ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
मूल्यबोध और जीवन
01-Jul-2018 04:40 AM 1995     

क्या इस तरह भी विचार कर सकते हैं कि पुरानी पीढ़ी अब लगभग समाप्त हो रही है और कोई बिलकुल नयी तरह की संतति पूरी दुनिया में जन्म ले रही है जिसका मूल्यबोध पहले की पीढ़ी से कुछ अलग है। कभी-कभी ऐसा लगता होगा कि अब पुराने दादा-नानी नहीं रहे, वे पुराने शिक्षक भी नहीं रहे जो कभी होते थे। यहाँ तक कि वे पुलिसवाले भी नहीं रहे जो किसी भटके हुए बच्चे को सहज ही रास्ता पार करवा देते थे। कहने का मतलब यह है कि बहुत कुछ नहीं रह पा रहा है और बहुत कुछ ऐसा जीवन में आता जा रहा है जिसका मूल्यबोध अलग है। अगर थोड़ा-सा सरलीकरण करके कहने की कोशिश करें तो पुरानी पीढ़ी का मूल्यबोध शायद यह था कि सबकी जिंदगी में कुछ मानी पैदा हों, लेकिन अब लगता है कि इस बाजारू दुनिया में मूल्यबोध का अर्थ - प्राईस - यानि कि मनी पैदा करना हो गया है।
ये क्या हुआ, कैसे हुआ इस पर सोचना जरूरी है। पहले की दुनिया एक चौपाल की तरह थी। जिस पर वृक्ष छाया करते थे और छोटे-छोटे समाज उनकी छाया में बैठकर अपनी ग्रामसभा बुलाया करते थे और उनके भीतर यह भाव होता था कि नदी उनकी माँ है। पर्वत उनका पिता है। आकाश उन पर एक छाते की तरह छाया किये हुए है। हवा उनके प्राण बचाये रखने के लिये बिना किसी आज्ञा के चलती ही रहती है। नदियां बिना किसी सरकारी प्रस्ताव के या बिना किसी अफसर के आदेश के बहती ही रहती हैं। मतलब यह कि यह जो पंच तत्व हैं - धरती, आकाश, अग्नि, वायु, जल ये यह नहीं देखते कि पृथ्वी पर किसकी सरकार है, ये अपने स्वभाव से लोकहित के लिये प्राणीमात्र के जीवन की रक्षा के लिये, बिना किसी स्वार्थ भावना के अपना काम करते रहते हैं। एक उदाहरण के रूप में यह कहा जा सकता है कि किसी भी देश में सूरज किसी सरकार के कहने से नहीं उगता, बल्कि वह उग-उग कर सरकारों को यह संकेत करता रहता है कि जिस तरह मैं डूबता हूँ उस तरह सरकारें भी डूबती हैं। सत्ता के शिखर पुरुषों को यह समझना चाहिये कि सूरज की ही तरह हर एक की सत्ता सबेरे उगती है और शाम को डूब जाती है।
जो पुरानी पीढ़ी धीरे-धीरे विलुप्त होती जा रही है उन्होंने जीवन के लिये एक मूल्य वृक्षों को देखकर खोजा था। आज भी वृक्षों को गौर से देखा जाये तो पता चलेगा कि वृक्ष अतिक्रमण नहीं करते। धरती पर जहाँ उनका बीज पड़ जाता है, वे बिलकुल उस बीज की नोंक की सीध में ऊँचा उठना शुरू करते हैं और उनका गुण सूर्य और आकाश की तरफ उठने का है और वे जहाँ से उठते हैं उस पृथ्वी पर छाया फैलाना नहीं भूलते। वे अपनी शाखाएँ पृथ्वी पर ही फैलाते हैं। कई साल खड़े रहते हैं। फूल देते हैं, फल देते हैं, बूढ़े हो जाते हैं, लेकिन गिरते पृथ्वी पर ही हैं। उन्हें आकाश में उड़ने की कला नहीं आती। क्योंकि जहाँ उनका जन्म होता है वे अपनी मृत्यु से भी पृथ्वी का ऋण चुकाते हैं। वृक्षों के पास ऋण चुकाने की एक ही कला है कि जिस पृथ्वी ने उन्हें आकाश में ऊँचा उठाया, वे उसी की माटी में मिल जायें। पुरानी पीढ़ी के लोग वृक्षों से यह सीखकर एक मूल्यबोध विकसित कर सके कि आकाश तो अनंत है, अनंत में ऊँचाई का कोई अर्थ नहीं, लेकिन पृथ्वी के जिस गर्भ से जन्म लिया जाता है उसमें विलीन हो जाने का गहरा अर्थ है।
दुनिया के तमाम लोगों ने कभी न कभी शवयात्रा तो देखी ही होगी। एक मरे हुए आदमी को या तो जला दिया जाता है या ताबूत में रखकर ज़मीन में गाड़ दिया जाता है या उसके शरीर को अंधे कुएं में लटका दिया जाता है। हो सकता है वह आदमी अपने जीवन में पृथ्वी को भूलकर आकाश में ही उड़ता रहा हो, लेकिन कोई भी उसको आकाश में फेंक नहीं पाता। क्योंकि समाधि आकाश में बन नहीं सकती। आकाश हमारे शब्दों को तो पी सकता है लेकिन हमारे शरीर का बोझ नहीं उठा सकता। शरीर का बोझ उठाने की सारी जिम्मेदारी धरती पर है। तो पुरानी पीढ़ी ने यह जाना कि जीवन का मूल्य इस बात में है कि हमारे जीवन का सारा भार उठाने वाली धरती को क्या हम निर्भार बनाये रख सकते हैं।
नई पीढ़ी को देखकर लगता है कि उसे जानकारी तो बहुत है कि पृथ्वी में पानी कम हो रहा है, आकाश में छेद हो रहा है, ग्लेशियर पिघल रहे हैं, नदियों को स्रोत सूख रहे हैं, तालाब मैदान बन गये हैं। पर वह कुछ खास करती हुई दिखाई नहीं देती। वह उड़ने वाली पीढ़ी है और यह मान बैठी है कि धरती की रक्षा "एनजीओज" कर लेंगे। वह इसको भूल बैठी है - जिसे पुरानी पीढ़ी के लोग जानते थे कि दुनिया के सबसे पुराने एनजीओ केचुए हैं जो पूरे समय धरती को भुरभुरी बनाते हैं और धरती धन-धान्य उपजाने के काबिल होती है। लेकिन धरती की कोख में जहरीले कीटनाशक और रसायन डालने वाली नई पीढ़ी धरती के प्राचीन एनजीओ केंचुओं को मार चुकी है और आदमी की नियति यह है कि वह केंचुआ नहीं है। कभी-कभी कहने का मन होता है कि आदमी से बड़ी भूमिका पृथ्वी की सेवा करने में लाखों वर्षों से केंचुआ निभाता रहा है।
क्या हमें आदमी की हालत पर विचार नहीं करना चाहिये कि उसके दावे संसार में लोकहित में बहुत बड़े-बड़े हैं, लेकिन उसका कर्म केंचुए से भी कितना कम है। केंचुए ने भगवद्गीता नहीं पढ़ी। लेकिन उसे अपने कर्म के बारे में पता है। आदमी ने पढ़ी है और वह अपने उसे वास्तविक कर्म को भूल गया है, जो मूल्यबोध के साथ जुड़ा हुआ है। मूल्यबोध का अर्थ ही है मूल्यवान जीवन। लेकिन अब मूल्यबोध का एक नया अर्थ पैदा हुआ है- बिकाऊ जीवन। जिसमें मनुष्य एक "रिसोर्स" है।
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अभी-अभी समाजवादी चिंतक और पत्रकार राजकिशोर नहीं रहे। मॉरीशस में हिंदी के प्रतिष्ठ लेखक अभिमन्यु अनत का भी निधन हो गया। भारत के विश्व प्रसिद्ध चित्रकार रामकुमार भी हमारे बीच नहीं रहे। इन जैसे और भी कई लोग जिनके जीवन परिचय से हम अपरिचित हैं वे दुनिया में कहीं न कहीं कुछ काम करते रहे होंगे, एक जीवन पूरा करके वे हमारे बीच से जा रहे हैं। हम ऐसे सब लोगों को विनम्र होकर याद करते हैं। दुनिया वैसे भी भूले-बिसरे चित्रों जैसी ही है जो बीत जाती है वो बात भी भुला दी जाती है। लेकिन हर बीती हुई बात भुलाई नहीं जा सकती है। आखिर क्या कारण है कि बीती हुई बातें याद दिलाकर बाजार पैसा कमा रहा है। नानी की रसोई, दादी की दाल की हींग का स्वाद। दुनिया में मसाले बेचने वाले लोग बहुत कुछ याद दिला रहे हैं, यहां तक कि हाजमे की गोलियां भी दादी-नानी के नाम पर बेची जा रही हैं। इसका अर्थ यही हुआ कि लोग पुरानी पीढ़ी की बातों को याद करके बाजार जा रहे हैं जिसने हमारे जीवन के स्वाद में कभी कोई अर्थ पैदा किया था। "मनी" कमाने में कितना भी छल हो लेकिन पुरानी पीढ़ी के द्वारा गढ़े गये मानी के बिना आज भी बाजार में हल्दी नहीं बेची जा सकती है। पुरानी पीढ़ी के द्वारा गढ़े गये रंगों की पोशाकों के नमूने के बिना आज भी बाजार में कपड़े नहीं बेचे जा सकते। सवाल है कि यह किस तरह का मूल्यबोध है कि लोग पुरानी पीढ़ी से दूर होते जा रहे हैं और पुरानी पीढ़ी के विश्वासों और मूल्यबोध के बिना अपनी दुकान तक नहीं चला पा रहे हैं।
अंत में एक बात स्वर्गीय राजकिशोर जी के प्रति। वे भारत में डॉ. राममनोहर लोहिया के समय से होती समाज-वादी पत्रकारिता के संवाहक रहे हैं। यह बात इसलिये कही जा रही है कि भारत में एक वामपंथी पत्रकारिता भी विकसित होती रही, जिसने भारत के कुछ प्रांतों में अपना प्रभाव जमाया और इस समय तो बिना किसी संकोच के कहा जा सकता है कि यहां एक सांप्रदायिक पत्रकारिता विकसित हुई जिसका समाजवादी और समतावादी होने से कोई संबंध नहीं, जो सिर्फ सत्तावादी है और बाकी सब लोगों से उनके सत्व को छीनकर एकाधिकार पाना चाहती है। स्वर्गीय राजकिशोर भारत देश की और दुनिया की भी इस परेशानी को जीवनभर समझते रहे और उन्होंने इसका प्रतिवाद किया, उनका जीवन लेखन से ही चला और वो लिखते-लिखते हमारे बीच से चले गये। उन्हें विनम्र श्रृद्धांजलि।

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