ी-बहुत सफलता मिली है। इसके लिये अँगरेज़ी को एक कारण बताया जा सकता है। मेरे विचार से आईटी सेक्टर में वै?िाक मान्यता मिलने के क्षेत्र में भारत इतना आगे है कि चीन के लिये उसे पकड़ पाना बहुत मुश्किल है। फिर भी चीन को कम आँकने की भूल नहीं करना चाहिये क्योंकि अगर चीन इस उद्देश्य के पीछे पड़ जाता है तो उसके लिये कुछ भी करना पड़े; एक लम्बी अवधि में वह वहाँ पहुँचकर ही दम लेता है। हरिहर : भारत में आम रिवाज बन चुकी भ्रष्टाचार की संस्कृति तकनीकी-नवीनीकरण से किस तरह का नाता जोड़ेगी? ललित याज्ञिक : आपने बिल्कुल ठीक कहा। भारत में भ्रष्टाचार की एक संस्कृति है। इसे बदलने के प्रयास के रूप में यदि तकनीकी-नवीनीकरण का सहारा लिया जाय तो भ्रष्टाचार को कम करने के लिए और यहां तक कि भ्रष्टाचार को खत्म करने की इसमें क्षमता है। और इसके उदाहरण भी मौजूद हैं जैसे रेलवे आरक्षण में कम्यूटर द्वारा स्वचालन, जिसने इस क्षेत्र में इतने बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार का लगभग सफाया कर दिया है। हरिहर : बड़े और संस्थागत भ्रष्टाचार के मामलों में जैसे कि 2जी घोटाले में अथवा खनन के मामले में या अदालत के मामलों में तकनीकी-नवाचार किस तरह मदद कर सकते हैं? ललित याज्ञिक : तकनीकी-नवाचार मदद कर सकते हैं, निश्चित रूप से ऐसा हो सकता है अगर सोच के सिस्टम याने संज्ञानात्मक कंप्यूटिंग (जिसमें कंप्यूटर मानव-मस्तिष्क की तरह व्यवहार करता है क्योंकि उसने पास सीखनेे की तथा "सूचना' और "ज्ञान' के भंडार के साथ तर्क-प्रक्रिया और कंप्यूटींग शक्ति उपलब्ध है।) की शक्ति से नए युग में प्रवेश किया जाय जहाँ पर उपरोक्त सभी मामलों में भ्रष्टाचार समाप्त करने की क्षमता है। उदाहरण के लिए, एक कंप्यूटर आधारित प्रणाली में ऐसा नियोजित किया जा सकता है कि एक तरह के मामलों के सभी पिछले इतिहास के आधार पर सबूत तथा स्थानीय एवं वि?ाव्यापी स्तर पर सबूत के आधार पर हुये फैसलों के संस्करण उपलब्ध हों और अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि फैसलों के कारण भी साथ में हों। हालाँकि इससे जज की जरूरत दूर नहीं होती किन्तु इस प्रकार के समानान्तर सिस्टम में जज को अपने फैसले के प्रति उत्तरदायी होना पड़ता है; जो उसे ईमानदारी के साथ पारदर्शी कार्य प्रणाली की ओर जाने के लिये बाध्य करता है। इस तरह के नवाचार लाइसेंस देने और दूसरे भ्रष्टाचाररत सार्वजनिक परिदृश्य में भी लागू किये जा सकते हैं। इसमें सफल होने के लिए कार्यपद्धति की संस्कृति को भी बदलने की जरूरत है। शिक्षित और कम शिक्षित लोगों में एक इच्छा-शक्ति होनी चाहिये कि इस तरह की प्रौद्योगिकियों के नियोजन को स्वीकार करें। अगर प्रारंभिक परिणाम सकारात्मक हों तो जनता के लिये भ्रष्टाचार की संस्कृति और रिवाज को कम करने और उसे बदलने के लिये सुधार करने का मार्ग प्रशस्त हो सकता है। इसे आप सपना कह लीजिये किन्तु वास्तविकता की शुरूआत ही सपने से होती है। यदि हर भारतीय इस प्रकार का सपना देखे तो संभावनायें अनंत हैं इस प्रौद्योगिकी की शक्ति में। भारत में अगला क्रांतिकारी नेता मेरे विचार में गांधी की तरह मानव शरीर में नहीं आयेगा किन्तु तकनीकी के वेश में पदार्पण करेगा। आज के परिवर्तनकारी नेताओं को इस दृष्टि से सोचना चाहिये क्योंकि धरना और मोर्चे भले अपनी जगह पर ठीक हैं फिर भी वे स्थायी प्रभाव छोड़ने में असमर्थ हैं क्योंकि इससे वे जनता में जागरूकता तो लाते हैं किन्तु अच्छे प्रारूप और व्यावहारिक समाधान के बिना फिर से टाँय-टाँय फिस्स हो जाते हैं। वैसे, इन प्रौद्योगिकियों की क्षमता "वाटसन इन जियोपार्डी' में पहले ही उजागर हो चुकी है जब 2011 में इस तरह के एक कंप्यूटर ने चैंपियन को हरा दिया था। अब वही पद्धति संयुक्त राज्य अमेरिका में चिकित्सा के क्षेत्र में लागू की जा रही है। मैं लोगों से अपील करता हूँ कि वे इस टेक्नोलोजी की सशक्त और परिवर्तनकारी क्षमता को पहचाने और नये तरीकों से इसका उपयोग करें। जैसा कि मैंने पहले कहा, प्रौद्योगिकीविदों में से हजारों ऐसे हैं जो अनशन-चैंपियन के साथ शामिल हुये थे, पर उन्हें केवल मोर्चे में शामिल होने के बदले अपना कौशल और व्यक्तिगत-समय तकनीकी समाधान के निर्माण में लगाना चाहिये। इस विषय में एक उदाहरण काफी है - कुछ वीडियो-कैमरे से देश की हर संदिग्ध बस में या ट्रेन में स्थापित कर दूर से निगरानी की सकती है जिससे किसी भी असामान्य गतिविधि से कई लोगों के लिए खतरे की घंटी बज उठे। परिवर्तनकारी नेता अधिक पुलिस की मांग कर रहे हैं किन्तु पुलिस की फौज की अपेक्षा तकनीकी समाधान बेहतर, स्थायी और लागत-प्रभावी होते हैं। मैं यह नहीं कहता कि अधिक पुलिस की मांग में खराबी है किन्तु इस बारे में कह नहीं सकता कि भ्रष्टाचार के दृष्टिकोण से यह हल आर्थिक रूप से व्यावहारिक और स्थायी समाधान है या नहीं? लोगों को प्रौद्योगिकी-समाधान की शक्ति को पहचानने की आवश्यकता है और यह सौभाग्य की बात है कि वै?िाक प्रदाता के रूप में भारत में यह समाधान मितव्ययी आर्थिक बजट में भी उपलब्ध है। हमारे पास जो बहुतायत में उपलब्ध है उसका उपयोग कब करेंगे? और वह है प्रौद्योगिकी की प्रतिभा। हमार पास लाखों ऐसे कुशल पेशेवर तथा छात्र मौजूद हैं जो आसानी से इस तरह के समाधान तैयार करने में सक्षम हैं। हरिहर : युवा ऑस्ट्रेलिया और विशेषकर ऑस्ट्रेलियाई आईसीटी (सूचना और संचार प्रौद्योगिकी) कॅरिअर में रुचि रखने वाले भारतीयों का भविष्य आप किस रूप में देखते हैं? मुख्यतया आईटी का काम जो भारत में आउटसोर्स किया जा रहा है उसके संदर्भ में आप क्या कहना चाहते हैं? ललित याज्ञिक : पहले तो मैं कहना चाहूँगा कि अभी आईसीटी प्रारंभिक अवस्था में है, इस क्षेत्र में अभी काफी विकास बाकी है। यह ऑस्ट्रेलिया सहित सभी देशों के लिए एक वै?िाक अवसर है। इसमें युवा ऑस्ट्रेलियाई हो या कोई भी हो आईसीटी में सफलता के लिये नवाचार या नवीनीकरण बहुत महत्वपूर्ण है; चाहे वह तकनीकी का केन्द्र भाग हो या फिर सामाजिक और व्यवसाय के क्षेत्र में अनुप्रयोग हो या आईसीटी सेवा वितरण के अर्थशास्त्र का क्षेत्र हो। इसमें टीम के विभिन्न सदस्य दुनिया के किस भाग में रहते हैं यह एक गौण बात है। किसी भी प्रयोजन के लिये टीम के विभिन्न सदस्य तीव्रता से बदले जा सकते हैं याने किसी भी देश से लिये जा सकते हैं। यह बात भारतीय पृष्ठभूमि के ऑस्ट्रेलियाई लोगों के लिए विशेष रूप से लागू होती है । ऑस्ट्रेलिया के भारतवंशियों के लिये यह एक विशेष अवसर है कि वे भारत के विशाल प्रतिभा-पूल के साथ जुड़कर ऑस्ट्रेलियाई संस्थानों में उच्च मूल्य प्रदान करने वाली टीम के रूप में आगे आ सकते हैं। यह कार्य सामान्यतया सांस्कृतिक बारीकियों के कारण मुश्किल होता है। उद्यमों के लिए भी बड़े अच्छे अवसर हैं कि भारतीय ऑस्ट्रेलियाई संयुक्त टीमों के रूप में आगे आकर वै?िाक ग्राहकों के लिए वे अद्वितीय रूप से, मूल्य सृजन कर सकते हैं

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