ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
वर्षा वर्णन
CATEGORY : वर्षा स्मृति 01-Jul-2016 12:00 AM 1577
वर्षा वर्णन

गोस्वामी तुलसीदास
प्रयाग के पास बाँदा जिले में राजापुर नामक गाँव में संवत् 1554 को जन्म। का¶ाी में पंद्रह वर्षों तक वेदों और दूसरे संस्कृत ग्रंथों का अध्ययन। विवाह के बाद पत्नी मोह और पत्नी की फटकार के बाद सन्यासी हो गये। संवत् 1631 में घर-घर में पढ़े जाने वाले ग्रन्थ रामचरित मानस और विनय पत्रिका की रचना है। संवत् 1680 में ¶ारीर त्यागा।

 

घन घमंड नभ गरजत घोरा। प्रिया हीन डरपत मन मोरा।।
दामिनि दमक रह न घन माहीं। खल कै प्रीति जथा थिर नाहीं।।
आका¶ा में बादल घुमड़-घुमड़कर घोर गर्जना कर रहे हैं, प्रिया (सीता) के बिना मेरा मन डर रहा है। बिजली की चमक बादलों में ठहरती नहीं, जैसे दुष्ट की प्रीति स्थिर नहीं रहती।

बरषहिं जलद भूमि निअराएँ। जथा नवहिं बुध बिद्या पाएँ।
बूँद अघात सहहिं गिरि कैसें। खल के बचन संत सह जैसें।।
बादल पृथ्वी के समीप आकर (नीचे उतरकर) बरस रहे हैं, जैसे विद्या पाकर विद्वान् नम्र हो जाते हैं। बूँदों की चोट पर्वत कैसे सहते हैं, जैसे दुष्टों के वचन संत सहते हैं।

छुद्र नदीं भरि चलीं तोराई। जस थोरेहुँ धन खल इतराई।।
भूमि परत भा ढाबर पानी। जनु जीवहि माया लपटानी।।
छोटी नदियाँ भरकर (किनारों को) तुड़ाती हुई चलीं, जैसे थोड़े धन से भी दुष्ट इतरा जाते हैं (मर्यादा का त्याग कर देते हैं)। पृथ्वी पर पड़ते ही पानी गँदला हो गया है, जैसे ¶ाुद्ध जीव के माया लिपट गई हो।

समिटि समिटि जल भरहिं तलावा।
जिमि सदगुन सज्जन पहिं आवा।।
सरिता जल जलनिधि महुँ जाई।
होइ अचल जिमि जिव हरि पाई।।
जल एकत्र हो-होकर तालाबों में भर रहा है, जैसे सद्गुण (एक-एककर) सज्जन के पास चले आते हैं। नदी का जल समुद्र में जाकर वैसे ही स्थिर हो जाता है, जैसे जीव हरि को पाकर अचल (आवागमन से मुक्त) हो जाता है।

दो0 - हरित भूमि तृन संकुल समुझि परहिं नहिं पंथ।
जिमि पाखंड बाद तें गुप्त होहिं सदग्रंथ।।
पृथ्वी घास से परिपूर्ण होकर हरी हो गई है, जिससे रास्ते समझ नहीं पड़ते। जैसे पाखंड-मत के प्रचार से सद्ग्रंथ गुप्त (लुप्त) हो जाते हैं।।

दादुर धुनि चहु दिसा सुहाई।
बेद पढ़हिं जनु बटु समुदाई।।
नव पल्लव भए बिटप अनेका।
साधक मन जस मिलें बिबेका।।
चारों दि¶ााओं में मेढकों की ध्वनि ऐसी सुहावनी लगती है, मानो विद्यार्थियों के समुदाय वेद पढ़ रहे हों। अनेकों वृक्षों में नए पत्ते आ गए हैं, जिससे वे ऐसे हरे-भरे एवं सु¶ाोभित हो गए हैं जैसे साधक का मन विवेक (ज्ञान) प्राप्त होने पर हो जाता है।

अर्क जवास पात बिनु भयऊ।
जस सुराज खल उद्यम गयऊ।।
खोजत कतहुँ मिलइ नहिं धूरी।
करइ क्रोध जिमि धरमहि दूरी।।
मदार और जवासा बिना पत्ते के हो गए (उनके पत्ते झड़ गए)। जैसे श्रेष्ठ राज्य में दुष्टों का उद्यम जाता रहा (उनकी एक भी नहीं चलती)। धूल कहीं खोजने पर भी नहीं मिलती, जैसे क्रोध धर्म को दूर कर देता है (अर्थात क्रोध का आवे¶ा होने पर धर्म का ज्ञान नहीं रह जाता)।

ससि संपन्न सोह महि कैसी।
उपकारी कै संपति जैसी।।
निसि तम घन खद्योत बिराजा।
जनु दंभिन्ह कर मिला समाजा।।
अन्न से युक्त (लहलहाती हुई खेती से हरी-भरी) पृथ्वी कैसी ¶ाोभित हो रही है, जैसी उपकारी पुरुष की संपत्ति। रात के घने अंधकार में जुगनू ¶ाोभा पा रहे हैं, मानो दंभियों का समाज आ जुटा हो।
महाबृष्टि चलि फूटि किआरीं।
जिमि सुतंत्र भएँ बिगरहिं नारीं।।
कृषी निरावहिं चतुर किसाना।
जिमि बुध तजहिं मोह मद माना।।
भारी वर्षा से खेतों की क्यारियाँ फूट चली हैं, जैसे स्वतंत्र होने से स्त्रियाँ बिगड़ जाती हैं। चतुर किसान खेतों को निरा रहे हैं (उनमें से घास आदि को निकालकर फेंक रहे हैं)। जैसे विद्वान लोग मोह, मद और मान का त्याग कर देते हैं।

देखिअत चक्रबाक खग नाहीं।
कलिहि पाइ जिमि धर्म पराहीं।।
ऊषर बरषइ तृन नहिं जामा।
जिमि हरिजन हियँ उपज न कामा।।
चक्रवाक पक्षी दिखाई नहीं दे रहे हैं; जैसे कलियुग को पाकर धर्म भाग जाते हैं। ऊसर में वर्षा होती है, पर वहाँ घास तक नहीं उगती, जैसे हरिभक्त के ह्मदय में काम नहीं उत्पन्न होता।

बिबिध जंतु संकुल महि भ्राजा।
प्रजा बाढ़ जिमि पाइ सुराजा।।
जहँ तहँ रहे पथिक थकि नाना।
जिमि इंद्रिय गन उपजें ग्याना।।
पृथ्वी अनेक तरह के जीवों से भरी हुई उसी तरह ¶ाोभायमान है, जैसे सुराज्य पाकर प्रजा की वृद्धि होती है। जहाँ-तहाँ अनेक पथिक थककर ठहरे हुए हैं, जैसे ज्ञान उत्पन्न होने पर इंद्रियाँ (¶िाथिल होकर विषयों की ओर जाना छोड़ देती हैं)।

दो0 - कबहुँ प्रबल बह मारुत जहँ तहँ मेघ बिलाहिं।
जिमि कपूत के उपजें कुल सद्धर्म नसाहिं।।
कभी-कभी वायु बड़े जोर से चलने लगती है, जिससे बादल जहाँ-तहाँ गायब हो जाते हैं। जैसे कुपुत्र के उत्पन्न होने से कुल के उत्तम धर्म (श्रेष्ठ आचरण) नष्ट हो जाते हैं।।
कबहु दिवस महँ निबिड़ तम कबहुँक प्रगट पतंग।
बिनसइ उपजइ ग्यान जिमि पाइ कुसंग सुसंग।।
कभी (बादलों के कारण) दिन में घोर अंधकार छा जाता है और कभी सूर्य प्रकट हो जाते हैं। जैसे कुसंग पाकर ज्ञान नष्ट हो जाता है और सुसंग पाकर उत्पन्न हो जाता है।।

 

सेनापति
सेनापति भक्ति काल एवं रीति काल के सन्धियुग के कवि हैं। इनकी रचनाओं में हिन्दी साहित्य की दोनों धाराओं का प्रभाव पड़ा है जिनमें भक्ति और ¶ाृंगार दोनों का मिश्रण है। इनके ऋतु वर्णन में सूक्ष्म प्रकृति निरीक्षण पाया जाता है जो साहित्य में अद्वितीय है। सेनापति के दो मुख्य ग्रंथ हैं- काव्य-कल्पद्रुम तथा कवित्त-रत्नाकर। जिसकी उपमाएँ अनूठी हैं। सेनापति के काव्य में रीतिकालीन काव्य-परम्परा की झलक अधिकां¶ा छन्दों में स्पष्ट रूप से विद्यमान है। चमत्कार प्रियता नायिका भेद के उदाहरण भी उनकी कृतियों में उपलब्ध है।

वर्षा


"सेनापति' नए गए जल्द सावन कै
चारिह दिसनि घुमरत भरे तोई के।
सोभा सरसाने, न बखाने जात कहूँ भांति,
आने हैं पहार मानो काजर कै ढोइ कै।
धन सों गगन छ्यों, तिमिर सघन भयो,
देखि न् परत मानो रवि गयो खोई कै।
चारि मासि भरि स्याम नि¶ाा को भरम मानि,
मेरी जान, याही ते रहत हरि सोई कै।

दामिनी दमक, सुरचाप की चमक, स्याम
घटा की घमक अति घोर घनघोर तै।
कोकिला, कलापी कल कूजत हैं जित-तित
सीतल है हीतल, समीर झकझोर तै।।
सेनापति आवन कह्रों हैं मनभावन, सु
लाग्यो तरसावन विरह-जुर ज़ोर तै।
आयो सखि सावन, मदन सरसावन
लग्यो है बरसावन सलिल चहुँ ओर तै।।

पद्माकर
रीति काल के ब्राजभाषा कवियों में पद्माकर (1753-1833) का महत्त्वपूर्ण स्थान है। मूलतः तेलगु भाषी इनके पूर्वज दक्षिण के आत्रेय, आर्चनानस, ¶ाबास्य-त्रिप्रवरान्वित, कृष्ण यजुर्वेद की तैत्तरीय ¶ााखा के य¶ास्वी तैलंग ब्रााहृण थे। पद्माकर के पिता मोहनलाल भट्ट सागर में बस गए थे। यहीं पद्माकर जी का जन्म सन् 1753 में हुआ। हिन्दी साहित्य का इतिहास में आचार्य रामचंद्र ¶ाुक्ल और बाँदा डिस्ट्रिक्ट गजेटियर के अलावा कुछ विद्वान मध्यप्रदे¶ा के सागर की बजाय उत्तर प्रदे¶ा के नगर बांदा को पद्माकर की जन्मभूमि कहते हैं।

ऋतु वर्णन
मल्लिक न मंजुल मलिंद मतवारे मिले,
मंद-मंद मारुत मुहीम मनसा की है।
कहै "पदमाकर' त्यों नदन नदीन नित,
नागर नबेलिन की नजर नसा की है।
दौरत दरेर देत दादुर सु दुन्दै दीह,
दामिनी दमकंत दिसान में दसा की है।
बद्दलनि बुंदनि बिलोकी बगुलात बाग,
बंगलान बलिन बहार बरषा की है।

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