btn_subscribeCC_LG.gif btn_buynowCC_LG.gif

युवा पीढ़ी के मददगार
01-Jun-2018 03:13 PM 1957     

ब्रिटेन निवासी, वरिष्ठतम साहित्यकार, श्री प्राण शर्मा का विगत 24 अप्रैल को, कॉवेनट्री के अस्पताल में चेस्ट इंफेक्शन और पक्षाघात के कारण निधन हो गया। प्राण शर्मा जी का जाना ब्रिटेन के साहित्यिक समुदाय के लिए एक अपूरणीय क्षति है। ब्रिटेन में न जाने कितनों को उन्होंने ग़ज़ल लिखना सिखाया है। बिना किसी स्वार्थ के वे हमेशा हर किसी की यथासंभव मदद के लिए तैयार रहा करते थे।
मेरी हाल ही में हाई कमीशन के एक आयोजन में उनसे पहली प्रत्यक्ष मुलाक़ात हुई थी। उनके स्वास्थ्य और भौगोलिक दूरियों की वजह से इससे पहले कभी उनसे मिलना संभव नहीं हो पाया था। तब भी नहीं जब हाई कमीशन लन्दन द्वारा उन्हें सम्मान मिला और तब भी नहीं जब पहली बार एक साहित्यिक आयोजन के मंच से मैंने उनका परिचय पढ़ा। पिछले कुछ वर्षों से, उनके स्वास्थ्य समस्याओं के चलते किसी भी आयोजन में उनकी शिरकत कम हो गई थी। हालाँकि नेट के द्वारा हमारी पहचान कई वर्षों की थी।
सन् 2009 में जब मैंने ब्लॉगिंग शुरू की थी तब प्राण शर्मा जी की ग़ज़लें और गीत इन्टरनेट पर कई जगह पढ़ने को मिलते थे। कई ब्लॉग्स पर उनकी उत्साहवर्धक टिप्पणियाँ भी दिखाई पड़ती थीं और हिन्दी ब्लॉग जगत में उनका नाम बहुत सम्मान से लिया जाता था। इसी दौरान मेरे कुछ ब्लॉग्स पढ़कर और यह जानकार कि मैं ब्रिटेन में रहती हूँ, उन्होंने मुझे स्वयं ईमेल किया था और ब्रिटेन में होने वाली हिन्दी साहित्य की गतिविधियों की जानकारी दी थी। उसके बाद वह समय-समय पर अपनी ग़ज़लें मेल से भेजा करते थे और मुझे लन्दन में होने वाली साहित्यिक गतिविधियों में हिस्सा लेने के लिए प्रोत्साहित करते रहते थे।
प्राण जी के बारे में, मैं तब तक उतना ही जानती थी जितना कि उनकी रचनाओं के साथ उनके परिचय से पता चलता था। फिर 2016 में दिव्या माथुर द्वारा सम्पादित पुस्तक "नेटिव सेंट्स" में सम्मिलित सभी साहित्यकारों के साक्षात्कार लेकर, उनका परिचय लिखने की जिम्मेदारी मुझे सौंपी गई। प्राण शर्मा जी उनमें से एक थे। इस दौरान पहली बार मेरा उनसे ईमेल और फोन द्वारा लंबा संवाद हुआ। जिसमें उन्होंने खुलकर अपने मन की सभी बातें कहीं।
यह साक्षात्कार संपादित रूप में उस पुस्तक में अंग्रेजी भाषा में सम्मिलित है। परन्तु मैं यहाँ उसी बातचीत के कुछ और अंश प्रस्तुत करना चाहती हूँ।
प्राण शर्मा का जन्म जून 1937 में वाजिराबाद में हुआ था, जो अब पाकिस्तान का एक हिस्सा है। विभाजन से पहले वह लाहौर में पढ़े थे और फिर बाद में दिल्ली में उन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी की। उन्होंने पंजाब विश्वविद्यालय से हिंदी में मास्टर्स ऑफ आट्र्स की डिग्री हासिल की, जिसके बाद उन्होंने दिल्ली के कीर्ति नगर में सनातन धर्म उच्च माध्यमिक विद्यालय में हिंदी शिक्षक के रूप में काम किया।
प्राण शर्मा जी छोटी उम्र से ही कविता लिखने के शौकीन थे। तब वह भारतीय फ़िल्मी गीतों को अपने मनमौजी शब्दों के साथ बदलकर, पहले से मौजूद धुनों पर तुकबंदी किया करते थे। और इसी तरह उन्होंने कई रचनाएं लिखीं थीं। प्राण शर्मा जी ने बताया था कि किस तरह उनके प्रयासों को सराहा नहीं जाता था। उन्हें कहा गया था कि इस तरह की मनमौजी गीत सिर्फ एक नक़ल हैं और उन्हें अपने इस शौक को छोड़ देना चाहिए। प्राण शर्मा ने याद करते हुए बताया कि उस समय लेखन कुछ प्रसिद्ध व्यक्तियों से घिरा हुआ था वे लोग उनको काफी हतोत्साहित किया करते थे इसके बावजूद, उन्होंने लिखना नहीं छोड़ा और लगातार लिखते रहे। प्राण शर्मा जी ने आगे बताया कि उन्हें लगता था कि 16 साल की उम्र में, उनकी कविता परिपक्व होने लगी थी, हालांकि उनके दोस्त इससे सहमत नहीं थे और अभी भी उनका उपहास करते थे। वे उनकी कविता को "कूड़ा" कहा करते थे और सुझाव देते थे कि उन्हें कचरे के डिब्बे में फेंक देना चाहिए। हालाँकि उनके शब्द वो एक कान से सुनते और दूसरे के बाहर निकाल देते तब भी उनके दोस्तों का यह दृष्टिकोण उन्हें प्रभावित और परेशान तो करता ही था। उनका कहना था कि इतनी मेहनत से किया गया कोई काम, ऐसे कैसे कोई कूड़ेदान में फेंक सकता था।
इस दौरान, प्राण शर्मा को उनके आस-पास के लोगों की बहुत आलोचना का सामना करना पड़ा क्योंकि कोई भी उनकी रचनाओं को दुबारा पढ़ने या सुनने को तैयार नहीं होता था। वह अपने आपको हारा हुआ महसूस करने लगे थे। वह यह बताते हुए भावुक हो गए थे कि कैसे उन्हें लगता था कि वह अच्छा लिखते हैं पर उन्हें बजाय लिखने के, कंचों से खेलने की सलाह दी जाती। इसके अलावा उन्हें यह भी लगता कि स्थापित और प्रसिद्ध कवि इसलिए भी उन्हें हतोत्साहित करते थे क्योंकि वह उम्र में बहुत छोटे थे। उनके अनुसार शायरी उनके बस की बात ही नहीं थी।
इतनी आलोचनाओं के बाद, एक दिन वह एक कविता गुरू की तलाश में बाहर निकल गए और एक हिप्पी से दिखने वाले लड़के से टकरा गए। प्राण जी अतीत में खोये हुए से बोल रहे थे। वह अपने आप को कविता गुरू कहता था और मैं उसके जाल में फंस कर उसका शिष्य बन गया। परन्तु वह एक धोखेबाज निकला और एक बार एक प्रसिद्ध कविता को अपनी कह कर सुनाता हुआ पकड़ा गया। इस घटना ने प्राण शर्मा को अपराध बोध से भर दिया।
बाद में, उन्होंने पठानकोट में ग़ज़ल गाना शुरू किया, जहां एक साहित्यिक समूह भी था। तब वहाँ उनके एक नए दोस्त ने उन्हें कविता लिखना जारी रखने के लिए प्रोत्साहित किया। तब से, शर्मा जी ने सौ से अधिक लघु कथाएं और बारह लंबी कहानियां लिखी हैं। भले ही उनकी मातृभाषा पंजाबी थी, फिर भी वह हिंदी में लिखना पसंद करते थे और मुख्य रूप से उन्होंने हिन्दी में ही लिखा।
अपने 1965 में लन्दन आने के किस्से को भी प्राण शर्मा जी ने बड़े दिलचस्प अंदाज में बयाँ किया था। उन्होंने बताया कि उनका लन्दन आने का ऐसा कोई इरादा नहीं था। उन्होंने बताया कि एक ज्योतिषी उनकी पत्नी के पास आया था। उसने उसे बताया था कि उसे तो विदेश में रहना चाहिए था। अगले ही दिन, शर्मा जी के एक सहकर्मी ने अचानक उनसे पूछा कि क्या वह स्थायी रूप से इंग्लैंड जाकर रहना चाहते हैं और शर्मा ने हाँ कह दिया। प्राण जी के मुताबिक ज्योतिषी के शब्द सच साबित हुए थे।
स्वभाव से सहज और सरल प्राण शर्मा जी ने बताया कि उन्होंने प्रकाशित होने के लिए कभी कोई जुगाड़ आदि नहीं लगाया। यद्यपि उनकी तीन प्रकाशित पुस्तकें हैं जिसका श्रेय वह अपने अच्छे दोस्तों को देते हैं जिनसे वे इतने सालों में मिलते रहे।
प्राण शर्मा हमेशा युवा पीढ़ी के मददगार रहे। वह यथासंभव उनका मार्गदर्शन करते रहते थे। जब पिछले दिनों अचानक एक समारोह में उनसे भेंट हुई तो एकदम बच्चों की तरह चहककर उन्होंने हाथ मिलाया। हम पहली बार मिल रहे थे परन्तु अपनी अवस्था के बावजूद उन्होंने मुझे देखते ही झट से पहचान लिया था और बड़ी देर तक एक हाथ से अपनी लाठी और दूसरे हाथ से मेरा हाथ पकड़े, बड़े उत्साह से बातें करते रहे थे। मुझे यह देखकर प्रसन्नता हुई थी कि आखिरकार उनका घर से निकलकर आयोजनों में आना फिर से शुरू हो गया, ये कहाँ जानती थी कि वह पहली मुलाक़ात ही आखिरी मुलाक़ात होगी।

QUICKENQUIRY
Related & Similar Links
Copyright © 2016 - All Rights Reserved - Garbhanal - Version 19.09.26 Yellow Loop SysNano Infotech Structured Data Test ^