ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
वाल्मीकि रामायण : आधुनिक विमर्श-26 दूत हनुमान : भाग-5
01-Apr-2019 09:38 PM 839     

इस संसार में सफलता का मूल मंत्र परिश्रम है, पर "मंजिल" तक पहुँचना इतना सीधा कार्य नहीं है। ऐसा जरूरी नहीं है कि हमेशा मेहनत का पूर्णतयः फल प्राप्त हो, अनेक उद्यमियों को कभी कभी बड़ी विषम परिस्थितियों का सामान करना पड़ता है और दूसरी ओर कुछ लोगों को आसानी से वगैर ज्यादा मेहनत किये ख्याति प्राप्त हो जाती है। साधारण बोलचाल की भाषा में इसे "भाग्य" कहा जाता है। यह किसी को नहीं मालूम कि "भाग्य" कब साथ देगा, लेकिन इस बात के साक्ष्य हैं कि इच्छाशक्ति और दृढ़ निर्णय अच्छे "भाग्य" को आमंत्रित करता है।
हनुमान का सबसे पहला उद्देश्य अपने आपको उस फंदे से छुड़ाना था, जिसमें वह स्वयं ही जाकर फँसे थे। उसको रावण के दरबार में जानवरों की तरह बाँधकर रखा गया और मृत्युदंड का अपराधी घोषित किया गया था। वह अपने आपको रस्सियों से छुड़ाने का प्रयत्न कर सकता था, लेकिन हो सकता है कि उसे बड़ी मजबूती से बाँधा गया हो। हनुमान जैसे बहादुर के लिये भी वह भय और चिंता का क्षण रहा होगा। वाल्मीकि ने हनुमान की मनोदशा का वर्णन नहीं किया है, पर बाहर निकलने के रास्ते के बारे में बताया है।
हमने अनुभव किया है कि जब हम परेशानी में होते हैं तो अजनबी लोग भी हम पर तरस करते हैं। हमारे घर में जब आग लगी हो तो उसे बुझाने के लिए अग्निशामक दस्ता आता है। हनुमान ने भी पहली बार राम को देखकर उनके प्रति सहानुभूति व्यक्त की थी। हमें यह पूरी तरह ज्ञात नहीं है कि राम और हनुमान के बीच घनिष्ठ सम्बन्ध कैसे बने और इसकी भी जानकारी नहीं है कि कभी-कभी अचानक से किसी से हुई मुलाकात कितनी खुशकिस्मती लेकर आती है। हम किस्मत पर निर्भर नहीं रह सकते लेकिन यह कह सकते हैं कि भाग्य भी तभी साथ देता है जब हम पूरी तरह से मेहनत कर उसके स्वागत के लिए तैयार रहते हैं। हमें शुभकामनायें पाने की हर तरह से कोशिश करनी चाहिए।
हनुमान के ऊपर एक अज्ञात व्यक्ति की शुभकामनायें थी और वह अज्ञात व्यक्ति रावण का सौतेला भाई विभीषण था। विभीषण एक विद्वान था। विभीषण, रावण के दरबार में एक मंत्री था। रावण अहंकारी और क्रूर था, पर वह विभीषण की निर्णय क्षमता और वृहद सोच के कारण उसका सम्मान करता था। रावण विभीषण की सलाह केवल दरबार में ही सुनता था, व्यक्तिगत स्तर पर नहीं। वह रावण को यह समझाने में सफल नहीं हुआ कि एक शादीशुदा स्त्री का अपहरण करना अनुचित है, पर उसने हनुमान के प्रकरण में हस्तक्षेप किया। विभीषण ने तुरंत रावण को निर्णय के बीच में टोका और कहा "ऐसा सर्वमान्य है कि दूत को मारना अनुचित है।"
उसने आगे बोलते हुए कहा कि "मृत्युदंड के अलावा और भी कई दंड हैं जो दूत को दिए जा सकते हैं, जैसे अंग-भंग करना, शारीरिक प्रताड़ना देना, मुंडन करना या शरीर पर निशाना बनाना!" इसके बाद अपने भाई को शाँत करने के लिए विभीषण ने उसकी प्रशंसा में कहा कि "आपके जैसा विद्वान और योद्धा क्रोध में आकर ऐसा कैसे कर सकता है? आपसे ज्यादा नैतिकता और न्याय को कौन समझ सकता है! आप देव और दानवों में सबसे उत्तम है!"
वाल्मीकि ने इस बात का जिक्र नहीं किया है कि विभीषण को ऐसा कब महसूस हुआ कि रावण का आचरण ठीक नहीं है, लेकिन उसके पास और कोई दूसरा रास्ता भी तो नहीं था। उसे इस बात का ज्ञान था कि बुरे काम का बुरा नतीजा होता है, इसलिए दिन-व-दिन उसकी चिंता बढ़ती जा रही थी। हो सकता है कि हनुमान प्रकरण ऐसी पहली घटना हो जिसमें विभीषण ने रावण के आदेश के खिलाफ अपना तर्कसंगत तथ्य रखा। उसे यह भी मालूम था कि रावण के गुस्से को शाँत करना बहुत आवश्यक है क्योंकि उसके गुस्से के कारण राज्य को पहले भी कई बार बड़ा नुकसान हुआ है।
विभीषण ने एक तर्कसंगत तथ्य सामने रखा कि "एक वानर को मारने में मुझे कोई अच्छाई नजर नहीं आती, हम उसे सजा दे सकते हैं। जिसने इस वानर को यहाँ भेजा है, केवल यह वानर ही उन दोनों राजकुमारों को तुम्हारे खिलाफ युद्ध के लिए उकसा सकता है। फिर हम अपने कुशल सैनिकों को भेजकर उन दोनों को पकड़वाकर आपके सामने पेश कर सकते है!" अनजाने में ही विभीषण ने हनुमान के बचाव का रास्ता बना दिया।
पीड़ित व्यक्ति को राहत तभी मिल सकती है जब आक्रमणकारी आक्रमण करते समय विचलित हो जाये। विभीषण ने रावण को हनुमान के प्रकरण में विचलित कर दिया। रावण ने अपने निर्णय को बदलते हुए कहा - "पूँछ वानर की शान होती है, इसलिए उसकी पूँछ में आग लगा दो और उसे यहाँ से जली हुई पूँछ के साथ जाने दो। उसके मित्र और शुभचिंतक उसे अंग-भंग के रूप में देखकर दुखी होंगे। पूँछ में आग लगाकर इसे नगर में चारों ओर घुमाओ।"
रावण के सेवादार तुरंत हनुमान की पूँछ पर कपड़ा! बाँधने लगे और उस पर तेल डालने लगे। कुछ उत्साही सेवादारों ने पूँछ में आग लगा दी। यह घटना राहगीरों के लिए एक तमाशा-सा बन गयी। हनुमान ने सोचा कि "अब आगे क्या होगा? क्या मैं बच पाऊँगा! सेवादारों को मारना ठीक नहीं है, वह लोग तो अपने मालिक के आदेश का पालन कर रहे है। दूसरी तरफ नगर भ्रमण का यह एक अच्छा मौका है, जो शायद मैं अकेला नहीं कर सका!"
वाल्मीकि के विवरण के अनुसार हनुमान जिन शक्तियों से संपन्न थे, शायद दुनियाँ में सभी दूतों के पास ऐसी शक्तियों नहीं होती। हनुमान ने इस विशेष कार्य के दौरान विषम परिस्थितियों में भी अपने अटूट आत्मविश्वास का परिचय दिया। आत्मविश्वास भावनाओं को नियंत्रित करता है और हमको किसी भी विषम परिस्थिति का पूरी ताकत से सामना करने का साहस देता है। हनुमान ने इस अवधारणा को सत्यापित कर दिखाया। रस्सियों में बँधे और जलती हुई पूँछ के साथ भी वे लंका नगर की गली, कूचों, घरों, महलों और चौराहों पर राक्षसों के साथ शाँति से घूमते रहे।
हनुमान बहुत परेशानी में थे और शायद उन्होंने सहायता के लिए पुकारा भी होगा। कहानी का यह हिस्सा मानव परंपरा की इस अवधारणा को दर्शाता है, जिसके अनुसार विपत्ति के समय हमारे शुभचिंतकों तक सहायता की गुहार का सन्देश किसी अज्ञात माध्यम से पहुँच जाता है। सीता को हनुमान की परेशानी के बारे में अपने पहरेदारों से पता चला। उसने हनुमान के प्रति बहुत सहानुभूति दिखाई और उसकी कुशलता के लिए बहुत प्रार्थना की।
सीता ने हनुमान की सहायता के लिए "अग्नि देव" से प्रार्थना कर कहा : "हे अग्निदेव, अगर आप मुझे पवित्र मानते हैं तो कृपया हनुमान की जलन को ठंडा कर दीजिए! यदि मेरे जीने की कोई उम्मीद हो तो वह हनुमान ही है, इसलिये उसकी जलन को शाँत कर दीजिये।" मानव मनोवृति का एक और पहलू यह भी है कि बहुत सकारात्मकता और दृढ़ निश्चय शरीर को शाँत करता है और तनाव भी कम करता है। कभी कभी हम इसे संकल्प-शक्ति भी कहते हैं, पर हमें इस अवधारणा के स्रोत के बारे में जानकारी नहीं है। हनुमान ने महसूस किया कि अग्नि की तीव्रता कम हो गई। यह संभव है कि अग्नि ने पूरा तेल जला दिया हो और अब वह बँधे हुए कपड़ों को जला रही हो। जो भी कारण रहा हो, पर वह हनुमान के लिए एक चमत्कार था। "कैसे इतनी तीब्रता से जलती हुई आग मुझे नहीं जला रही है?" उसने सोचा कि "क्या इसका कुछ मतलब है?"
हनुमान को विश्वास हुआ कि वह खतरे से बाहर है। जब हम खतरे से बाहर निकल आते हैं तो ईश्वर का धन्यवाद करते हैं। हनुमान ने राम और सीता को उनकी कृपा के लिए धन्यवाद किया और अपने आपको सँभाला। वह वर्तमान घटनाक्रम और अगले कदम बारे में सोचने लगा : "मुझे इस अपमान का बदला लेना चाहिए!" वह गुस्से में फुसफुसाया। ताकत के प्रयोग से उसने अपने आपको बंधन से मुक्त कर लिया। हवा में उछलने लगा और अपने पुराने ठिकाने पर बैठकर दृश्य को देखने लगा। उग्र हनुमान के हाथ लोहे की एक गदा आ गयी और उससे पहरेदारों पर धावा बोल दिया। इस बार जलती हुई पूँछ भी एक हथियार का कार्य कर रही थी।
आग में फैलने की एक असाधारण शक्ति है, जो भी सूखी वस्तु उसके संपर्क में आती है, वह उसे जला देती है। अगर किसी के पास मशाल हो और वह नगर में आग फैलाने का कार्य कर रहा हो तो, आक्रमण का यह तरीका अत्यंत खतरनाक साबित हो सकता है। शायद बंदूकों और तोपों से पहले युद्ध का यह भी एक तरीका रहा होगा। हनुमान ने एक घर से दूसरे घर पर कूदकर चारों तरफ घरों को आग के हवाले कर दिया! हवा ने आग को फैलाने में मदद की। पूरा नगर तेजी से जलने लगा। कुछ लोग घरों के अंदर ही जल गये और कुछ लोग घरों की खिड़िकयों से कूद लगे। भवन राख ढेर में बदल गये। धातुयें और रत्न पिघल गये। चारों तरफ लोग कानाफूसी करने लगे कि - "लगता है जैसे अग्नि देव एक वानर के रूप में आ गये हो!" चारों तरफ रोने और चीखने चिल्लाने की आवाजें सुनाई दे रही थी।
पूरे लंका नगर को आग के हवाले कर हनुमान ने राम का स्मरण किया। इसके बाद वह अपनी जलती हुई पूँछ को बुझाने के लिए सागर की ओर गये। वहाँ जाकर उसे अहसास हुआ कि "मैंने यह क्या कर दिया? क्या मैंने इस उत्पात में सीता को भी ख़त्म कर दिया!" वह अति चिंतित हुए और तुरंत ही सीता की स्थिति जानने के लिए पहुँच गये। उसको तब सांत्वना मिली, जब उसने सीता को शिंशपा पेड़ के नीचे बैठे देखा। वह पहले की तरह ही चिंतित थी। सीता हनुमान को पुनः देखकर अति प्रसन्न हुई और आग्रह किया कि "क्या तुम एक रात और रुक सकते हो? कृपया थोड़ा आराम कर लो और कल चले जाना!" हनुमान ने सीता को जाने से पहले आखिरी बार आश्वस्त किया और कहा - "वानरों और भालुओं के राजा सुग्रीव हजारों वानरों और भालुओं के साथ जल्द ही यहाँ आयेंगे! उनके साथ दोनों भाई, राम और लक्ष्मण भी आयेंगे। वो रावण और उसकी सेना का अंत करेगें! वह आप को लेकर यहाँ से वापस जायेंगे! देवी जी आप बेफिक्र रहिये, जल्द ही सब कुछ ठीक हो जायेगा!"
हनुमान वापस जाने को तैयार हुये, उनकी यात्रा कठिन और लम्बी थी। वह द्वीप के सबसे ऊँचे पर्वत पर पहुँचे। वहाँ से उसने उत्तर दिशा में समुद्र की ओर उड़ान भरी। दूत हनुमान सीता की खोज के लक्ष्य को सफलतापूर्ण हासिल कर राम, लक्ष्मण और सुग्रीव के पास वापस लौटे!

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