ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
बहुत याद आये प्रेम-पखेरू
01-Aug-2018 01:14 AM 735     

बहुत याद आये

बहुत याद आये
वे जो जिन्होंने
सफर के दिनों में
मेरे गीत गाकर
मुझको सुनाये।

बहुत याद आये
परिचित सुपरचित
वे जो जिन्होंने
पैर के नीचे के
काँटे चुराये।

बहुत याद आये
वे जो बने थे
डूबे को तिनका
बिना कुछ सोचे
अपने पराये।

 

प्रेम-पखेरू

 

 

पृथ्वी की कक्षा से बाहर
गया पखेरू जब से
मैना बिना सुये का गाना
मुखड़ा भूला तब से।

प्रेमगीत की ध्रुव पँक्तियाँ
अलग-थलग एकाकी
नहीं संगिनी बन पायीं वे
पत्थर हुई हवा की।

गुरुत्व आकर्षण धरती का
रोक न उसको पाया
गाने योग्य बचा ना कुछ भी
गीत छंद अधियाया।

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