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तुम्हारी हिंदी हमारी मैथिली
01-Nov-2018 09:58 AM 1906     

मैथिलीभाषी समुदाय इन दिनों बहुत गुस्से में है। कुछ अरसा पहले बिहार में एक अख़बार ने मैथिली को बोली करार दिया। नतीजा यह हुआ कि उस अख़बार के कार्यक्रम के बहिष्कार की अपील की गई और जिन्होंने यह अपील नहीं मानी, उनके मुंह पर कालिख पोतने तक की कार्रवाई हुई। इस दौरान मैथिलीभाषियों ने हिंदी के साम्राज्यवाद की भी शिकायत की।
ऐसे मैथिली प्रेम पर क्या कहा जाए? यह सच है कि मैथिली में विद्यापति से नागार्जुन तक और बिल्कुल समकालीन लेखकों तक साहित्य की एक समृद्ध परंपरा रही है। लेकिन क्या बस इसी दर्प के सहारे मैथिली बोली या भाषा के रूप में अपनी हैसियत चाहती है?
भाषाशास्त्र के विद्वान बताते हैं कि उनके लिए बोलियों और भाषाओं में कोई अंतर नहीं होता। जिसमें भी अभिव्यक्ति संभव होती है, वह उनके लिए भाषा है। लेकिन बोली और भाषा का झगड़ा कहां से शुरू होता है? वह राजनीति और समाज में भाषाओं की हैसियत से शुरू होता है। यह अमूमन मान लिया जाता है कि भाषाओं की हैसियत बोलियों से बड़ी होती है। जिन लोगों को एक अख़बार में उनकी भाषा को बोली करार दिए जाने पर इतना दुख पहुंचा, उन्हें शायद मालूम नहीं है कि बिल्कुल हाल में केंद्र सरकार ने लोकसभा में एक प्रश्न का उत्तर देते हुए कहा कि मैथिली ज़्यादातर सिर्फ़ वाचिक परंपरा का हिस्सा रही है और लिपि के लिए वह कई और भाषाओं की तरह देवनागरी और कैथी पर निर्भर रही है। सरकार ने यह जानकारी लोकसभा सांसद कीर्ति आज़ाद के इस प्रश्न पर दी कि मैथिली की लिपि के विकास के लिए सरकार क्या कर रही है? सरकार ने कहा कि उसके पास ऐसी कोई योजना नहीं है। यही नहीं, कुछ साल पहले जब मीरा कुमार लोकसभा की अध्यक्ष थीं तब उन्होंने समस्तीपुर के एक कॉलेज के कार्यक्रम में इस बात पर दुख जताया कि बीते छह साल में बिहार से आए किसी भी सांसद ने मैथिली में बोलने का कष्ट नहीं किया।
जब सार्वजनिक दुनिया में मैथिली की यह हालत है तो क्या उसके कुछ भावुक लेखक मैथिली के नाम पर किसी के चेहरे पर कालिख पोत कर भाषा को बचा सकते हैं? इसमें शक नहीं कि लेखक भी भाषाओं को बचाते हैं। होमर ने लैटिन को बचाया है, कालिदास ने संस्कृत को, ग़ालिब और मीर ने उर्दू को और तुलसी और कबीर और सूर ने अवधी और ब्रज को बचाया है। लेकिन भाषाओं को उनकी असली हैसियत बाज़ार और राजनीति में उनकी ताकत से हासिल होती है- इस बात से हासिल होती है कि उनमें रोटी और रोजगार की कितनी गुंजाइश है, ज्ञान-विज्ञान के नए स्रोतों तक उनकी पहुंच कितनी है। हमारे देखते-देखते भाषा कही जाने वाली अवधी और ब्रज जैसी भाषाएं बोलियों में बदल गईं और खड़ी बोली कहलाने वाली हिंदी भाषा बन गई। लेकिन हिंदी भी अपने सारे भाषिक सामथ्र्य और भौगोलिक विस्तार के बावजूद बाकी दूसरी भाषाओं की तरह ही अंग्रेजी के सामने हाँफने को मजबूर है। क्योंकि अब सत्ता की भाषा अंग्रेज़ी है, वही रोटी, रोज़गार और सम्मान दिलाती है।
इतिहास बताता है कि दुनिया भर में जो देश मज़बूत हुए, उनकी भाषाओं की वैश्विक स्वीकृति बढ़ती गई। रूस सोवियत संघ के रूप में जब अपना बड़ा दखल रखता था तो रूसी बड़ी भाषा मानी जाती थी, जापान की हैसियत बड़ी थी तो जापानी की हैसियत बढ़ी, अब चीन का दौर है तो चीनी सीखने वाले बढ़ रहे हैं। पहले ब्रिटेन और अब अमेरिका के दबदबे ने अंग्रेजी का दबदबा बनाए रखा है। दुर्भाग्य से भारत के मज़बूत होने का मतलब अंग्रेज़ी का मज़बूत होना है। पहले अंग्रेजी के लेखक ख़ुद को इंडियन इंग्लिश लेखक मानते-बताते थे, अब वे इंडियन राइटर हो चुके हैं- भारतीय भाषाओं के लेखकों की हैसियत उनके नीचे की है।
इस परिदृश्य में मैथिली किसी के मुंह पर कालिख पोतने या नारे लगाने से नहीं बचेगी। हिंदी साम्राज्यवाद की सतही शिकायत से भी नहीं बचेगी। यह शिकायत कभी तमिल ने की और कभी बांग्ला ने, लेकिन हिंदी से इस टकराव का उन्हें कुछ हासिल नहीं हुआ, हिंदी को तो नुक़सान हुआ ही। दरअसल मैथिली तभी बचेगी जब हिंदी मज़बूत होगी और भारतीय भाषाओं का संसार बड़ा होगा।
लेकिन यह कैसे होगा? जो समाज मैथिली को लेकर इतना आंदोलित है, क्या उसे एहसास है कि भारत की नई पीढ़ी अपनी भाषिक जड़ों से कट कर अंग्रेज़ी की शरण में जा रही है? भारत का पूरा का पूरा मध्य वर्ग अपने पढ़ने-लिखने, सोचने-विचारने के लिए अंग्रेजी का इस्तेमाल कर रहा है। मैथिली घरों के बच्चे इसके अपवाद नहीं हैं। बिल्कुल नई पीढ़ियों में भोजपुरी, मगही, मैथिली का चलन ख़त्म होता जा रहा है। ख़ुद हिंदी भी अंग्रेज़ी के दबाव में इस तरह बदल रही है कि उसे ठीक से पहचानना मुश्किल होता जा रहा है। वह आधी अंग्रेज़ी हो चुकी है। उसमें जैसे नए शब्द गढ़ने का- किन्हीं शब्दों को अपने ढंग से बरतने का- आत्मविश्वास ख़त्म हो चुका है। जहां तक मैथिली का सवाल है, उसे बोली बता देने भर से उत्तेजित हो जाने वाले लोग भाषाओं के इस पराभव पर भी चिंतित और परेशान हों तो कुछ बात बने। मैथिली निस्संदेह एक समृद्ध भाषा है जिसमें साहित्य और संवाद की परंपरा पुरानी है- लेकिन यह उद्धत मैथिलवाद इस परंपरा को ताकत देने की जगह कमज़ोर ही करेगा, उसे मखौल के लायक ही छोड़ेगा। कई हिंदीवीरों की वजह से हिंदी में जो कातरता दिखाई पड़ती है, कहीं कुछ मैथिलीवीरों की वजह से वह मैथिल तक भी न चली आए। वैसे भी हिंदी और मैथिली कई लिहाज से सहोदरा भाषाएं हैं और कमोबेश उपेक्षा की एक-सी नीति की शिकार भी।

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