ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
वाल्मीकि रामायण : आधुनिक विमर्श-23 दूत हनुमान : भाग-2
CATEGORY : व्याख्या 01-Sep-2018 08:17 PM 180
वाल्मीकि रामायण : आधुनिक विमर्श-23 दूत हनुमान : भाग-2

संयोग से कहानी बनती है। वाल्मीकि एक कुशल कहानीकार हैं। समस्या जटिल हो सकती है, लेकिन कुछ तो रास्ता निकलना ही चाहिये! कवियों के लिये दुनिया स्वाभाविक होती है। उलझनें आती हैं और जाती भी हैं। उलझन में अपनी बुद्धि को साहस से और मन को दृढता से तैयार रखना सफल व्यक्तियों की ताकत होती है। निराशा नाश का बीज है, आशा प्राणी की आकांक्षा है। वाल्मीकि के हनुमान आकांक्षावान हैं, आशापूर्ण हैं। कार्य की सफलता में उनका पूरा विश्वास है।
अपने लक्ष्य पर दृढता और काम पर सच्चाई की उपलब्धि से हनुमानजी को भारत के पौराणिक चरित्रों में उच्च स्थान प्राप्त हुआ है। वह पूर्णांग मनुष्य नहीं थे, लेकिन शास्त्रविद् थे और भाषाविद् भी। मन-मुताबिक अपने को विभिन्न आकृतियों में बदल सकते थे, ताकि परिस्थिति के अनुरूप उसका उपयोग कर सके। शिंशपा वृक्ष के ऊपर बैठकर हनुमान ने चारों तरफ नजर फैलाई। शाम का समय था। चीजें धुँधली नजर आ रही थीं। दूर इमारतें, बगीचे और चैत्यवेदियाँ उनको नजर आईं। फिर एक कोने में उन्होंने एक दुबली-पतली औरत देखी। वह भूखी लग रही थी और काँप रही थी। थर्राहट से रो रही थी। कई विकलांग और रुक्ष स्त्रियों ने उसको घेर रखा था और वहाँ का दृश्य दारुण था।
क्या यह औरत सीता हो सकती है? हनुमान ने गौर से देखा। "हाँ, दिखने में तो सुशील लगती है और आचरण भी। फिर इतनी घबराहट! इतनी दीनता!" हनुमान का कवि भाव जागृत हुआ - "एक अच्छी पंक्ति की वाचकता खराब हो गई है!" कवि भाव से खोज खत्म नहीं होती! "क्या यह सीता है? क्या इसी वज़ह से राम ने जनस्थान में सारे राक्षसों को मार डाला? क्या यह वही सीता है जिसकी वज़ह से बाली को अपना जीवन खोना पड़ा? ऐसी औरत फिर इतनी दुर्भाग्यपूर्ण क्यों हैं? इतनी घबराई क्यों हैं? वह किसको खोज रही है?" हनुमान ने मन में विश्वास किया कि वह जरूर सीता हो सकती हैं! अपने कार्य की सफलता के लिये उन्होंने मन ही मन श्रीराम को स्मरण किया।
"अगर वह सीता है, तो वह अत्यन्त नि:सहाय है। राक्षसियों के घेर में वह अकेली है। मैं अभी क्या करूँ? यह तो ठीक है कि मैं उसके पास में हूँ, लेकिन मुझे करना क्या है?" हनुमान ने सोचा कि और थोड़ा पास जाकर अच्छी तरह से देखना ठीक होगा। इसी समय पर उस आधी रात में दूर एक भवन से वेद उच्चारण की ध्वनि सुनाई दी। मन्दिरों में घण्टे बजने लगे। "यह क्या हुआ? सामने से फौजी औरतों की एक टुकड़ी आ रही है। अरे! यह सामने वाला तो वही तगड़ा आदमी है, जो कल रात बड़े भवन में सोता हुआ दिखा था। क्या यह रावण है?" हनुमान ने सीता की ओर नज़र घुमाई। सीता डर के मारे काँप रही थी। उसके मन में भय था - "निष्ठुर आदमी फिर आ रहा है।" हनुमान देखता रहा। "अभी तो सीता की पहचान पूरी नहीं हुई। फिर क्या किया जाय? सफलता के लिये धैर्य की जरूरत है!"
"अन्याय को रोकना मनुष्य का कर्तव्य है, तो अन्याय को पहचानना भी उतना ही आवश्यक है। हम अन्याय की खोज में घर से नहीं निकलते, हम अपने संधान में निकलते हैं। अगर संधान में अन्याय दिखता है, तो प्रतिकार जरूर करना होगा। लेकिन रास्ते पर रुक कर संधान का व्यतिक्रम करना अनुचित है।" हनुमान सोचने लगा। "पहले औरत की पहचान जानना चाहिये। तब तक कोई प्रतिकार नहीं हो सकता! "सीता की खोज" ही लक्ष्य है और कुछ नहीं है। लक्ष्यच्युत नहीं होना चाहिये। दूत अपने स्वामी का दास है, दूत का कर्तव्य स्वामी की आज्ञा का पालन करना है।" हनुमान ने अपने मन में राम और लक्ष्मण से प्रार्थना की ताकि वह लक्ष्यच्युत न बन जाय। "मुझे रामजी का काम करना है, जय श्रीराम!"
सीता ने रावण की उपेक्षा की और उसकी धृष्टता का परिहास किया। गरम होकर रावण ने धमकाया और चिल्लाया। फिर उसने धमकी दी कि अगर सीता ने दो माह में अपना मन नहीं बदला, तो उसके सूपकार सीता को काटकर उसके लिये भोज बना देंगे।" यह कैसी बात है? हनुमान घबराकर ताकता रहा। इस समय वह दीन औरत "हे राम! हे लक्ष्मण! हे कौशल्या! हे सुमित्रा!" विलाप करने लगी। उसकी आवाज़ आसन्न मृत्यु की थी। "अभी क्या करूँ? श्रीरामजी को खबर कर दूँ कि सीता की खोज सफल हुई है? लेकिन उनके आने तक यह औरत शायद जीवित नहीं बच पायेगी। अगर सीता समाप्त हो गई तो यह सारा प्रयास विफल हो जायेगा। पशोपेश में पड़े हनुमान के मन में यही प्रश्न घूम रहा था कि अब आगे का रास्ता क्या है?
जब हम अकेले होते हैं, अपने सवालों के जवाब खुद को ही निकालने होते हैं। हनुमान सोचता रहा - "रामजी को सीता के बारे में बता देना ठीक है, परन्तु सीताजी को अकेले छोड़कर चले जाना ठीक नहीं है। उनको हौसला चाहिये, उनको सांत्वना चाहिये। फिर उनसे कैसे उनका हौसला बढ़ाया जाये? मुझे उनके नजदीक जाना चाहिये, उनसे बातें करनी चाहिये।" हनुमान फिर घबरा गया "अगर ये राक्षसियाँ देखती रहीं, तो सत्यानाश हो जायेगा। वे सीताजी को मार डालेंगी।" वाल्मीकि कौतुक से लिखते हैं - "कोई दूत कितना भी धुरन्धर क्यों न हो, अगर वह ठीक से जगह और काल के अनुसार निर्णय न कर पाया, तो सभी कार्य खराब हो जाता है।"
हनुमान ने गंभीरता से सोचा - "कैसे मैं सीताजी के पास जाऊँ? बन्दर को देखते ही वह बेहोश हो जायेगी। हो सकता है कि मैं मनुष्य स्वर में रामजी के बारे में सीताजी के पास स्तुति करता रहूँ। शायद उनको विश्वास आ जाय। मुझे परिष्कार ध्वनि से बोलना होगा। जय श्रीराम।" हनुमान सोचता रहा - "कौन-सी भाषा में बोला जाय? संस्कृत में बोलने से वह सोच सकती है कि यह रावण का गुप्तचर है। लेकिन किसी देवी को संस्कृत के सिवाय और किसी भाषा में बोला नहीं जाता! मुझे कोशिश करनी चाहिये - जय श्रीराम!"
सभी दूतों को संगीत ज्ञान नहीं होता है, लेकिन हनुमान कुछ अलग हैं। मधुर स्वर से वह रामजी के जीवन चरित का गान करने लगे। "एक राजा दसरथ थे, वह धुरन्धर और धर्मवीर थे। इक्ष्वाकु वंश के वह अधिकारी थे, धनवान और यशवान थे। उनके ज्येष्ठ पुत्र का नाम था श्रीराम जो धनुर्विद्या में निपुण थे। संसार का रक्षण उनका धर्म था। अपने पिता की सत्यरक्षा के लिये वह अपनी भार्या सीता और भाई लक्ष्मण के साथ वनवास जाना स्वीकार किया। वन में रहते समय उन्होंने काफी दुष्ट चरित्रों का संहार किया। राक्षसों के राजा रावण को यह खबर मिली और उसने छल से रामजी की पत्नी सीता का अपहरण कर लिया। सीता की खोज करते-करते राम जी सुग्रीव से मिले। उन्होंने बालि का वध कर सुग्रीव को वानरों का राजा बनाया। सुग्रीव ने सीता की खोज करने की सारी वानर सेना को आज्ञा दी। वानर चारों दिशा में फैल गये। गिद्ध संपाति की सलाह से मैं समुद्र लाँघकर यहाँ आया हुआ हूँ।" छोटे रूपक में हनुमान ने अपनी कहानी सुना दी। फिर बोले "मैं जिसको देख रहा हूँ, इनमें सीता जैसा रूप और गुण विद्यमान है!"
किसी भयालु का मदद करने का तरीका अलग होता है। वाणी मधुर हो, सीधी हो, बोली में सच्चाई हो। हनुमान इस परीक्षा में उत्तीर्ण हुए। सीता ने नजर उठाई और उस ओर देखने लगी जिधर आवाज आ रही थी। यह सोचकर मन उनका खुश था कि वह अपने राम की कहानी सुन रही है। "लेकिन इस देश में कौन राम को जान सकता है?" सीता ने चारों ओर नजर घुमाई और एक बन्दर को पेड़ के ऊपर बैठे हुए देखा। नज़रे गड़ाकर देखा तो पाया कि बन्दर सफेद कपड़ा पहना हुआ था। अपने परिवार से सीता को संकेत से सूचना भेजने का कुछ ज्ञान था। "यह बन्दर कहाँ से आ गया? बन्दर सामने आने से अशुभ होता है। यह न हो कि राम, लक्ष्मण और पिताजी को कुछ दुर्भाग्य हुआ हो!" फिर उसने चकित होकर सोचा - "क्या यही बन्दर बोल रहा था?"
सीता को नियति में विश्वास था। "सब घटनाओं का कुछ कारण होता है। अपनी सच्चाई और पूर्ण आन्तरिकता से विपत्तियों से छुटकारा मिल सकता है।" वाल्मीकि की सीता में मनुष्य की सारी सच्चाई देखने को मिलती है। प्रकृति से उनका अपनापन था। सीता ने मन ही मन भगवान से प्रार्थना की - "इस बन्दर की वाणी सच हो!"
हनुमान सीता को देख रहा था। उसने सोचा कि सीता में कुछ आत्मविश्वास पैदा हुआ है। अब उसे सीता के सामने आ जाना चाहिये। वह पेड़ से उतरा और हल्के से आगे बढ़ने लगा। उसके दिमाग में आया कि दोनों हाथों को सिर के ऊपर रख दें, ताकि उसकी नम्रता और विनय भाव सामने आये। नजदीक आकर हनुमान बोला - "देवी आप कौन हो? और कहाँ से आई हो? आपके कपड़े इतने मलिन क्यों हैं? आप रोती क्यों हो?" हनुमान के प्रश्नों में सच्चाई थी। फिर उसने पूछा - "आप क्या आकाशवासिनी हो? क्या आकाश से अवतरित हुई हो? लेकिन नक्षत्र तो रोते नहीं, आप जरूर मनुष्य हो। आपके रूप और प्रकृति से मुझे लगता है कि आप कोई राजपुत्री हो!"
अन्त में हनुमान ने सीधा पूछा - "आप क्या सीता हो जिसको रावण ने वनस्थान से हरण कर लिया है? आपका सुन्दर रूप, निर्मल चरित्र और आन्तरिक आकुलता से मुझे प्रतीत होता है कि आप रामजी की ही पत्नी हो!" हनुमान की उक्ति में भरोसा था।
दूत का पहला कर्तव्य है कि वह लक्ष्यस्थान पर पहुँचे। हनुमान समुद्र को पार कर लंका में पहुँचे। लक्ष्यस्थान पर दूत को चाहिये कि वह खोज कर उस व्यक्ति से मिल सके जिसकी खोज में वह वहाँ गया है। हनुमान ने दो दिन के बाद दुबली और भूखी सीता को राक्षसियों के घेरे में देखा। दूत को चाहिये कि उसका संधान ठीक निकले। हनुमान ने रात भर प्रतीक्षा की और अन्तिम प्रहर में सीता को नजदीक से देखा। दूत का कार्य है कि खोजे व्यक्ति में विश्वास पैदा करे। हनुमान ने सफेद वस्त्र पहनकर और हाथों को सिर के ऊपर रखकर सीता को विश्वास दिलाया। खोज के व्यक्ति का होशियारी से पता करना दूत का लक्ष्य है। हनुमान ने सीता का सीधे प्रश्नों से पता लगाने का उद्यम किया।
सफलता कैसे आयेगी? दूत का भाग्य क्या है? ऐसी हालत में दूत और क्या कर सकता है?

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