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उत्सव और उल्लास के बीच
01-Jan-2017 12:02 AM 2587     

मनुष्य एक उत्सव-धर्मी जीव है लेकिन यह उत्सव-धर्मिता उसकी सुरक्षा, समृद्धि और विश्वास पर निर्भर करती है। जिस साल फसल खराब हो जाती है तो किसान के लिए दिवाली का कोई अर्थ नहीं रह जाता। आतंक, अनास्था और अभाव के साए में उत्सव की मानसिकता नहीं बनती। जिसके लिए उत्सव कमाई का एक जरिया होता है वह किसी न किसी बहाने उत्सव का मौका और माहौल चाहता है। जहाँ भी भीड़ होगी, चाहे वह शोकसभा ही क्यों हो, चाय, बीड़ी, गुटखा, गुब्बारे और चाट बेचने वाले पहुँच ही जाते हैं। श्मशानों के आसपास दाह-संस्कार के सामान की दुकानें होती ही हैं और उनके मालिक भी ग्राहक का इंतज़ार करते ही हैं भले ही किसी का सुहाग उजड़े या किसी की गोद। वैसे ही किसी भी दिवाली या धनतेरस को कोई भी ज्योतिषी यह नहीं कहता कि इस वर्ष खरीद का मुहूर्त अच्छा नहीं है इसलिए सभी लोग अपना दिवाली और धनतेरस का पैसा बचाकर अपने बच्चों या और किसी कठिन समय के लिए रख लें। बाज़ार और बनिया यही चाहते हैं। इसलिए इसी में पंडित और ज्योतिषियों का भी भला है। कोई नहीं कहता कि बाज़ार में त्योहारों या शादियों के मौसम में अचानक घी, दूध, मावे और पनीर की माँग बढ़ जाती है और उस बढ़ी हुई माँग की आपूर्ति नकली सामग्री से की जाती है। इसलिए नकली मावे-घी की मिठाइयों की बजाय साधारण चावल-दाल या गुड़ का प्रसाद चढ़ा कर पूजा कर लें।
ऐसे ही सरकारें भी विभिन्न उत्सवों का आयोजन करतीं हैं जिनमें नकली उल्लास, नकली आस्था और नकली मुद्दे उछाले जाते हैं। जिनका किसी के भी किसी कल्याण से, कोई संबंध नहीं होता। जनता का समस्याओं से ध्यान हटा रहे और लम्बे-चौड़े बजट की मेहंदी की बँटाई में अपने और अपनों के हाथ पीले होते रहें। और मज़े की बात यह है कि ऐसे आयोजनों और उत्सवों का लक्ष्य ऐसा होता है जिसे मापना संभव नहीं होता। क्योंकि यदि मापने योग्य काम हाथ में लिया जाए तो फिर ज़वाबदारी भी हो जाती है। उसकी सफलता-असफलता तय हो जाती है। इसीलिए ऐसे सभी उत्सव विकास, चेतना, संवेदना, आस्था, प्रेम, गर्व, जागरण, भाईचारा, सद्भाव आदि जैसी भाववाचक संज्ञाओं का प्रचार करते हैं जिनकी आड़ में बहुत "कुछ" छुप जाता है। भाववाचक संज्ञाएँ भाव और अनुभव का विषय हैं। वे प्रमाण की मोहताज नहीं होतीं। और जब इनके प्रमाण माँगे जाते हैं तो ऐसे उत्साही सांस्कृतिक पुलिसियों को तालिबानी आतंकियों का गिरोह बनते देर नहीं लगती फिर चाहे वे किसी भी धर्म या देश में हों।
जब इस देश में विगत शताब्दी के पूर्वाद्र्ध में स्वभाषा, स्वदेशी, स्वाभिमान के लिए कोई सरकारी सहायता और संरक्षण प्राप्त नहीं थे तब इन भावों का अधिक विकास हुआ। अब जब इनके नाम पर तरह-तरह के बजट और विभागीय धंधे शुरू हो गए तो बरसाती मेंढकों की तरह भक्त और सेवक जुट आए तथा कागजों और मीडिया में देश का साहित्यिक, सांस्कृतिक, मानसिक, वैचारिक सभी तरह का विकास होने लगा। गंगा की आरती के लिए तेल का बजट आने से शोरगुल बढ़ता गया और गंगा मरणासन्न हो गई है। हिंदी भाषा और उसके राष्ट्रीय स्वरूप का विकास भी तब अधिक हुआ जब उसके लिए किसी प्रकार की सरकारी सहायता, संरक्षण का प्रावधान नहीं था। जब न झंडा था, न राष्ट्र गान था और न ही भारत माता का मंदिर था तब शायद इस देश के सभी धर्मों के लोगों ने देश के लिए अधिक बलिदान दिए थे। आज तो देश भक्ति के नाम पर स्वार्थ सिद्धि और दादागीरी अधिक है। ब्रिटेन के लार्ड एक्टन ने कहा है- बदमाश का अंतिम आश्रय देश भक्ति होता है।
दुनिया के विभिन्न भागों से जीवनयापन के लिए मनुष्य ही नहीं, अन्य जीव भी प्रवास करते रहे हैं। जीवों में संघर्ष का नाम देश, नस्ल आदि के आधार पर नहीं होता लेकिन संघर्ष तो संसाधनों पर अधिकार के लिए उनमें भी होता है। इसके अतिरिक्त बहुत से लोगों को सत्ताधरियों ने गुलाम बनाकर या लालच देकर अपने स्वार्थ के लिए अपने यहाँ रखा, बसाया। इसके लिए उन लोगों के मूल देशों का कोई विशेष योगदान नहीं है। जैसे कि भारत से बहुत से लोगों को ब्रिटेन ने अपने उपनिवेशों में वहाँ के विकास के लिए बसाया या अमरीका ने अपने विकास के लिए काले गुलामों को ख़रीदा जो अब यंत्रीकरण के बाद उनके लिए भार स्वरूप हो गए हैं या अब उन योरोपीय उपनिवेशों के मूल निवासी अपनी राजनीति चमकाने के लिए अपने यहाँ सैंकड़ों वर्षों से रह रहे लोगों को बाहरी बताकर प्रवाद और अशांति फैला रहे हैं।
गिरमिटिया मजदूरों के अतिरिक्त, विशेषरूप से स्वतंत्रता-प्राप्ति के बाद जो भारतीय बाहर गए हैं वे अपनी योग्यता, खर्च और जोखिम पर बाहर गए हैं। उसमें सरकार का कोई योगदान नहीं है। प्रवासी भारतीयों द्वारा भारत के विकास में योगदान उन लोगों का सबसे अधिक है जो साधारण लोग हैं और जो विदेश जाकर तथा वहाँ कोई भी ठीक-ठाक काम करके अपनी और अपने परिवार की आर्थिक स्थिति सुधारना चाहते हैं क्योंकि वे ही कमाकर हर महिने विदेशी मुद्रा भारत भेजते हैं। जो लोग बड़े और बड़े कारोबारी बन गए हैं वे भारत से संबंध इसलिए रखना चाहते हैं कि मौका लगाने पर भारत से भी कुछ कमाया जा सके। ऐसे ही लोग "प्रवासी भारतीय सम्मेलन" में आते या बुलाए जाते हैं, जिसमें तत्कालीन सत्ता के कृपा पात्रों को भी घूमने और कुछ सूँघने का मौका मिल जाता है। सामान्य भारतीयों और सामान्य प्रवासी भारतीयों का ऐसे सम्मेलनों से कोई संबंध नहीं है और न ही कोई उपयोगिता। इस श्रेणी में विश्व हिंदी सम्मेलन को भी रखा जा सकता है। वैसे सभी उत्सव ऐसे ही होते हैं। सृष्टि में सब कुछ बिना किसी उत्सव, आडम्बर और उद्घोषणा के होता ही रहता है जैसे कि ऋतुओं का बदलना, दिन-रात का होना, पानी का वृक्ष की जड़ों तक जाना, पत्तियों का ऑक्सीजन बनाना या किसी निराश व्यक्ति के कंधे पर किसी भले आदमी द्वारा हाथ रख दिया जाना तथा ऐसे ही समस्त बड़े और ज़रूरी कार्य-व्यापार।
इस सन्दर्भ में ये दो-चार तथ्य देखें और उत्सवी-उपलब्धियों और घोषणाओं तथा शाब्दिक प्रेम-प्रकटीकरण पर विचार करें।
नोटबंदी का "चालीसा" हो गया है। लोग लाइनों में खड़े थक-मर गए। काले कर्मों के उस पहाड़ में से वही चूहा निकला जो हमेशा से संविधान को कुतरता और लोक के प्रगति-पथ में गड्ढे खोदता रहा है। मतलब कि सभी के पाप पतितपावनी में प्रवाहित हो गए और सबको क्लीन चिट मिल गई। और दूसरी तरफ साल दो साल में अपने परिवार से मिलने के लिए आने वाले सामान्य प्रवासी भारतीय जो बार-बार के मुद्रा विनिमय का कमीशन बचाने के लिए दस-बीस हजार रुपए और दो चार सौ डॉलर, पोंड, रियाल आदि हमेशा अपने साथ रखते हैं, मारे गए क्योंकि उनके पुराने भारतीय नोट उनकी जेबों में पड़े-पड़े ही मिट्टी हो गए। लाखों प्रवासी भारतीयों ने अपने संबंधित देशों में वहाँ के भारत के राजदूत, कोंसलर और दिल्ली में भारत के विभिन्न मंत्रालयों को लाखों मेल किए लेकिन किसी को भी सरकार की ओर से कोई उत्तर नहीं दिया गया। और अब भी सरकारी अधिकारी और संबंधित विभागों की साइटें मौन हैं और भारत की गर्भनाल से जुड़े और देश के तथाकथित सुदूर बन्धु तनाव में। बहुत बड़ी मछलियाँ तो अपने पैसे भारतीय मुद्रा में रखती ही नहीं और यदि रखती भी हैं तो किसी को भी भेज कर बदलवा लेंगी लेकिन एक सामान्य प्रवासी अपने दस-बीस हजार के लिए 30 दिसंबर 2016 से पहले भारत की यात्रा का खर्च उठा सकता है?
ऐसे में अमरीका में "अमेरिकन इन्डियन पब्लिक अफेयर कमेटी" जिसमें भारत के मूल के लोगों की कई तथाकथित स्वयंसेवी संस्थाएँ शामिल हैं, ने एक मीटिंग करके समाचार छपवाया है कि नोटबंदी देश के विकास की दिशा में एक कदम है। ये वे लोग हैं जो यहाँ "प्रवासी भारतीय सम्मेलन" में आमंत्रित होते हैं, वहाँ बड़े-बड़े भारतीय सत्ताधारियों का स्वागत करते हैं और यहाँ-वहाँ दोनों जगह अपनी राजनीतिक और आर्थिक महत्त्वाकांक्षाएं पूरी करते हैं। न तो ये विदेश में सामान्यजन हैं और न ही भारत में आने पर। इन पर नोट बंदी का कोई असर नहीं हुआ है और यदि दस-बीस हजार रुपए के पुराने नोट मिट्टी हो भी गए तो कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि इस भाव में सत्ता की निकटता कोई महँगी नहीं। ये अमरीका में भी अपने हितों की रक्षा के लिए अमरीका की दोनों पार्टियों को चंदा देते हैं। इनमें इस नोट बंदी के चक्कर में बीस-तीस हजार रुपए गँवा देने वाले सामान्य प्रवासी भारतीय कहीं नहीं हैं।
जो प्रवासी अपने भारत-प्रेम के कारण विदेश से भारत आ गए हैं उनके विदेशों में जन्मे लेकिन यहाँ रहकर दस-दस वर्ष तक पढ़े बच्चों को भी कुछ प्रवेश परीक्षाओं के लिए भारतीय बच्चों के समान नहीं माना जाता। और जब उनके अभिभावक यहाँ रहकर यहाँ की सरकार को टेक्स दे रहे हैं तो भी विदेश में जन्मे उन बच्चों से यह अपेक्षा की जाती है कि उनकी फीस विदेशी मुद्रा में चुकाई जाए।
मिस्र की दुनिया की सबसे मोटी महिला के इलाज़ के लिए सुषमा जी ने आश्वासन दिया है। बहुत अच्छी और मानवीय संवेदना की बात है लेकिन अरब देशों में मर चुके सैंकड़ों भारतीयों के शव अभी भी कुछ औपचारिकताओं के चलते वहाँ के मुर्दाघरों में रखे हुए हैं। ठीक है, मरकर जीव मिट्टी हो जाता है फिर भी उसके परिवार की मनःस्थिति के बारे में भी तो सोचा जाए। ख़ाक को भी तो शालीनता से सुपुर्द-ए-ख़ाक किया जाए।
क्या इस बार के प्रवासी भारतीय दिवस के उत्सव में ये मुद्दे भी किसी के दिमाग में आएँगे या फिर वही गुलाबो का नाच, मैसूर का भ्रमण, फोटो खिंचवाई, हाथ मिलाई और कुछ लोगों के आपसी हितों की चर्चा में ही उत्सव का विसर्जन हो जाएगा और हमेशा की तरह ये सुदूर भारतवंशी विदेशी मुद्रा के सहज भंडार और बिना जिम्मेदारी के मात्र दोहरी नागरिकता के नाम पर आपातकालीन वोट बैंक मात्र बने रहेंगे?

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