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यादों के पार
01-Oct-2017 03:21 PM 1502     

एक सुवासित परिचित झोंका
आ कर मुझे निहाल कर गया
कस्तूरी सा उच्छवास वह
दग्ध हृदय को सिक्त कर गया।

इतने दिन मैं सब से छुप कर
यह संदूक भरा करती थी
अब बस शायद यही मेरा था
मैं इन सब के बीच कहाँ थी?

इक छोटा सा दर्पण भी था
जिसमें मेरा बिम्ब दिख गया
भरा सलवटों वाला चेहरा
फिर मुझको पहचान दे गया।

कितने बरस फिसल हाथों से
जहाँ-तहाँ सब व्यर्थ हो गये
कुछ क्षण जो थे बेशक़ीमती
इस बक्से में क़ैद हो गये।

पड़ी धूप सब ताज़ा हो कर
अपनी बात लगे दोहराने
इसकी-उसकी सुनते सुनते
मन का आँगन लगा महकने।

इन सब से जो डोर बंधी थी
मुझमें उसकी कोर दबी थी
और कौन इसको समझेगा?
हर नाते की अलग कड़ी थी।

जल्दी से सब कुछ समेट कर
बन्द कर दिया वापस फिर से
कहीं कोई कुछ पूँछ न बैठे
नम पलकें पोंछी आँचल से।

आज सुनहरी धूप देख कर
यादों की सन्दूक खोल कर
सोचा थोड़ी धूप दिखा दूँ
उलट पलट तह नयी लगा दूँ।

लम्हा-लम्हा निकल निकल कर
मुझे ले गया उन गलियों में
जिन को मैं बिसरा बैठी थी
या फिर कहीं दबा बैठी थी।

कुछ रेशम के बूटे से थे
कहीं-कहीं कुछ उधड़ गये थे
कुछ में जड़े सितारे-सलमें
अब भी वैसे चमक रहे थे।

कुछ गिरहें थी उलझी-उलझी
देख जिन्हें मन दुखी हो गया
कुछ नाज़ुक सी वो डोरें थीं
जिनको बुनना शेष रह गया।

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