ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
वर्षा-मंगल
01-Jul-2016 12:00 AM 3028     

ऋग्वेद के पाँचवे मंडल के 83वें सूक्त की इस प्रथम ऋचा में उस वैदिक महा¶ाक्ति¶ााली, दानवीर और भीम गर्जना करने वाले पर्जन्य देवता की स्तुति की गई है, जो वृषभ के समान निर्भीक है और पृथ्वीतल की औषधियों में बीजारोपण करके नवजीवन के आगमन की सूचना देते हैं। यहाँ पर्जन्य (पज्र्जन्य या पय्र्यन्य भी) - "पृष' (जह सींचना) धातु में "अन्य' प्रत्यय लगाने से और ष को ज या य से विस्थापित करने से बना है। धारणा यह रही होगी कि पर्जन्य देवता यानि मॉनसून के मेघ बरस कर धरती को जल से परिपूरित कर प्रकृति में नवजीवन की सृष्टि करते हैं। पर्जन्य देवता गर्जना करने वाले वृषभ हैं। संस्कृत भाषा में "वृष' का अर्थ भी सींचना है और इसी धातु से वृषभ, वृषण, वृष्टि, वर्षण, वर्षा और वर्ष जैसे ¶ाब्द बने हैं।
स्पष्ट है कि वैदिक काल से ही भारतीय जनमानस में वर्षा ऋतु के प्रति सम्मान और गौरव का भाव रहा है। यह इससे और भी साफ़ हो जाता है कि महाभारत में अपने दे¶ा को भारतवर्ष कहा गया।
भौगोलिक दृष्टिकोण से भी यह सही जान पड़ता है, क्योंकि इसी दे¶ा के पूर्वोत्तर भाग में स्थित मेघालय प्रदे¶ा के अंतर्गत पूर्वी खासी पहाड़ी में मौसिनराम नामक एक गाँव है, जहाँ वि·ा में सर्वाधिक वर्षा होती है। भारतवर्ष नामकरण के पीछे दूसरी बात यह भी हो सकती है कि यहाँ कृषि पर आधारित अर्थव्यवस्था वर्षा पर ही आश्रित है।
कारण चाहे जो भी रहा हो, भारतीय जनमानस को प्रतिबिंबित करता भारतीय साहित्य भी वर्षा ऋतु की नैसर्गिक सुषमा से परिपूर्ण है। संस्कृत के आदिकवि वाल्मीकि और कवियों में श्रेष्ठ कालिदास ने तो वर्षा का जैसा बखान किया है, वह वि·ा साहित्य में अन्यत्र दुर्लभ है।
वाल्मीकि कृत रामायण के किष्किन्धाकाण्ड के 28वें सर्ग में राम वर्षा की सुंदरता का वर्णन करते हुए कहते हैं, "वर्षाकाल आ पहुँचा। देखो, पर्वत के समान बड़े-बड़े मेघों के समूह से आका¶ा आच्छादित हो गया है। आका¶ा सूर्य की किरणों के माध्यम से समुद्र के जल को खींचकर और नौ मास (मध्य आ·िान से मध्य ज्येष्ठ तक) तक गर्भ धारण कर, अब वृष्टि रूपी रसायन को उत्पन्न कर रहा है। इस समय इन मेघ रूपी सीढ़ियों से आका¶ा में पहुँचकर, कौरेया और अर्जुन के फूलों के हार सी दिखने वाली मेघमालाओं से सूर्य बिम्ब स्थित अलंकार प्रिय नारायण ¶ाोभा पा रहे हैं।'
पहाड़ों की ढलानों पर उतरते हुए मेघों को देखकर कवि मुग्ध हो कह उठते हैं, "इन पहाड़ों ने जिनकी कन्दरा रूपी मुखों में हवा भरी हुई है, जो मेघ रूपी काले मृगचर्म और वर्षा की धारा रूपी यज्ञोपवीत धारण किये हुए हैं, मानो वेदोच्चारण करना आरम्भ कर दिया है।' ध्यातव्य है कि प्राचीन काल में राजा, सैनिक, व्यापारी, गृहस्थ, ब्रााहृण और साधु-संत अपनी यात्रायें स्थगित कर देते थे और इस चातुर्मास की अवधि को वेद अध्ययन के लिए उपयुक्त माना जाता था, साथ ही चातुर्मास के आरम्भ से ही वर्ष की ¶ाुरुआत मानी जाती थी।
इनके अलावे कवि ने वर्षा काल में नदियों के कलनिनाद, झरनों के झर-झर, मेढकों के टर्र-टर्र, झींगुरों के झिर-झिर और वनों, उपवनों की सुंदरता तथा प¶ाु-पक्षियों के क्रीड़ा-किल्लोल का अद्भुत चित्रण किया है। कवि कुछ किंवदन्तियों का भी जिक्र करते हैं, यथा राजहंस नीर-क्षीर विवेकी होते हैं, अतएव वे बरसात के गंदले जल को छोड़ इस ऋतु में हिमालय स्थित मानसरोवर को प्रस्थान कर जाते हैं।
एक प्रवासी चिड़िया है- चातक, पपीहा या द्रत्ड्ढड्ड ड़द्धड्ढद्मद्यड्ढड्ड ड़द्वड़त्त्दृदृ। कुछ लोग चातक और पपीहा को अलग-अलग बताते हैं। खैर, इसकी खासियत यह है कि यह मॉनसून (अरबी मूल व-स-म, चिह्न से बने ¶ाब्द मौसम से) के आगमन से कुछ पहले मई-जून में अफ्रीका से उड़ती हुई भारतीय प्रायद्वीप आ जाती है। इसे वर्षा के आगमन का पूर्व दूत माना जाता है। इसके नर "पियु पियु' की आवाज निकालते हैं, जिसे लोग "पिय आया, पिय आया' का सन्दे¶ा समझते हैं। संस्कृत में चातक की व्युत्पत्ति -  चत द्यदृ डड्ढढ़, भीख माँगना और ण्वुल् प्रत्यय है। किंवदन्ती है कि चातक मात्र वर्षा जल ही पीते हैं, अतएव ये आसमाँ की ओर टकटकी लगाकर मेघों से वर्षा जल की भीख माँगते हैं। वर्षा ऋतु का एक पर्यायवाची ¶ाब्द चातकानंदन यानि चातक आनंदन (चातक को आनंद देने वाली ऋतु) भी है। वर्षा काल की समाप्ति के उपरान्त अक्टूबर-नवम्बर तक ये पक्षी लौटते मॉनसून के साथ पुनः अरब सागर होते हुए वापस अफ्रीका चले जाते हैं, ठीक वैसे जैसे परदे¶ाी बलम चातुर्मास बीतने के बाद अपनी प्रियतमा को छोड़ वापस काम पर लौट जाया करते थे।
क्या पावस (प्रवृष) ऋतु का यह ¶ाब्दचित्र अन्यत्र सम्भव है? इसका उत्तर कविकुल ¶िारोमणि तुलसीदास कृत रामचरितमानस के वर्षा-वर्णन में पाते हैं। हिंदी की लोकभाषा अवधी में रामकथा कहकर तुलसी वाल्मीकि से भी ज़्यादा जन-जन में ख्याति पाते हैं। पत्रिका के इस अंक में अपने पाठकों के अवलोकन के लिए इसीलिए हमने तुलसीदास के वर्षा वर्णन को स्थान दिया है।
संस्कृत कवियों में श्रेष्ठ कालिदास रचित "मेघदूतम्' वि·ा साहित्य की अनमोल धरोहर है। इसमें अलकापुरी से भटके और ¶ाापग्रस्त यक्ष द्वारा मेघों को दूत मानकर अपनी प्रिया यक्षिणी तक विरह-वेदना और प्रेम सन्दे¶ा भेज देने का निवेदन है। कहते हैं कि कालिदास ही वह यक्ष थे, जो उज्जैन से क¶मीर तक अपनी प्रियतमा को मेघों से संदे¶ाा भेजना चाहते थे। आधुनिक हिंदी साहित्य के पहले नाटक "आषाढ़ का पहला दिन' में मोहन राके¶ा ने इसी विषय को उठाया है। इस नाटक पर आधारित कई फिल्में भी बन चुकी हैं। इस अंक में हमने कालिदास से इतर सोच रखने वाले आधुनिक कवि श्रीकांत वर्मा के अन्तद्र्वन्द्व को चित्रित करती कविता "भटका मेघ' को भी संकलित किया है।
साथ ही, हिंदी साहित्य के आदि काल, भक्तिकाल, रीतिकाल और छायावाद की प्रतिनिधि पावस-पायस रूपी रचनाओं को आपके रसास्वादन के लिए परोसा है।
भारतीय साहित्य ही नहीं मुगलकालीन चित्रों और भारतीय संगीत भी वर्षा-मंगल या वर्षा-उमंग से परिपूर्ण है। संगीत में राग मल्हार से जुड़े अनेक मिथक हैं और आम धारणा है कि यह राग ग्रीष्म ऋतु के मल को हर लेता है और मेघ-वर्षण का माहौल बनाता है। किंतु कम लोगों को यह पता है कि मालाबार केरल राज्य मे अवस्थित प¶िचमी घाट और अरब सागर के बीच भारतीय प्रायद्वीप के प¶िचम तट के समानांतर एक संकीर्ण तटवर्ती क्षेत्र है। मलयालम में माला का अर्थ है - पर्वत और वारम् का अर्थ है- क्षेत्र। कालांतर में मालाबार से दक्षिण भारत के पूरे चन्दन वन क्षेत्र को जाना जाने लगा। संस्कृत में मलयज का अर्थ - चन्दन से जन्मा है। संस्कृत और हिंदी साहित्य में मलय पवन या मलय मरुत् का जन्म स्थान भारत का यही दक्षिण प¶िचमी तट है, जहाँ गर्मियों के बाद अरब सागर से मॉनसून पवन दस्तक देता है और फिर पूरे भारत में वर्षा होती है। यह मलय पवन ही सम्भवतः मॉनसून विंड है, जिसकी चर्चा मलयानिल के नाम से काव्यों में है। बंकिम बाबू "वन्दे मातरम्' में भारत भूमि को "मलयज ¶ाीतलाम् ¶ास्य ¶यामलाम्' कहते हैं, जिसका साधारण अर्थ - चन्दन सा ¶ाीतल और धान के ¶यामल रंग से सु¶ाोभित है; किन्तु इसका व्यापक अर्थ है - मलय पवन की वर्षा से ग्रीष्म ऋतु को ¶ाीतलता देती, धान्य सम्पन्न धरती। भारतीय संगीत का मल्हार राग वस्तुतः मलय पवन को हरने वाला, आहरित करने वाला (ह्म, द्यदृ ड्डद्धठ्ठध्र्) राग है। जिस तरह राग दीपक में वातावरण में ऊष्मा का आभास कराने का सामथ्र्य है, उसी तरह मल्हार में वर्षा ऋतु का माहौल पैदा किया जाता है। राग मल्हार समेत उप¶ाास्त्रीय संगीत की वर्षाकालीन विधा कजरी (कद् जल या काजल जैसे मेघ का संगीत) को भी हमने इस अंक में स्थान दिया है।
भारत में वर्षा काल ज्येष्ठ से ¶ाुरू होकर भादों तक चलता है। ज्येष्ठ ज्या (पृथ्वी) के तपन की ¶ाुरुआत है। आषाढ़ असह्र गर्मी का द्योतक है। श्रावण में प्रकृति के स्वरों का श्रवण होता है और भाद्रपद में घर-आँगन समेत पूरा बिखरे मेघों वाला आका¶ा ऐसा दिखता है, मानो किसी गाय (भद्रा) ने अपने खुर (पाद) से रौंद दिया हो। हमारे प्रवासी मित्र परदेस में वर्षा ऋतु का आनन्द-उत्सव कैसे मनाते हैं, इसे हमने ख़ास तौर पर जानने का प्रयास किया है।
वर्षा ऋतु भारत के लिए सर्वतोभद्र है। यह महीनों रेगिस्तान की गर्मी में सफर कर रहे क्लांत पथिक को नदी का किनारा मिलने जैसा है। यह सुखद संयोग है कि इस वर्ष मौसम वैज्ञानिकों ने औसत से ज़्यादा वर्षा होने की भविष्यवाणी की है। इससे हमारे कृषकों को लाभ पहुँचे और हमारी अर्थव्यवस्था मज़बूत हो। ¶ाुभकामनाएँ!

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