ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
वासी, प्रवासी, अप्रवासी
CATEGORY : सम्पादकीय 01-Jan-2017 12:00 AM 1654
वासी, प्रवासी, अप्रवासी

लगभग आधी सदी पहले राजकपूर अभिनीत एक फिल्म - जिस देश में गंगा बहती है बनी थी और उसका शैलेन्द्र का लिखा हुआ एक गीत बहुत प्रसिद्ध हुआ - होठों पे सचाई रहती है, जहाँ दिल में सफाई रहती है, हम उस देश के वासी हैं, जिस देश में गंगा बहती है। राजकपूर को याद करते हुए मनोज कुमार को भी याद कर लेने में क्या बुराई है। वे भी तो पूरब-पश्चिम की उलझन में फँसकर एक फिल्म बना चुके हैं जिसके पात्र अपना देश छोड़कर दूसरे देश के किसी अकेले कमरे में के.एल. सहगल का गाना सुनकर अपना वक्त गुजारते हैं - बाबुल मोरा नैहर छूटो रे जाये। हिंदी के प्रसिद्ध उपन्यासकार कृष्ण बलदेव वैद ने एक उपन्यास लिखा था - काला कोलाज। यह बात उन दिनों की है जब वे लम्बे समय तक अमेरिका में प्रोफेसरी करके भारत लौट आये। इस उपन्यास में कृष्ण बलदेव वैद पूर्व और पश्चिम के उजाले और अँधेरे के द्वंद्व से उलझते दिखाई देते हैं। पर आज दुनिया कुछ इस तरह बदल गई है कि उजाला तो अब पश्चिम में ही है और पूरब अँधेरे से घिरा हुआ है और पूरब का सारा प्रकाश अब पश्चिम से लेकर ही प्रकाशित होना पड़ेगा!
प्रवासी भारतीय दिवस (9 जनवरी) को महात्मा गांधी के दक्षिण अफ्रीका से लौटने की तिथि पर मनाया जाता है और बड़े गर्व से यह कहने की चेष्टा की जाती है कि प्रवासी गांधी ने भारत लौटकर इस देश के स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लिया। यह बात सुनकर मन ही मन लगता है कि गांधी जी इस देश को छोड़कर गये थे और बाद में इसका दुख देखकर उन्हें इस पर दया आ गई। जबकि वास्तविकता यह है कि वे अपने एक किसी मित्र का केस लड़ने दक्षिण अफ्रीका गये थे और वहां के नागरिकों की कुछ समस्याओं से भी दो-चार होते रहे, उसके लिये उन्होंने संघर्ष किया और नेतृत्व भी प्रदान किया। इसकी चर्चा भारत में ही नहीं पूरे विश्व में हुई। गांधी जी को सहज ही भारत लौटना था, सो वे लौट आये और अपने देश को समझने और उसे अंग्रेजी हुकूमत से मुक्त कराने के संघर्ष में सर्वमान्य नेता बनते चले गये। हमारे देश के प्रतिष्ठित लेखक गिरिराज किशोर पता नहीं गांधी जी को क्यों पहला गिरमिटिया कहते हैं, जबकि गिरमिटियों का जो इतिहास बताया जाता है कि वे फीजी, मॉरीशस, सूरीनाम, गुयाना, त्रिनिदाद और अफ्रीका में फिरंगियों के शोषण के शिकार होकर वहां गन्ने की खेती करने और कहीं-कहीं रेलवे लाइनें बिछाने गये थे। जहां उनका जीवन बहुत कठिनाइयों में गुजरता था। पर गांधी जी तो ऐसे किसी कांट्रेक्ट (गिरमिट) पर फिरंगियों के द्वारा अफ्रीका नहीं ले जाये गये थे। इसीलिये उन्हें गिरमिटिया तो नहीं कहा जा सकता।
प्रवासी भारतीय दिवस न्यायविद् लक्ष्मीमल सिंघवी के मानस से उपजा है। जब 2003 में अटल बिहारी वाजपेयी भारत के प्रधानमंत्री हुए थे। इस दिवस की संकल्पनाओं में यह कहने का प्रयत्न किया गया है कि वासी, प्रवासी और अप्रवासी भारतवंशियों को आपस में सांस्कृतिक रूप से कैसे मिलाया जा सके। इन भारतवंशियों की जो बाद की पीढ़ियां हैं उन्हें भारत की नई पीढ़ियों से कैसे जोड़े रखा जा सके। जो भारतीय श्रमजीवी दूर दुनिया में काम करते हैं उनकी कठिनाइयों को हल कैसे किया जा सके। कोई ऐसा नेटवर्क बनाया जा सके जिससे कि विश्व के लगभग 110 देशों में फैले भारतीयों में एक आपसी संबंध बना रहे। चिंता तो यहां तक की गई है कि जब भारतीय मूल के लोग भारत के किसी हवाई अड्डे पर उतरें तो यहां के लोग उनसे अच्छी तरह पेश आयें। (जैसे अब तक वे उनसे बुरी तरह पेश आ रहे थे।) आमतौर पर वासी, प्रवासी और अप्रवासी के संबंध को धर्म से जोड़कर बहुत देखा जाता है। जब भी कोई चर्चा होती है तो यह जरूर कहा जाता है कि देखिये साहब, सूरीनाम, मॉरीशस, फीजी आदि जगहों पर इन प्रवासी-अप्रवासियों ने मंदिर बनवाये हैं, वे अपने घरों के आंगन में तुलसी चौरा स्थापित करते हैं और बेचारी हिंदी भी इनके द्वारा किसी न किसी रूप में सीखी और सिखाई जाती है। इनमें पहले कुछ अच्छे कवि भी हुए होंगे, लेकिन आमतौर पर यह रेखांकित करना बहुत मुश्किल है कि हिंदी सहित जो अन्य भाषा-भाषी भी इन जगहों पर गये हैं उन्होंने कुछ महत्वपूर्ण साहित्य रचा हो। लेकिन इस हिंदी सेवा का लाभ उठाते हुए हमारे देश के अन्यान्य हिंदी सेवी बड़े मजे से विदेशी यात्राओं पर तो निकल ही पड़ते हैं। वे अकेले नहीं जाते, पूरे परिवार को साथ ले जाते हैं। कुछ ऐसे हिंदी सेवी भी हैं जो व्यवसाय से तो श्रेष्ठीजन (सेठजी) हैं लेकिन उनका हिंदी प्रेम देखते ही बनता है।
भारतवंशी वासी, प्रवासी, अप्रवासी मनोज कुमार की फिल्म की तरह कुछ इसी भाव से भरे हुए दिखाई देते हैं - है प्रीत जहां की रीत सदा, मैं गीत वहां के गाता हूं, भारत का रहने वाला हूँ, भारत की बात बताता हूँ। लेकिन 2003 से 2015 तक अब तक हुए प्रवासी भारतीय सम्मेलनों में ऐसी कोई गहरी बात सुनने और समझने में आई ही नहीं है कि भारत की वह कौन सी बात है जिसकी गहराई में वे डूबे हुए हैं और उसे बताना चाहते हैं।
आमतौर पर देखा यह जाता है कि वे अपने परदेशों में अपने काम-धंधों के बाद जो थोड़ी सी फुरसत उन्हें मिलती है उसमें वे भारत के अतीत का और थोड़ा बहुत अपने पूर्वजों के अतीत का आलाप-विलाप जरूर करते रहते हैं। लेकिन इतने भर से तो भारत की बात नहीं बताई जा सकती। इतना कह कर भी नहीं बताई जा सकती कि - हम उस देश के वासी हैं, जिस देश में गंगा बहती है। क्योंकि इसी गीत में शैलेन्द्र ने लिखा है कि - ज्यादा की नहीं लालच हमको, थोड़े में गुजारा होता है। पर देखने में तो यही आ रहा है कि हमारे भारतवंशी जो प्रवासी और अप्रवासी कहलाते हैं उनका गुजारा थोड़े में तो नहीं होता है। उन्हें बहुत चाहिये। इसी चाह में वे अपने देश को छोड़कर भी जाया करते हैं। जो सदियों पहले दूर देशों में रह गये उनकी बात और है। पर जो अब अपने देश की सरहदें लांघकर दूर देशों में जाया करते हैं और जिनका उद्देश्य सिर्फ कमाना है उन्हें खोने की उतनी चिंता है ही कहाँ।
आमतौर पर इन प्रवासी सम्मेलनों के मंचों पर प्रमुख रूप से राजनेताओं की ही भीड़भाड़ देखी जाती है। उन मंचों पर कुछ प्रवासी व्यवसायी भी दोनों तरफ की कोनों की सीटों पर बैठे दिखाई दे जाते हैं। राजनेता उनसे सिर्फ यही कहते पाये जाते हैं कि आपने जो कमाया है उसे थोड़ा अपने ही देश में गंवा दीजिये। और प्रवासी व्यवसायी राजनेताओं से कहते हैं कि हमें अब अपने ही देश में आप परदेश से बुलाकर कुछ और कमाने का मौका दे दीजिये। तब वही प्रश्न उठता है बार-बार कि इस सम्वाद में भारत की बात कहाँ है। भारत हर बार पीछे छूट जाता है और कुछ लोग भारत छोड़कर प्रवासी और अप्रवासी कहलाने लगते हैं। जो अब भी यहीं रह रहे हैं वे तो भारतवासी कहलायेंगे ही।
हमने बात की शुरूआत शैलेन्द्र को याद करते हुए की है - हम उस देश के वासी हैं जिस देश में गंगा बहती है। लेकिन सिर्फ इतना कहने से तो कुछ भी सिद्ध नहीं होता क्योंकि गंगा दिनोंदिन मैली होती गई है। अभी हाल ही में जल के रक्षण की चिंता करने वाले पर्यावरणविद् अनुपम मिश्र हमारे बीच नहीं रहे, जो सिर्फ गंगा की ही नहीं देश और दूर दुनिया की सारी नदियों की चिंता में डूबे रहते थे। सिर्फ नदियाँ ही नहीं वे कुओं, तालाबों और छोटे-छोटे कुण्डों के दुख में भागीदार होते रहे। वे पूरी दुनिया को लगातार बताते रहे कि जल ही जीवन का आधार है और यह आधार डगमगा रहा है। इसके स्रोत सूख रहे हैं। उन्होंने पूरी दुनिया के नागरिकों से कवि रहीम की वाणी में एक ही अपील की है - रहिमन पानी राखिये, बिन पानी सब सून, पानी गये न ऊबरै, मोती, मनुष, चून। आज प्रवासी और अप्रवासी व्यवसायी अपने व्यवसाय की चिंता तो करते हैं, मगर उनके व्यवसाय को देखकर अब यह अहसास करना मुश्किल है कि उन्हें अनुपम मिश्र की तरह पानी की चिंता है। क्योंकि दुनिया में कई ऐसे प्रवासी और अप्रवासी हैं जिनके उद्योगों का गंदा पानी भारत ही नहीं संसार की नदियों को भी गंदा कर रहा है। गंगा की चिंता किये बिना गंगा से ही अपनी पहचान कैसे बताई जा सकती है। अगर गंगा मैली हो गई है तो हमारी पहचान भी मैली हो गई होगी।
अनुपम मिश्र को श्रद्धांजली।

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