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वाल्मीकि रामायण : आधुनिक विमर्श-27 दूत हनुमान : भाग-6
01-Jun-2019 01:12 AM 1423     

घरको वापिस आनेका रास्ता सबको मालूम रहता है। कामयाब होने पर वापसी हल्की होती है। घर जाना, साथियोंसे मिलना, अपने घरमें भोजन करना - प्राणियोंके मनकी पुकार होती है। हनुमानके मनमें भी। वह तेजीसे घर पहुँच गये। जाते समय समुन्दर पर निगाह कर करके कूद-कूद कर चलते थे, वापस आनेके समय वह एक ही छलाँग हवाका झोंका जैसे लङ्कासे निकल पड़े, बादलोंके घेरेमें चलते रहे। कोई उनको रोक नहीं पाया। कूदना तो उड़ना बन गया!
संसारमें सभी दूतके इन्तजारमें वेवश रहते हैं। कहीं से भी आपदा आ सकती है, कुछ भी हो सकता है। जैसा कठिन कार्य, उतना कष्ट। दूतको अगर बैरी घेरेमें जाना है, तो तकलीफ ज्यादा! सारे वानर समुन्दरके किनारे महेन्द्र पर्वत पर रुके हुए थे, सीताको खोजनेका अवसर बीत चुका था, सुग्ऱीवसे प्राणदण्डके भयसे वानरोंमें विशेष व्याकुलता थी! गीध संपाति से यह बात मालूम हुआ था क सीता लङ्कामें जीवित है, तो समुद्रलंघन कोई आसान कार्य नहीं था! सिर्फ शक्तिसे काम नहीं होता! वानरों का दल बैचेन था।
वाल्मीकि हनुमानकी वैज्ञानिकता का विश्लेषण नहीं करते, केवल यह बोलते हैं कि हनुमान उत्तरकी दिशामें चल पड़े। शायद हो सकता है कि हनुमान हवाकी गतिसे समुन्दरका किनारा पता कर सकते थे। यह भी हो सकता है कि वापसी का रास्ता उन्होंने पहलेसे तय कर रखा था। जब सुग्रीवने हनुमान और दूसरे वानरोंको सीताकी खोजमें भेजा था, तो विभिन्न दिशाओंके संकेतोंकी पूरी जानकारी और हिसाब दिया था। यह हो सकता है कि सुग्रीव के साथ सारे विश्व की दिशाओं में भागने के कारण हनुमानको सभी पर्वतों और समुद्रों का पूरा परिचय था।
वाल्मीकि रामायणमें हनुमान एक वानर हैं। वह वानरराज सुग्रीव के मन्त्री हैं। मन्त्री होनेके नाते अन्य वानरोंके प्रति अपने कर्तव्यको वह समझ रहे थे, सभी कार्योंमें अपने गणोंका ध्यान रखते थे। गोष्ठी लाचार क्यों न हो जाय, नेताको हिम्मत रखना आवश्यक है! सभी कार्योंमें उत्साहका महत्व है। गोष्ठी का उत्साह कायम रखना नेताका काम होता है। कैसे किया जाय? महेन्द्रगिरिके नजदीक पहुँचकर हनुमान ने आकाशसे बड़ी आवाज की। वह एक गम्भीर आवाज थी "मैं आ गया हूँ, मैं लौटा हूँ!"
घरके सामने हम खुले दिलसे आवाज करते हैं, हमारी आवाज जोरसे खुलती है! आवाजसे हमारी पहचान होती है, और अपनी हाजिरी मालूम होती है ! जन्तुओंमें जोरदार शोर विजय सूचित करता है। वानर युवराज अंगद और दूसरे वानर महेन्द्र पर्वत में हनुमानकी प्रतीक्षा कर रहे थे। इनको बताना था कि "कार्य समाप्त हुआ!"
फिर भी जन्तुओंके शोरको समझना आसान नहीं है! आवाजसे भाव पहचानना सबका काम नहीं है। रामायण कृतिमें वाल्मीकि ने जाम्बवान नामके एक भालू का चरित्र रखा है। भालू की उम्र लम्बी होती है, और उसको दुनियाका ज्ञान रहता है। जाम्बवान वृद्ध थे, उनकी उम्र परिपक्व थी। उनको सुग्रीव अपना सलाहकार मानते थे। भालू जंगलमें चलने फिरने वाले जन्तुओंका प्रतीक था, जैसे वानर पेडोंपर रहनेवालोंका प्रतीक। वानरराज सुग्रीव जंगलके जन्तुओंके राजा कहलाते थे। जाम्बवान वानरोंके साथ घूमते थे। वानरों में उसका सम्मान था। वानरोंकी आवाज वे पहचानते थे।
"यह विफलताका शोर नहीं है, हनुमान कभी हारता नहीं! काम जरूर सफल हुआ है!" जाम्बवान ने समझ लिया और सबको बता दिया। सभी वानर पेडोंपर सवार होकर आकाशकी तरफ ताकते रहे! हनुमान के आकाशसे उतरनेपर पहाडी गह्वरमें हवाकी लहर जैसी आवाज हुई! वाल्मीकि कविभावसे लिखते हैं - "वानर नम्रतापूर्वक दोनों हाथ मिलाकर अञ्जलि बनाके बैठे रहे!"
हनुमानका विपुल शरीर पंखहीन पक्षी जैसा पर्वतके ऊपर आ पहुँचा। सभी वानर उसको घेर कर बैठ गये। गोष्ठीमें जोरदार कोलाहल उठा। वानरोंने फल-फूलकी भेंट चढ़ाई। वे सभी आश्वस्त हो उठे। हनुमान ने जाम्बवान और अंगदको नमस्कार किया और सबको बधाई देते हुए संक्षेपमें कहा- "देवी का दर्शन हो गया!"
बातोंकी चातुरी तब होती है, जब सुननेवालोंको सही संवाद शीघ्र ही पता चल जाय! उत्सुकोंकी आकांक्षा और भावना के अन्दर संवाद पहुँचाना है! श्रोता जितने उत्सुक हों, संवाद उतना संक्षिप्त होना आवश्यक है। सबको संक्षेपमें सार सुनाकर हनुमान अपनी सारी कहानी प्रस्तुत करनेको तैयार हो गये। "सीताजी लङ्कामें अशोक वाटिकामें राक्षसियोंसे घिरी हुई बैठी हैं। राक्षसी उनको हमेशा डाँटती रहती हैं। वह दुबली हो गयी है, भूखी है, दु:सह अवस्थामें वह अपना ध्यान नहीं रखती! मैला कपड़ा पहन रखा है, केश एकवेणी है। उनका सारा समय रामजीके स्मरणमें निकलता है। उनकी अवस्था दु:खद है!"
सीतादर्शनका संवाद सारे वानर समाजमें लहर जैसा फैल गया। कोई कूदने लगा, तो कोई आनन्दसे चिल्लाता रहा और दूसरों ने कोई पेडके ऊपर बैठ कर लांगूल हिलाया! युवराज अंगद ने सबकी तरफ़से हनुमानको बोला - "तुमसे हमको पुनर्जीवन प्राप्त हुआ!" सभी वानर पर्वतके ऊपर बडे-बडे शिलापर बैठ गये और वानरोंकी सभा बन गई। सभी हनुमानकी कहानी सुननेको व्यग्र हो गये। उसने कैसे समुन्दर पार किया? रावणकी लङ्का कैसी है? सीताका दर्शन कैसे हुआ? हनुमान ने यह सब कैसे कर डाला?" वानर सोचते रहे!
वृद्ध जाम्बवानने सभा आरम्भ की -"कैसे तुमने सीताको देखा? वहाँका हाल कैसा है? क्रूर रावण सीताजीके साथ कैसे बर्ताव करता है? हमको सविस्तार बताओ - ताकि हम आगेका काम तय कर पायेंगे।" फिर उसने बोला - "हमें जो जानना चाहिये वही बताओ, जिससे हमारा काम बन सकें! जो कुछ बातें रामजी और सुग्रीवके लिये होगी, उनको उनके ही सामने वताना!
किसी यात्रा का वर्णन इस तरह किया जाय जिससे सुनने वाले उस सहज ही भरोसा करें। यात्राकी कठिनाइयोंको इस तरकीब से बोलना चाहिये जिससे किसीको यात्रा करनेकी शंका न हो! हनुमानकी यात्रा तो आसानी थी नहीं, लेकिन सारे वानरोंको वहाँपर बतानेकी जरूरत थी! हनुमानने अपनी सारी कहानी सचसे बताई, ताकि यह पता चले कि यात्रामें किसी माँका आशीर्वाद समाया हुआ था! सीताजीको स्मरण करके हनुमानने कहानी शुरू की। "मैंने जो कुछ किया, माँके आशीर्वादसे ही कर पाया।" हनुमानने सीताजीको हाथ उठाकर अन्तरसे नमस्कार किया।
"आपने तो देखा - मैं यहाँसे समुन्दरकी तरफ़ चल दिया।" मैनाक पर्वत, सुरसा और सिंहिका राक्षसी, लङ्कामें पहुँचना, रात्रिमें रावणके प्रासादमें घूमना, सीताजीको दूसरे रोज अशोक वाटिकामें भेंटना, उनको रामजी के अंगुठी प्रदान करके मस्तक की चूडामणि लेकर वापिस आना - ये सब बातें उन्होंने बताई। फिर हनुमान ने सीताकी हालत देख कर अपने क्रोधका विवरण दिया। अशोक वाटिका विध्वंस, रावणके योद्धाओं से लडाई, उनकी मृत्यु, रावणके पुत्र इन्द्रजित द्वारा ब्रह्मास्त्र से बँधा होना - ये सबका वर्णन किया। अन्तमें उनके पूँछ पर आग और उसी आगसे सारा लङ्का दहन वर्णन करके उन्होंने अपनी कहानी सुना दी।
"मैं समुन्दरमें आया और पूँछसे आग बुझाई। फिर सीताजीके दर्शन करके मैं अरिष्ट पर्वतके ऊपर आया और आकाश मार्गसे यहाँ आके पहुँच गया। रामजीका स्मरण मुझे साहस दे रहा था, यह सब सफलता उन्हींका आशीर्वाद है। राजा सुग्रीव के लिये मुझे ये सब करना था। मैं थोड़ा बहुत कर पाया, आप सब बाकी काम खत्म करनेकी तैयारी करो!"
दूत हनुमान अपनी वाहिनीको तैयार कर रहे थे!

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