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वाल्मीकि रामायण : आधुनिक विमर्श-28 दूत हनुमान : भाग-7
01-Sep-2019 09:54 PM 877     

व्यक्ति या समष्टि? किसी भी कार्य में किसका गुरुत्व है? व्यक्ति तो कार्य करता है, उसको समाज की जरूरत कब होती है? इन प्रश्नों के उत्तर वाल्मीकि रामायण में हनुमानजी के प्रसङ्ग में मिलते हैं। समाज में अनेक सदस्य होते हैं, सभी का कुछ न कुछ विशेष कौशल होता है। लेकिन कोई दुरूह कार्य किसी एक विशिष्ट व्यक्ति के द्वारा ही किया जाता है। तब उस सफलता में समाज का क्या योगदान है? शायद बहुत कुछ? व्यक्तियों से समाज बनता है या फिर समाज से व्यक्ति का अस्तित्व है?
वाल्मीकि के अनुसार, जीतना या हारना समाज का होता है। व्यक्ति समाज में बसता है और उसका कार्य सामाजिक बंधन से नियन्त्रित होता है। हो सकता है कि हनुमान जी को दुर्लभ कार्य में सफलता मिली, लेकिन अपने कार्य के लिये वह समाज के आभारी हों। उनको यह समझना चाहिये कि उनके पीछे उनके समाज की सदिच्छा और प्रेरणा थी। वह समाज के प्रतिनिधि थे! कार्य की सफलता में समाज के सभी लोगों का योगदान रहता है। यह भारतवर्ष की मूल नीति है!
वानरों की बैठक ने तय किया कि वे सब मिलकर सुग्रीब को सीताजी की कहानी सुनायेंगे। किसी ने सुझाया कि सीताजी को पहले लंका से निकाल लाना चाहिये, नहीं तो काम अधूरा रहेगा! लेकिन जाम्बवान ने समझाया कि ऐसी भावना ठीक नहीं है। "दक्षिण दिशा में जाकर सीताजी का पता लगाने का हमें आदेश मिला था। रामजी का वचन था कि वे सीताजी को स्वयं ही वापिस लाएंगे। हमको तो सीताजी की खोजकर संदेशा रामजी तक पहुँचाना है।"
किसी एक व्यक्ति के कार्य से सारे समाज का मूल्याङ्कन करना भारतीय संस्कृति का एक मूल आधार है। हम यह समझ सकते हैं कि वाल्मीकि वानरों के माध्यम से इस व्यवहार का परिचय दिलाना चाहते हैं। वानर गोष्ठी में प्रत्येक वानर की अपनी-अपनी पहचान थी। हनुमानजी को पता था कि आगे के रण में सारी सेना की जरूरत होगी। किसी भी रण में जीतना किसी एक का काम नहीं, सबकी सहायता चाहिये। सबको साथ लेकर चलना हमारा कर्तव्य है!
हनुमान, अंगद, जाम्बवान समेत सभी वानर सुग्रीव से मिलने किष्किन्धा की ओर चल पड़े। रास्ते में एक फलों फूलों से भरा हुआ बगीचा दिखाई दिया। यह बगीचा "मधुवन" था जिसको सुग्रीव ने बड़े यत्न से रखा था। मधुवन सुग्रीव के पितृ पितामह की देन थी, उसमें सुग्रीव के पूर्वजों का स्नेह-प्यार समाहित था। मधुवन में चारों ओर फल ही फल थे, मधुफेणी से बगीचा महक रहा था। भूखे वानर अब इस मधुवन में कूद पड़े! उन्होंने अपने नेता अङ्गद और जाम्बवान को पूछे तो सही, लेकिन वे बेचारे भी भूखे थे!
आनन्द का महोत्सव शुरू हो गया! भूखे वानरों के झुण्ड पूरे बगीचे को उजाड़ने लगे! कोई नाचता तो कोई कूदता, कोई चिल्लाता तो कोई जोर जोर से रोता - मधु पीकर वानर माताल हो गये! जब बगीचे का रक्षक दधिमुख उनको भगाने आया, तो उसको सबने मारा पीटा - किसी ने मुक्का मारा तो, तो किसी ने लात मारी! भूखे वानरों के शिर पे मधु का नशा चढ़ गया था!
दधिमुख ने अपने सारे रक्षकों को वानरों को भगाने के लिये भेजा। हनुमान जी कमर कसकर बोले - "दोस्तों, कोई परवाह नहीं - पेट भरकर मधु खा लो - मैं सबकी देखभाल करूंगा!" कहानी कुछ अलग ही दिशा में चल पड़ी। अङ्गदजी ने भी लाचार होकर वानरों का साथ दिया। सबने मिलकर मधुवन के रक्षकों की टाँग पकड़कर दूर फेंकने लगे। खाने का महोत्सव अब मौज मस्ती के माहौल में बदल गया।
अङ्गद के मुक्के की मार से दधिमुख घायल हो गया। फिर वह सुग्रीव से शिकायत करने के लिये भागा। दौड़ते दौड़ते किष्किन्धा आकर सुग्रीव के पैरों पर गिर पड़ा। सुग्रीव ने पूछा - "बोलो तो सही, बात क्या है? इतना घबराये क्यों हो?" दधिमुख ने सारी कहानी सुना दी- "वानरों ने मधुवन को उजाड़ डाला है!"
वाल्मीकि ने सुग्रीव को अच्छे राजा के भाव से पहले से चित्रित किया है। अच्छा राजा अपनी प्रजा को समझता है, उनके दुःख-सुख में शामिल होता है - सबको न्याय देता है और अपनी सेना में विश्वास रखता है। सुग्रीव लक्ष्मणजी को समझाने लगा- "दधिमुख की बात का अर्थ यह हुआ कि हनुमान ने सीताजी की खोज कर ली है! इसके बावजूद सारी गोष्ठी मधुवन में मस्त हैं!" उसने दधिमुख से कहा- "मैं यह सुनकर खुश हूँ कि वानरों के झुण्ड ने मधुवन में मधुभक्षण किया है! वे सब काम में सफल होकर लौटे हैं। उनकी थोड़ी सी नटखट तो सह लेना चाहिये! उन सबको आप तुरन्त यहाँ भेज दीजिये - सारा विवरण सुनने के लिये मैं उत्सुक हूँ!"
दधिमुख वापिस आया और उसने सबसे माफी माँगी! "आप सब अपना कार्य सफल कर आये हो, युवराज अङ्गद आपके नेता हैं। मेरी मूर्खता के लिये मैं क्षमा चाहता हूँ! आपके चाचा राजा सुग्रीव ने आपसे उनके पास जाने का आग्रह किया है, वह सारा वृतान्त सुनने का इन्तजार कर रहे हैं।"
अङ्गद के जरिये वाल्मीकि राजा-प्रजा सम्बन्ध को और आगे बढ़ाते हैं - नेता वह होता है, जो जनता की तरफ से काम करता है, उनकी सुनता है। अङ्गद ने गोष्ठी से पूछा- "तो आगे क्या करना है? आप लोगों को अब सन्तोष है?" यह थोड़ी-सी विनय भावना गोष्ठी के लिए बहुत प्रभावशाली साबित हुई। वानर गोष्ठी से आवाज आयी - "ऐसे कोई नेता होगा, जो जनता को पूछे बिना काम करेगा? अङ्गद का सब मंगल हो - जय युवराज अङ्गद!"
हनुमान समेत अङ्गद, जाम्बवान और वानर गोष्ठी किष्किन्धा पहुँचे। खुशी के मारे सुग्रीव अपनी पूँछ को हिलाने लगा और पूँछ वृत्ताकार हो गया। हनुमान ने सबको प्रणाम किया और संक्षेप में बताया- "सीताजी का दर्शन हुआ! सीताजी दृढ व्रत लिए लङ्का में बैठी हुई हैं।" उन्होंने अपनी सारी परेशानियाँ अपने अन्दर दबा कर रखी। दूत का कर्तव्य है - संदेश देना! संदेश ही पूरी मेहनत का परिणाम होता है।
हनुमान की वार्ता सुनकर रामजी का मन आनन्द से भर गया। उनका मन फूला न समाया। लक्ष्मणजी चकित हो गये! उनको अपनी वीरता पर बहुत गर्व था। इतना बड़ा कार्य कर अब हनुमान बहुत काम के नजर आने लगे। दोनों ने उत्सुकता से हनुमान से सारी कहानी सुनाने का निवेदन किया। हनुमान ने वहाँ बैठकर अपना सारा वृतान्त सुनाया। सीताजी को विश्वास दिलाने के लिये इक्ष्वाकुओं का गुणकीत्र्तन करने की कहानी उन्होंने विस्तार से सुनाई। सब वृतांत सुनाकर अपने साथ लायी हुई सीताजी की चूडामणि उन्होंने रामजी को अर्पण की और सीताजी का संदेश भी दिया- "मैं और एक ही महीना जीवित रहूँगी। यहाँ जीना बहुत मुश्किल है। एक महीने के आगे मैं नहीं रह पाऊँगी!"
सीताजी की वेदना भरी वार्ता कान में ले कर रामजी विह्वल हो गये। अब हनुमान को कुछ कुशलता की बात भी बताना थी। उसने सीताजी से सुनी हुई रामजी की वीरता की कहानी सुनाई। फिर बोले कि सीताजी कह रही थी कि "अगर एक कौवे को मारने के लिये उनके अस्त्र ने सारे संसार को घेर लिया था, तो इस रावण के कब्जे से मुझे क्यों नहीं निकाल पा रहे हैं?"
वाल्मीकि रामायण की व्याख्या से यह विचार आता है कि उन्होंने रामजी का साथ देने के लिये वानरों को क्यों चुना? मानव जैसी इनकी प्रकृति से काव्य का रस कुछ अलग होता है। पर उनमें वानर प्रकृति का नटखटपन है। इस वजह से कहनी का स्रोत कुछ बदलता जाता है। वानर पेड़ों पर चढ़कर दूर तक जा सकते थे और मनुष्य के अस्त्रों से अपने को छुपा सकते थे। वाल्मीकि की नजर से इनका सबसे बड़ा गुण इनकी सहमति थी। सभी मिलकर काम करते थे - वानरों का नेता वानरों के साथ चलता था।
इस प्रबंध से हम दूत हनुमान का वर्णन शेष करते हैं। हनुमानजी बलशाली, बुद्धिमान् और कुशली थे। अपने काम के ऊपर उनका पूरा विश्वास था। रामजी के प्रति उनकी अपार श्रद्धा थी। सुग्रीव के वह मंत्री थे और उसके अति विश्वसनीय थे। वाल्मीकि का हनुमान भारतवर्ष की कत्र्तव्यनिष्ठा और कर्मकौशल का प्रतिरूप है।

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