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वैद वेदना
01-Aug-2017 11:19 PM 3036     

कथाकार कृष्ण बलदेव वैद के शब्द मेरी देह पर उड़ती हुई खाक की तरह झरते हैं और यह खाक देह पर ठहरती नहीं, पल-पल उसी में विलीन होती जाती है। आँखों की कोरों पर भाषा के काजल की तरह कुछ देर ठिठकती जरूर है जैसे किसी वाक्य की रेखा हो और जो बह जाना चाहती हो।
उन्हें पढ़ते हुए आँसुओं के छलकने के पहले ही पीने का अनुभव करता हूँ और अपनी देह के वीराने को उन्हीं से सींचने लगता हूँ। वैद के शब्द मेरे अन्तरतम में कँटीले वृन्तों पर खिलने लगते हैं जिनका रस लेने के लिए शूलों का सामना किये बिना गुजारा नहीं। ये शब्द दिल नहीं दुखाते, बस यही जताते हैं कि दुख है और इन शब्दों के करीब आकर जो कथा सुख मिलता है वह आगे-आगे नहीं चलने लगता, विडम्बना में घुलकर अगले ही वाक्य में ओझल हो जाता है।
मन-बुध्दि और अहंकार के प्रतिपल परिवर्तित चक्रव्यूह के बीच रूप-रस-गंध-स्पर्श और शब्द से लिपटी देह चेतना के सामने निहत्थी जान पड़ती है और वही चेतना पर छाया किये हुए है -- वैद के शब्द इसी छायालोक का निरन्तर पीछा करते हैं। वे अपनी भाषा का रथ जोतकर देह में बसे छायालोकों में आत्म अवलोकी की तरह विचरते हैं और खुद अपना सामना करते हैं। उनकी कृतियों का सामना करते हुए यह अहसास गहरा होने लगता है कि भाषा के अरण्य में अपने आपसे व्दन्व्द चल रहा है जहाँ शब्द किसी दूसरे शब्द से हार-जीत नहीं रहे, वे तो प्रतिपल रूप में, रस में, गंध में, स्पर्श में और खुद अपने आप में समाते चले जा रहे हैं। वे एक वाक्य में जन्म लेते ही अगले वाक्य की देह में खो जाने को इस तरह बेचैन लगते हैं जैसे अपने से खुद अपना संहार कर रहे हों।
वैद के उपन्यास और कहानियाँ शब्दों की उन खेतियों की तरह लगते हैं जहाँ भाषा की पड़ती जमीन पर चेतना के हल की नोंक से वाक्यों की रेखाएँ खिंचती चली जाती हैं और जिनमें वे शब्दों के द्वंद्व-बीज बोते चले जाते हैं और अनथक उसी की फसल काटते हैं। उनकी अकथ कथा समझते ही बनती है, बखानी नहीं जाती। वे हमारे समय में अपने आपको देखने की निष्ठुर और अव्दितीय कथा कला के प्रवर्तक हैं। वे अपनी भाषा के मायालोक के बारे में हमसे कहते हैं कि मैं उसे देखना चाहता हूँ, पढ़ना नहीं। अगर उसे पढ़ने का दुराग्रह किया तो देख भी नहीं पाऊँगा। वैद के शब्द समझाने की जरा भी कोशिश नहीं करते और न कोई ढाढस बँधाते हैं, वे सिर्फ दिखाते हैं जो समझने के लिए जरूरी है। कृष्ण बलदेव वैद की कागद की लेखी आँखन देखी यात्रा पर इसी तरह लिए चलती है। उन्हें पहली बार तब देखा जब वे अमरीका से लौटकर भोपाल आये और निराला सृजनपीठ के अध्यक्ष पद पर आसीन हुए। उनके साथ चम्पा वैद की उपस्थिति ने हमें आत्मीयता के एक और उजाले से भर दिया। हम ही नहीं हमारे बच्चे भी उनके दोस्त बन गये। वैद के भोपाल आने से हम भारतीय भाषाओं के युवा लेखकों की बिरादरी में शामिल होने लगे। अशोक वाजपेयी शुरू से ही संगीत, नृत्य और चित्रकला में युवाओं की बिरादरी का विस्तार करते आ रहे थे। वैद के आ जाने से पूरे देश में लेखकों की युवा बिरादरी निराला सृजनपीठ के माध्यम से बढ़ने लगी। हर साल वैद के नेतृत्व में एक अन्तरभारती लेखक शिविर भोपाल और उसके आसपास के प्राचीन दर्शनीय स्थानों पर होने लगा। हम अनुवाद के माध्यम से दूसरी भारतीय भाषाओं के रचनात्मक अन्तरंग से जुड़ने लगे ।
वैद हमेशा एक दूरी से ही अन्तरंग होना पसन्द करते हैं। खुद अपनी अन्तरंगता से दूरी उनके कथा लेखन और चिन्तन की शैली ही रही है। वे अपने लिखे हुए को भी अपने से दूर बनाये रखते हैं। वे पास रहकर भी दूर जाते और दूर से आते दिखाई देते रहते हैं। इस दूरी में ही उनके सबके करीब आने की कला भी छिपी हुई है। लिखते हुए भी उनके लिखने में न लिखने का भाव झलकता है। जैसे वे हर शब्द को हर दूसरे शब्द से काटते हुए लिख रहे हों। उनके लिखे हुए में हमेशा एक अनलिखे को पढ़ता रहा हूँ। कागज की सतह पर उनके शब्द अनलिखे की गहराई को पानी के फूलों की तरह ढाँपे रहते हैं तो इसलिए कि अनलिखे की गहराई भाप बनकर कहीं उथली न होने लगे।
वे किसी और के अनुभवगम्य पर भरोसा करने वाले लेखक नहीं हैं। उनका लिखना पूरी तरह इन्द्रियगम्य है जिसके सहारे वे अपने अनुभवगम्य तक पहुँचना चाहते हैं। वे अपने लिखने में कितनी भी दूर जाते हुए किसी दर्शन से मदद लेते हुए नहीं लगते, उनका दृष्टिपथ उनके लिखने में अपने आपको देखते हुए बनता चला जाता है। मैं कौन हूँ, कृष्ण बलदेव वैद यह प्रश्न कभी अपने लिखने के बीच पूछते हुए नहीं मिले। मैं क्या हूँ, इस प्रश्न का पीछा करते हुए ही मैंने उन्हें पाया है। वे एक जगह बैठे हुए नहीं, इस तरह दौड़ते हुए लगते हैं जैसे अपना ही पीछा कर रहे हों।
वैद को देह के आयतन के बाहर जाना मंजूर नहीं। शायद उन्हें यह भी मंजूर नहीं कि वे अपने लेखन में किसी सम्यक् दृष्टि का प्रतिपादन करें। वे मेरे अनुभव में एक वेदना-मग्न रचयिता की तरह ही आते हैं। वे जीवन में लिखने का मार्ग इस तरह खोजते हैं कि किसी को किसी से रास्ता न पूछना पड़े। वैद के रचे किस्से-कहानियों में भाषा जीवन के रजस और तमस के बीच ही झूलती है, उसमें किसी सत्व की अभिलाषा नहीं। उनके लिखने में कोई आईना प्रकट नहीं होता पर लगता है कि चेहरा दिख रहा है।
एक दिन प्रोफेसर्स कालोनी में वैद के बँगले के पीछे रहने वाली पड़ौसन ने चम्पा जी से पूछ ही लिया कि आपके पति क्या करते हैं? चम्पा जी ने सहज ही बता दिया कि लेखक हैं, कहानी-उपन्यास लिखते हैं। यह सुनकर पड़ौसन बोली, अरे लिखते क्यों हैं, बाजार से लिखे-लिखाये क्यों नहीं खरीद लेते। -- यह बात सुनकर हँसी तो जरूर आयी पर मन भारी हो गया -- लेखक जीवन के पीछे कितना भी दौड़ता रहे, उसके साथ चलने को क्या कोई तैयार नहीं?
इसके बावजूद भी रचना कहाँ रुकती है, तन की माटी, आँच और नमी पाकर पीक उठती है। उठती हुई हूक को कौन रोक सकता है। एक शाम हमें अचानक पता चला कि चम्पा जी ने कविताएँ लिखी हैं। पिता-प्रकृति और पूर्वजों के साथ बीता बचपन चम्पा जी ने अपनी  कविताओं में सहज ही रच दिया। इन कविताओें में किशोरी चम्पा के मन में खिलते जाते फूलों की स्मृतियाँ भी झलक उठीं। फिर उनकी कविता की बेल फैलती चली गयी और उनकी नयी-नयी कविताएँ हमारे लिए किसी आनन्द-फल से कम न थीं।
निर्मल वर्मा और कृष्ण बलदेव वैद ज्यादा दिनों निराला सृजनपीठ में रहे और सक्रिय रूप से अपने समय के युवा सर्जकों की परवाह और परवरिश करते रहे। उनके सान्निध्य में हमारा यह अनुभव गहराता रहा कि प्रकृति ने हमें कुछ रचने के निमित्त से भी चुन लिया है और यह जिम्मेदारी हमने स्वीकार कर ली है। फिर हम अपनी जीवन चर्या को कलाचर्या से दूर नहीं रख पाये। मन ही मन लगता रहता कि जैसे छोटे-से जीवन में भी कुछ ज्यादा जी लेने का इंतजाम हो गया है। हम किसी घनी छाया में आकर बसेरा कर रहे हैं। घनी छाया कहीं से उठाकर नहीं लायी जा सकती पर अशोक वाजपेयी तो उसे उठा लाये। वैद और निर्मल जी दिल्ली लौट जाने के बाद भी कभी हमसे दूर नहीं लगे। हम जो कुछ भी लिखते, सबसे पहले उन्हें ही भेजते और वे उसे ध्यान से पढ़कर अपनी राय देते। हमारे पास उनके पत्रों का आना कभी कम नहीं हुआ। वे मामूली खत नहीं थे, वे जैसे ही हम तक आते उन्हें खोलते ही हमें उनमें रास्ता दीखता। वे हमारे आत्मीय प्रशंसक ही नहीं, निष्ठुर आलोचक भी रहे। मेरी कहानियों की पाण्डुलिपि पढ़ने के बाद एक शाम पता नहीं क्या सोचकर मुझे निर्मल जी ने सलाह दी कि तुम्हारे मन में जो भारतीय गाँव और कस्बों के जीवन का आस्वाद रचा-बसा है उसे आधुनिकता की झौंक में कभी खो मत देना, अपने लिखने में सँभाले रहना। आधुनिकता के फेर में इसे कई लेखकों ने भुला दिया। इससे साहित्य में रूखापन समा गया और इसे जितना हो सके, भरना भी तो जरूरी है।   
एक बार मुझ पर गजल की बहर में बह जाने की धुन सवार हुई। कुछ लिखीं और तुरन्त वैद को भेज दीं। उनका खत मिला -- मैंने शायद ही किसी भी हिन्दी शाइर की कोई अच्छी गजल अभी तक पढ़ी हो। गजल की गजलियत उर्दू और फारसी की नग्मयी (संगीत) में हो जो उर्दू और फारसी की इजाफतों से भी फूटती है, शब्दों और संस्कारों से भी। मुझे इस कोशिश में कोई खास तुक नजर नहीं आती। मश्क और रियाज और जिद के जोर पर तुम अगर चंद अच्छे शेर लिख भी लोगे तो बात बनेगी। कुछ किस्में भाव विशेष के बगैर अपना कमाल दिखा ही नहीं पातीं। जापानी का हायकू हिन्दी में नहीं लिखा जा सकता, अँग्रेजी का सॅानेट हिन्दी में नहीं (त्रिलोचन मुझे मुआफ करें) और गजल हिन्दी में नहीं। जो लोग लिख रहे हैं उनसे भी मैं मुआफी माँग लेता हूँ। मैंने अपनी राय अपने (खास) रूखे तरीके से दे डाली है, इस भरोसे से कि तुम इसे अन्यथा नहीं लोगे, क्योंकि तुम जानते हो कि मैं तुम्हारे लेखन का प्रशंसक हूँ ।
...और फिर मैंने गजल लिखना छोड़ ही दिया। मश्क और रियाज से कुछ शेर कभी-कभी कह लेता हूँ।

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