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वास्तविक हिंदी सेवी कौन?
01-Sep-2017 10:01 AM 1955     

भारत में हिंदी कभी सत्ता की भाषा नहीं रही। वह सत्ता के विरुद्ध संग्राम की भाषा रही है। इसीलिये अगर वो राजभाषा ना भी बन पाये तो उसमें उसका कोई अपमान नहीं है।
हिंदी का विकास दूसरी भारतीय भाषाओं की तरह केवल संस्कृत से नहीं हुआ है। उसके विकास में अवधी, बृज, भोजपुरी, मैथिली, राजस्थानी, बुंदेली इत्यादि बोलियों का योगदान भी है। यह ठीक है कि उसकी उमर दूसरी भारतीय भाषाओं के मुकाबले कम है, पर इसके आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि हिंदी का कोई वजूद ही नहीं है। 1883 ईसवी में भारतेंदु हरिश्चंद्र ने घोषणा की थी कि हिंदी नई चाल में ढली। तब से अब तक हिंदी 134 साल की तो हो ही चुकी है। भाषा की उम्र वैसे भी आँकना नहीं चाहिये, उसमें बसे हुए अनुभवगम्य जगत की परीक्षा करना चाहिये। अगर आदिशंकराचार्य 32 वर्ष की उम्र में अद्वैत के सिद्धांत की सृष्टि कर सकते हैं तो इतने बड़े भारतीय समाज के लोग 134 साल में अपनी भाषा का विकास क्यों नहीं कर सकते? लेकिन वह उन्होंने किया है।
कोई कितना भी कहे कि हिंदी भारत की सम्पर्क भाषा अब तक भी नहीं बन पाई है। पर हम भारत के लोग जो उत्तर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम तक भारत में अक्सर घूमते फिरते हैं, हमें भारत के किसी राज्य में ऐसा कभी नहीं लगता कि इस राज्य के लोगों को हिंदी की समझ नहीं है।
किसी भी भाषा की गहराई का अवलोकन उसके गंभीर साहित्य को लेकर ही किया जा सकता है। बांग्ला, तेलुगु, तमिल, कन्नड़, मलयालम आदि भाषाएँ हिंदी से अधिक उम्र वाली हैं और उनका साहित्य भी उच्च कोटि का है, लेकिन अगर 134 वर्ष का जीवन जीने वाली खड़ी बोली हिंदी के साहित्य का अवलोकन किया जाये तो इसमें जयशंकर प्रसाद, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, सुमित्रानंदन पंत, महादेवी वर्मा, अज्ञेय, गजानन माधव मुक्तिबोध, नरेश मेहता, कुँवर नारायण और भवानी प्रसाद मिश्र जैसे बड़े कवि एक ऐसे कृतित्व की रचना कर सके हैं जो बीसवीं सदी के विश्व साहित्य से अपनी बराबरी कर सके। शायद हिंदी का यह साहित्य उसके आगे भी जा सकता है।
अब आते हैं राजभाषा के प्रश्न पर। यह ऐतिहासिक तथ्य है कि भारत की आजादी के बाद यहाँ भाषावार प्रांतों की रचना हुई। भारत के ज्यादातर प्रांतों के नाम उनकी भाषाओं पर ही हैं। उड़िया याने उड़ीसा, तमिलनाडु याने तमिल, महाराष्ट्र याने मराठी, गुजरात याने गुजराती, असम याने असमी वगैरह-वगैरह। लेकिन यह आश्चर्य की बात है कि भारत के हिंदी प्रदेशों के नाम कुछ अलग हैं। जैसे मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, बिहार, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश आदि। इसका अर्थ ही यह है कि हिंदी बहुतों की भाषा है और बहुतेरे राज्यों में बोली जाती है। इसलिये उसे हिंदुस्तान की भाषा कहेंगे और हिंदुस्तान की भाषा का नाम अगर हिंदी नहीं होगा तो क्या होगा? - मशहूर शायर इकबाल ने कहा ही है कि - हिंदी है हम वतन है हिंदोस्तां हमारा। यहां हिंदी होने का मतलब हिंदुस्तानी होना है और एक मतलब यह भी है कि हिंदुस्तान में रहने वाले लोग हिंदी कहलाते हैं। तो चूंकि हिंदी एक भाषा भी है तो जाहिर है वो उसे ही बोलते होंगे।
यह भी अक्सर सुनने में आता है कि कुछ लोग बुंदेलखंडी, भोजपुरी और छत्तीसगढ़ी जैसी बोलियों को भाषा के तौर पर स्वीकृत करने की माँग करते रहते हैं, जबकि यह बोलियां हिंदी की माताएँ हैं। क्या माताएँ अपनी संतान से दूर अपना घर बसाती हैं। पूरे भारत में हर कोई कहेगा कि नहीं। इसीलिये यह विचारणीय प्रश्न हो गया है कि कृपया उन बोलियों के नाम पर स्वायत्त भाषाओं की माँग न करें जो हिंदी की माताएँ और बहनें भी हैं।
हिंदी के बारे मे एक तथ्य यह भी है कि अभी भी वह बोली है। उसे खड़ी बोली कहा जाता है। भाषा तो वह बन रही है। हो सकता है वह कभी भाषा बन जाये और अपने लिये एक बहुत बड़े भारत की माँग करे, लेकिन हिंदी के स्वभाव को पहचानते हुए हम कह सकते हैं कि हिंदी ऐसा नहीं करेगी। वह पूरे भारत की भाषा बनकर ही अपने गौरव को पाने के लिये निरंतर भारत के लोगों के कंठ में बसी हुई है और उसने अपनी यह जगह आज तक नहीं छोड़ी है। यही कारण है कि अनेक भाषाई विभाजनों के बावजूद भी भारत के लोग देश के हर प्रांत में आवाजाही करते हैं और उन्हें संवाद करने में कोई असुविधा नहीं होती। अगर हो रही होती तो भारत का कोई भी एक खब्ती आदमी अब तक सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दर्ज कर चुका होता।
भारत में राजभाषा की समस्या थोड़ी भिन्न है। जब फिरंगी भारत छोड़कर गये तो वे अपने भारतीय मातहतों को यहीं छोड़ गये। जिन्हें फिरंगियों के राजकाज के दिनों में अंग्रेजी भाषा में दीक्षित किया गया था। वे कुछ ऐसे लोग थे जो अंग्रेजी के साथ-साथ अंग्रेजियत में भी रंग चुके थे। निश्चय ही कुछ राजनेता भी ऐसे ही रहे होंगे।
जब भाषावार प्रांतों का विवाद आजादी के बाद भारत के सिर पर हावी हुआ तब हिंदी का अस्तित्व तो नहीं मिटा, लेकिन राज्य की संपर्क भाषा, जाने अनजाने अंग्रेजी बन गई और यह परम्परा अभी तक चली आ रही है। अंग्रेजी ही क्यों अभी भी हमारी अदालतों के बाहर बैठे अर्जीनवीस अरबी-फारसी शब्दों का इस्तेमाल करते हैं और अदालतों द्वारा हिंदी में लिखे गये फैसलों को पढ़ने के बाद यह समझना बहुत मुश्किल होता है कि फैसला किसके पक्ष में हुआ है। अच्छे-अच्छे हिंदी जानने वाले भी उस अदालती फैसलों की हिंदी को समझ नहीं पाते और अक्सर यह कहते पाये जाते हैं कि इससे अच्छी तो अंग्रेजी भली।
दरअसल भारत में भाषाओं के प्रति घृणा का भाव कभी नहीं रहा। सभी महान विभूतियाँ सभी भाषाओं का आदर करती रहीं, इसी कारण उनने उदारतापूर्वक भाषायी प्रांत बना दिये। लेकिन उनके मन में यह सद्इच्छा रही कि किसी एक महादेश की एक संपर्क भाषा होनी ही चाहिये और यह गुण उन्होंने सिवाय हिंदी के और किसी भी भाषा में नहीं पाया। इसीलिये भारत पर हिंदी को थोपे जाने जैसी आपत्तियां बहुत बेहूदा हैं। उन पर आज भी पुनर्विचार की आवश्यकता है। यह संकट आज भी जरूर बना हुआ है कि हमारी भारत सरकार या दूसरी राज्य सरकारें सोचती अंग्रेजी में हैं, क्योंकि उनके मुलाजिम अंग्रेजियत के शिकार हैं और अंग्रेजी में सोचे हुए का अनुवाद करना एक अनुवादक नौकर का काम है। भारत में सरकार के फरमान का अनुवाद करना एक नौकरी है। शासक अंग्रेजी है। यह भेद जब तक मिटाया न जायेगा तब तक हिंदीसेवी बिना अंग्रेजी को जाने हिंदी की वकालत करते रहेंगे और अंग्रेजीसेवी बिना हिंदी को जाने अंग्रेजी की वकालत कर ही रहे हैं।
हमारे देश में हिंदी सेवा एक धंधा है। हिंदी भवन हैं, अनेक संस्थाओं में हिंदी अधिकारी हैं। आसपास के हिंदी द्वीपों पर विदेश यात्रा करने की सपरिवार सुविधा है। यह सुविधा हिंदी के सच्चे लेखकों को उतनी नहीं, जितनी हिंदी सेवा के नाम पर चंदा देने वाले सेठों को है जो अपनी सेठानियों के साथ फीजी, गुयाना, मॉरीशस और सूरीनाम घूमा करते हैं। भाषा का संबंध गर्भनाल से भी होता है, इसीलिये उसको भातृभाषा कहते हैं। बहुत ही अच्छा है कि तमिल मातृभाषी तमिल बोलें, बांग्ला मातृभाषी बांग्ला, असमी मातृभाषी असमी, पर हमारा सविनय निवेदन यह भी है कि वे एक ऐसी भाषा भी बोलें जो आज सभी बोल रहे हैं और जिसे हिंदी कहते हैं। उसे देश को जोड़ने के लिये बनाये, बचाये रख सकें।

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