ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
वर्षा बहार : रस की फुहार
01-Jul-2018 05:25 AM 569     

यह मॉनसून का समय है। भारतवर्ष के लिए मॉनसून मात्र हिन्द महासागर में उठने वाली व्यापारिक हवा नहीं है, बल्कि यह एक भव्य, जटिल और रहस्यमय घटना है। यह कविता है - हवा, दवाब, वर्षा और उससे प्रभावित भारतीय जन-गण-मन के जटिल निकाय की। मॉनसून का अरबी मूल है - मौसिम, जिसका अर्थ है - वर्ष का समय अथवा उपयुक्त ऋतु। प्राचीन समय में नाविक इसी समुद्री हवा का सहारा लेते हुए नाव खेपते हुए तीर्थाटन अथवा समुद्री यात्रा किया करते थे। भारतीय प्रायद्वीप में मॉनसून की अपनी विशिष्टता है। यह यहाँ दो शाखाओं में प्रकट होता है - अरब सागर में उत्पन्न दक्षिण-पश्चिम मॉनसून और बंगाल की खाड़ी में उत्पन्न दक्षिण-पूर्व मॉनसून। मॉनसून इस देश का भाग्य विधाता है, क्योंकि यह अपने साथ कृषि हेतु प्रचुर वर्षा लाता है और इस भाग्य का निर्धारण तिब्बत के पठार की गर्मी, दक्षिणी गोलाद्र्ध में व्यापारिक पवन के चलने और पृथ्वी के अपने अक्ष पर घूर्णन के संयुक्त सिम्फनी ऑरकेस्ट्रा की रागात्मक लहरी से होता है।
केरल (प्राचीन मालबार) के कोवलम (नारियल पेड़ों का समूह) तट पर मॉनसून मई के अंत तक बिल्कुल शाही अंदाज में आता है और गोवा में यह जन-जीवन में बाल-सुलभ क्रीड़ा-कौतुक जगाता है। मुंबई में यह चिमनियों से निकलते धुएँ और गर्द-गुबार के मिश्रण को दूर धकेलता नज़र आता है, तो उत्सवप्रिय कोलकाता में यह रामधुनष (इंद्रधनुष) की छटा बिखेरता हुआ कवियों, प्रेमियों और सौंदर्य-पिपासुओं को मन्त्र-मुग्ध करता नज़र आता है। मॉनसून पुरवैया पर चढ़कर उत्तर प्रदेश होते हुए पूरब दिशा से दिल्ली पहुँचता है। अंततः प्रेमातिरेक में यह मन हर्षाता, रस बरसाता अपने घर मेघालय की हरी-भरी पहाड़ियों में जाकर ठहर सा जाता है।
मॉनसून आधुनिक राजनीतिक और भाषाई सीमाओं को नहीं पहचानता है, इसलिए आज भी मौसम की खबरों में मालबार, विदर्भ, मराठवाड़ा, कोंकण, रॉयलसीमा इत्यादि वर्षा-क्षेत्रों का ही उल्लेख होता है।
एक तरफ मॉनसून अपने रास्ते में पड़ने वाले झुग्गी-झोपड़ी वासियों के लिए निराशा बन कर आता है, तो दूसरी ओर भारतीय किसानों के लिए आशा का संदेश लाता है। ऐसा लगता है मानो स्वयं घनश्याम (काले मेघों सदृश) श्रीकृष्ण कह रहे हों, "समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रयिः। ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम्।।9.29।।" (मैं समस्त प्राणियों से समभाव रखता हूँ - न किसी से द्वेष और न ही प्रेम। किन्तु, जो मुझे सब कुछ अर्पण कर देते हैं, वे मुझमें हैं और मैं उनमें हूँ।)
पंजाबी में मॉनसून की बारिश का नाम मींह (ग्ड्ढड्ढदण्) है, तो मिजो लोगों के लिए यह सुन्दर रुहसर (ङद्वठ्ठण्द्मठ्ठद्ध) है। बनारस वाले इसे अपने मस्त अंदाज़ में "टिप-टिपवा" कहते हैं, वहीं बंगाल के लोग इसे "टापुर-टुपुर" कहना पसन्द करते हैं - बॄष्टि पौड़े टापुर टुपुर नोदे एलो बान, शिब ठाकुरेर बिये हौबे, तीन कोन्ने दान। (टिप-टिप पानी बरस रहा है। नदी में बाढ़ आ गई। भगवान शिव का विवाह होगा। तीन कन्याओं का दान होना है।) कोंकणी भाषा में मॉनसून का नाम चिरचरी (क्ण्त्द्धड़ण्द्धत्) है और तमिल में थूरल (च्र्ण्दृदृद्धठ्ठथ्)। झारखंड में मॉनसून की वर्षा का नाम "झार" (झाइर) है, जिसका मूल शब्द "झर" (झरना, निर्झर) है। झर, क्षर और अर में ज़्यादा फर्क नहीं है। ये सभी शब्द झरने-गिरने-बहने यानि पानी के गिरने की आवाज या रूप परिवत्र्तन (क्षरण) के द्योतक हैं। इसलिए बादल भी "क्षर" है और वर्षा भी, किन्तु पानी का क्षय नहीं होता है अर्थात् यह हिम, जल या जलवाष्प की अवस्था को ग्रहणकर मात्र रूप बदलता है, इस कारण यह अक्षर भी है। इस तरह झारखंड का सम्बंध मॉनसून की वर्षा से है। अपने देश का नाम भारतवर्ष होना भी महाभारत में वर्णित कुल नौ वर्षा क्षेत्रों का समूह होने के कारण है।
दो शब्द हैं - वर्ष और अवसर। इन दोनों का अर्थ साल यानि समय तो है ही, इनका दूसरा अर्थ वर्षाकाल भी है। इसका कारण यह है कि प्राचीन समय में परदेश में काम करने वाले लोग इसी अवसर (अव, नीचे और सर, गिरना) पर अपने घर लौटते थे और तभी उनका नववर्ष होता था। जीवन में सबको अंकुरित, पल्लवित, पुष्पित और फलित होने का अवसर परमात्मा देते हैं। इस वाक्य से भी अवसर का अर्थ स्पष्ट हो जाता है। वर्ष, वर्षा, वृष्टि, वृषण, वृष्णि, वृषभ इत्यादि सभी शब्द "वृष" धातु से निष्पन्न है, जिसका अर्थ है - छीटें डालना या छिड़कना। धरती का एक पर्यायवाची "गो" है और आकाश में वृषभ है। बरसात गो और वृषभ का मिलन समय है। श्रीकृष्ण वृष्णि कुल के हैं और राधा वृषभानु की तनया, शायद इसीलिए श्रीकृष्ण गोवर्धन (धरती का विकास) धारण करते हैं। वैदिक युग में इंद्र वर्षा के देवता हैं, किन्तु कालक्रम में उपेंद्र स्वरूप घनश्याम श्रीकृष्ण ही कृषकों, गौ पालकों को अतिवृष्टि से बचाते हैं।
इनके अतिरिक्त, गुजराती में वर्षा के लिए "वर्षाद", तमिल में "मअइ" भी, तेलगु में "वर्षा" ही और कन्नड़ में "मले" शब्द है। इसी तरह मॉनसून के भी कुछ क्षेत्रीय नाम हैं। यह गुजराती में "कोमासु", तेलगु में "ऋतुपवनालु" और तमिल में "परुवमई" है। मॉनसून पवन की महिमा का सही बखान बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय ने "वन्दे मातरम्" में इस प्रकार किया है, "सुजलाम् सुफलाम् मलयज शीतलाम् शस्यश्यामलाम् मातरम्...", अर्थात् भारत माता केरल के मालाबार तट से चलने से उत्पन्न होने वाली जलयुक्त, शीतल और फल देनेवाली मलय पवन (मॉनसून) के कारण हरे-भरे धान के खेतों से सुशोभित होती है। इस विविधताओं वाले देश में भले ही भाषा, संस्कृति, धर्म और रीति-रिवाज अलग-अलग हो, किन्तु मॉनसून का पानी भावात्मक एकता को जन्म देता है। पानी कोई भेद नहीं करता है और पानी का कोई अपना रंग नहीं होता है; इसे जिस रंग में मिलाओ, जिस रूप में ढालो, वही रंग-रूप अपना लेता है।
हिंदी में "मॉनसून" के लिए शायद कोई शब्द नहीं है। संस्कृत में एक शब्द है - पर्जन्यावात। पर्जन्य "पृ" या "पृच्" अर्थात् परिपूरित करना और "जन" अर्थात् जन्म देना से बना है। पर्जन्य यानि मानसून मेघ धरा को जल से परिपूरित कर नवजीवन का सृजन करता है।
भारतीय पंचांग कैलेंडर के अनुसार दो माह - श्रावण और भाद्रपद ही औसत रूप से वर्षा ऋतु का काल है। श्रावण का नाम श्रवणा नक्षत्र पर और भाद्रपद का भाद्रपदा नक्षत्र पर आधारित है। श्रावण में प्रकृति का श्रवण स्पष्ट होता है। मेघ गरजते हैं, नदिया नादस्वर सुनाती हैं। मेढ़क, दादुर, झींगुर - सबके सब अपने-अपने स्वर में विधाता का यशोगान करते प्रतीत होते हैं। ऐसा लगता है मानो मण्डूक ऋषि अपने गह्वर स्वर में श्रुतिपाठ कर रहे हों। श्रवणा नक्षत्र के तीन तारों से नभ में शिव के त्रिशूल या डमरू की आकृति बनती प्रतीत होती है, इसलिए श्रावण शिव का प्रिय माह है। श्रावण में झारखंड स्थित द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक वैद्यनाथधाम में विश्व प्रसिद्ध श्रावणी मेला लगता है।
सौर पंचांग के अनुसार कर्क संक्रांति का आना ही दक्षिणायन और श्रावण की शुरुआत है। कर्क अर्थात् केकड़ा का जल से स्पष्ट सम्बन्ध है। कर्क राशि के अंतर्गत तीन नक्षत्र - पुनर्वसु, पुष्य और अश्लेषा आते हैं। पुनर्वसु वसुधा पर हरियाली लाता है। पुष्य का सम्बंध पुष्पित होने यानि समृद्धि से है और अश्लेषा का अर्थ है - पूर्णरूपेण श्लिष्ट यानि चिपचिपा होना।
वर्षा ऋतु के दो महीनों श्रावण और भाद्रपद का वैदिक नाम क्रमशः नभ और नभस्य है। नभ् का अर्थ है - विस्तृत होना और फूट पड़ना। स्पष्टतः नभ मेघों से जुड़ा है। कुछ भाषा विज्ञानी इसे नह् यानि बंधन से जोड़ते हैं। नभ और नभस्य धरती और आकाश को परिणय-सूत्र में बाँधता है।
अंग्रेजी महीने जुलाई का सम्बंध किसी रोमन देवता से न होकर रोमन सम्राट जूलियस सीज़र से है, जिसका जन्म इसी महीने में हुआ था।
जब मॉनसून का विस्तार पूर्णरूपेण हो जाता है, तो पानी जोरों से बरसता है। हिन्दी में इसके लिए दो शब्द हैं - छप्पर फाड़ बारिश और मूसलाधार वर्षा। संस्कृत में "मूस" धातु का अर्थ है - तोड़ना। मूसलाधार वर्षा मूसल की तरह आधार (भूमि) को तोड़कर अंदर प्रविष्ट कर जाती है। संस्कृत में बूँदाबाँदी के लिए "शीकरासार" और अतिवृष्टि के लिए "धारासार" शब्द आता है।
सामवेदीय छान्दोग्यपनिषद 15.1 में एक सुंदर सामन् है : "अभ्राणि सम्प्लवन्ते स हिंकारः; मेघो जायते स प्रस्ताव; वर्षति स उद्गीथः; विद्योतते स्तनयति स प्रतिहारः; उद्गृहणाति तान्निधनम्। एतद्वैरूपम् पर्जन्ये प्रोतम्।"
आकाश में उठते जलवाष्प आलाप हैं, मेघों का जन्म गायन की प्रस्तुति है, रिमझिम बरसना गीत का स्वर है, बिजली की चमक और मेघों की गरज संगीत है और बारिश का थम जाना संगीतमय प्रस्तुति का अंत है। इसी तरह विविध रूप वाला मॉनसून गुंथित है एक सुरताल में।

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