ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
वाल्मीकि रामायण : आधुनिक विमर्श-18 पुष्पक विमान अनुवाद : संजीव त्रिपाठी
01-Sep-2017 03:07 PM 2192     

कहानी को पाठकों के लिए रोचक बनाये रखने के लिए लेखन कला में दक्ष लेखक कभी-कभी कहानी के विवरण को शब्दों से सजाते-सँवारते हैं। लेखक अतिश्योक्तिपूर्ण और बनावटी से दिखने वाले दृश्य को भी सजीव सा बना देता है। जैसे बड़ी भीड़ को "लाखों" की भीड़, ऊँचे भवन को "गगन चुम्बी" ईमारत और एक नदी को "समुद्र" जैसी बताना। कहानी कला सचमुच में विलक्षण हो सकती है, लेकिन उसकी अतिश्योक्ति का मूल हमेशा विषय वस्तु या घटना ही रहती है। विषय वस्तु की विशेषताओं को आकार और माप में बढ़ाया जा सकता है पर मूल नहीं बदला जा सकता। एक मनुष्य कभी "शेर" जैसा तो कभी पचास फीट लम्बा "भीमकाय" सा दिख सकता है।
जहाँ हमने जोरदार पलटवार की कहानी सुनी है और उनकी सच्चाई चमत्कारिक और घटनापूर्ण आशाओं से भरी होती है। हमने प्राक्षेपिकी, धनुर्विद्या और वायु प्रवाह तकनीकी का भी गहन विश्लेषण सुना है। सैद्धान्तिक रूप में बाण को ध्वनि स्रोत की ओर भेजना संभव सा प्रतीत होता है। तीर को बादल में से पानी निकालने के लिए छोड़ा जा सकता है या बाण से जंगल में आग लगाई जा सकती है। हमने मंत्र आह्वान के बारे में पढ़ा है, हो सकता है कि वह शरीर और दिमाग को कार्य पर पूरी तरह से केन्द्रित करने की तकनीकी हो जिससे पूरी क्षमता से कार्य किया जा सके? विशेष गतिशीलता वाले बाण दुर्लभ हो सकते हैं और वह उनके बनाने के तरीके व बनाने में उपयोग हुये पदार्थ पर निर्भर करता है।
ऊपर उल्लेखित तर्क को समझना मुश्किल हो जाता है जब वाल्मीकि कहानी में एक आकाशीय वाहन का उल्लेख करते हैं। जब दूरियाँ बहुत ज्यादा होती हैं तो उस समय हमें आकाशीय परिवहन की आवश्यकता होती है। आकाशीय परिवहन सुगम है पर वह एक साहसिक अभियांत्रिकीय कार्य है। अभियांत्रिकी को उपयुक्त पदार्थ, वायुगतिकीय प्रारूप और वायु में ऊपर उठने एवं परिचालन करने की जरूरत होती है। वाल्मीकि के अनुसार रामायण काल में उस समय के सबसे धनाड्य व्यक्ति "कुबेर" ने अपने निजी उपयोग के लिए वायुयान बना लिया था। "कुबेर" यक्ष साम्राज्य का राजा था और उस समय पृथ्वी के अधिकाँश संसाधनों पर यक्ष प्रजाति के लोगों का अधिकार था। "पुष्पक" नामक वायुयान लंका के राजा रावण ने ताकत के बल पर कुबेर से छीन लिया था। रावण का उद्देश्य दुनिया के किसी भी हिस्से से अपनी पसंदीदा वस्तुओं का अधिग्रहण करना था।
वाल्मीकि के विवरण के अनुसार पुष्पक विमान उसमें बैठने वाले की इच्छा के अनुसार कहीं भी जा सकता था। वह रथ बनकर आसानी से आकाश में उड़ सकता था। वह पूरी तरह से प्रारूप से यांत्रिकीय था और वह गमन के लिए ईंधन या जल पर निर्भर नहीं था। वह एक बड़ा शिल्पनिर्मित गुफानुमा आकार का ढाँचा था जो कि अपने तैराव से दिशा सूचित करता था। वाल्मीकि ने उसके जमीन से आकाश में उड़ान भरने और जमीन पर उतरने के बारे में कोई जिक्र नहीं किया है, केवल उसके वायु में संचालन के लिए यांत्रकीय पखों का उल्लेख किया है। ऐसा हो सकता है कि वो यंत्रकीय पंखे रथ के हत्थे से नियंत्रित होते हो?
वायुयान पक्षियों के प्रभाव से आसानी से क्षतिग्रस्त हो सकता था। गिद्ध जटायुु ने रावण के विमान के पंखों पर हमला कर उसे जमीन पर उतरने के लिए मजबूर कर दिया था। हो सकता है कि विमान का संतुलन बनाए रखने के लिये सभी पंखे चलने चाहिये और एक भी पंखे में खराबी उसे अस्थिर बना सकती थी? रथ और पंखों की अवधारणा वैदिक साहित्य से ली गयी है, जिसके अनुसार पौराणिक स्वर्गीय गमन जो कि यान में सवार होकर किया जाता था, इस अवधारण के हिसाब से यांत्रकीय पंखों से वायु गमन अकल्पनीय नहीं लगता। वायुयान के पंख किसी जीवित जीव के नहीं थे, पंख शब्द यहाँ उपमा के रूप में प्रयोग किया गया है। पंख यंत्रकीय रूप में विमान को आगे बढ़ने में सहायता करते थे।
कहानी के अनुसार हनुमान ने लंका में रावण के महल से पास एक बहुत बड़ा यान रखा हुआ देखा था। उन्होंने बड़े-बड़े भवनों और इमारतों की लम्बी लम्बी कतारें देखीं जो कि वास्तुकला अभियांत्रिकी का अच्छा नमूना था। उन्होंने वहाँ मानव निर्मित पेड़, पर्वत, नदियाँ और झीलें देखी, जो बहुत सुन्दर थी। वहाँ बनावटी पक्षी थे, जो पेड़ों पर बैठे हुये थे और बनावटी रत्न जड़ित फूल थे जो आसमान में जगमगाहट बिखेर रहे थे। स्वर्णिम घोड़े और रजत रंजित सर्प गगन को अत्यंत शोभायमान बना रहे थे। खूबसूरती से बनाया हुआ आकाश मार्ग एक विशालकाय यान की तरफ जाता था जो कि सूर्य के मार्ग में एक प्रकाश स्तम्भ सा प्रतीत होता था।
यान की तरफ जाते हुये हनुमान ने रंग-बिरंगे बादल, तारे और आसमान देखा, जो यान के ऊपर हीरे, मोती और अन्य कीमती खनिज पदार्थों से बनाये गये थे। हर चीज बहुत ही निराली थी और बड़े ही ध्यानपूर्वक ढंग से बनाई गई थी। यान का प्रारूप, उसमें उपयोग किया गया सामान और उसको बनाने की कला, सभी अपने आप में कुछ विशेष था। पर्वतनुमा दिखने वाले यान में अन्दर एक गुफा थी जिसमें कुछ खिड़कियाँ और द्वार थे। उसमें अभियांत्रिकी या नक्कासी, कुछ भी साधारण नहीं थी। सीता की खोज में हनुमान उस बड़े यान में एक जगह से दूसरी जगह घूमते रहे। हर जगह की अपनी खूबसूरती थी।
वाल्मीकि ने इशारा किया है कि यह यान सभी नागरिकों के लिए नहीं था, अपितु यह केवल उन कुछ खास चुनिन्दा लोगों के लिए था जिन्होंने इसे सवार होने की योग्यता हासिल कर ली थी। रावण ने अपनी कई सालों की कठिन तपस्या और वरदान के कारण इस में सवार होने की योग्यता हासिल की थी। इस बात से इस तर्क को बल मिलता है कि वायुयान उसमें बैठने वाले योग्य लोगों की इच्छा के अनुसार गमन करता था। वायुयान को उड़ने के लिए ऊपर की ओर उठने की आवश्यकता होती है और इसके लिए यान के संचालन हेतु कई पंख होने से वायु-गति-विज्ञान के सिद्धांत को मदद मिलती है।
युद्ध के अंत में विभीषण ने राम के घर वापस पहुँचने की व्याकुलता को भाँप लिया था। इसी कारण विभीषण ने राम को पुष्पक विमान से अयोध्या जाने का अनुरोध किया, जिससे जल्दी वहाँ पहुँचा जा सके। राम ने बिना यह सोच विचार किये कि वायुयान से यात्रा सुरक्षित और भरोसेमंद है कि नहीं, तुरंत आग्रह को स्वीकार कर लिया। राम ने सुग्रीव को अपने वानर दल के साथ और विभीषण को अपने सभी मंत्रियों के साथ अयोध्या आने के लिए आमंत्रित किया। इतने सभी लोगों का वजन बहुत होगा। वाल्मीकि ने इस बारे में कोई उल्लेख नहीं किया है कि इतने वजन के कारण वायुयान में कोई अस्थिरता हुई।
वाल्मीकि की अपनी शैली के अनुसार, वायुयान राम को एक अवसर देना चाहता था जिससे वह सीता को वापस जाते समय आकाशीय मार्ग से घटनाओं वाली जगहों को दिखा सके और उनके बारे में बता सके। इससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि वायुयान जमीन से बहुत अधिक ऊँचाई पर नहीं उड़ रहा होगा जिससे घटना स्थलों को आसानी से पहचाना और अच्छी तरह से देखा जा सके। लंका से उड़कर वायुयान किष्किन्धा में रुका और इस विश्राम का उद्देश्य वहाँ से "वाली" की विधवा तारा, सुग्रीव की पत्नी रुमा और अन्य वानरों की पत्नियों को साथ में लेना था। पूरी तरह से नहीं कह सकते, पर यात्रा में विश्राम यात्रा की थकान को दूर करने के लिए लिया जाता है। रास्ते में भरद्वाज मुनि के आश्रम पर भी एक और विश्राम लेकर, राम अपने दल के साथ अयोथ्या पहुँचते हैं। अयोध्या पहुँचकर राम वायुयान को उसके असली मालिक कुबेर को लौटा देते हैं।
इस लेख में हमने प्राचीन समय में वायुयान के होने के तर्क को मजबूत करने का प्रयास किया है। हम इस अवधारणा के आधार पर कार्य करते हैं कि रामायण एक ऐतिहासिक महाग्रंथ है और वाल्मीकि केवल घटनाओं के बारे में विवरण करते हैं, पर वह घटनाओं को कहानी में बनाते नहीं हैं। नाटक के दृष्टिकोण से अपहरण की घटना की सफलता के लिए वायुयान जरूरी है। वह इस हिसाब से भी उपयुक्त लगता है कि समुद्र के बीच एक दूरदराज द्वीप से मुख्य भूभाग तक आसानी से आने-जाने के लिये यह एक अभियांत्रिकी का अच्छा उपयोग है। वायुयान उड़ान अड्डा की परिकल्पना और यान के निर्माण की विधि का विस्तृत विवरण कहानी में वायुयान के होने की हकीकत को दर्शाता है। लेकिन मुख्य सैद्धान्तिक प्रश्न यह है कि हमें इस तकनीकी की आगे निरंतरता और अन्य कोई भौतिक साक्ष्य और कोई प्रमाणिकता नहीं मिलती है। केवल एक ही अटकल लगाई जा सकती है कि घटनाएँ इतनी पुरानी हैं कि उनके कोई चिह्न या अवशेष नहीं बचे हैं, महाग्रंथ के आलावा।

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