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याद रहेंगे प्राण शर्मा
01-Jun-2018 03:19 PM 1914     

प्राण शर्मा के कृतित्व को अगर समग्रता में देखें तो उसका मूल इंसानी रिश्तों की पड़ताल है। उनकी कृतियों से ज़ाहिर होता है कि इस पड़ताल की शुरूआत वह अपने आप से करते हैं।
ख़ामोशियाँ भी चाहिए कुछ तो कभी कभी
सीखा हूँ एक बात ये भी ज़िन्दगी से मैं
ललत (ललित) जी, क्या हाल है, गहरे पंजाबी लहजे में गरजती हुई ये आवाज अब शान्त हो गई है। हर दस- पंद्रह दिनों में टेलीफ़ोन पर प्राण शर्मा जी की यह गहरी आवाज़ पास बैठे घर के अन्य सदस्य भी सुन सकते थे। उनकी पत्नी पुष्पा जी ने बताया कि प्राण जी गाते भी थे, बहुत सुन्दर।
एक इंसान जिसका स्वर इतना कड़क हो उसका हृदय कितना निर्मल हो सकता है, प्राण शर्मा इसकी मिसाल थे। मैं कहना यह चाहता हूँ कि प्राण शर्मा एक बड़े लेखक थे या बड़े इंसान यह बता पाना आसान नहीं।
मौजूदा दौर के गत छह वर्षों में ब्रिटेन के साहित्यिक पटल से गौतम सचदेव, सत्येंन्द्र श्रीवास्तव और अब प्राण शर्मा का चला जाना ब्रिटेन में हिन्दी की बयार का थम जाना है। इस शून्य को भरने में समय लगेगा।
गौतम सचदेव की ताक़त उनकी कहानियों में थी, जबकि सत्येंन्द्र श्रीवास्तव की आत्मा उनकी कविताओं में। इस क्रम में प्राण शर्मा ब्रिटेन में हिन्दी के तीसरे बड़े स्तंभ थे जिनका अनूठा शिल्प उनकी ग़ज़लों में था। उन्होंने न केवल हिन्दी ग़ज़ल को नई ऊँचाई दी, बल्कि जिसने भी उनके दरवाज़े पर दस्तक दी उसे लिखना सिखाया।
मेरा सौभाग्य है कि मेरी अंतरंगता तीनों से थी। मुझे याद आता है कि वर्षों तक यूके हिन्दी समिति के संपादक और कवि पदमेश गुप्त की "पुरवाई" पत्रिका का हर अंक प्राण शर्मा की लेखनी से रंगा रहता था।
प्राण जी को पुरवाई पत्रिका से असीम प्रेम था। वे पुरवाई को शब्दश: पढ़ते, फिर घंटों मुझसे विस्तार से चर्चा करते। उनके अन्य लेखों और गजलों के अलावा स्थायी स्तम्भ "खेल निराले दुनिया में" काफ़ी लोकप्रिय हुआ।
प्राण शर्मा जी एक गम्भीर साहित्यकार होने के साथ-साथ अत्यंत गम्भीर पाठक भी थे। अपनी हर छोटी बड़ी बात को बड़ी ईमानदारी से कहने की हिम्मत, सही ग़लत की परख और नि:स्वार्थ भाव से साहित्य सेवा में प्राण जी का कोई मुक़ाबला नहीं। अपने लेखक मित्रों को शुभकामना और उनकी उपलब्धियों पर बधाई देने से कभी ना चूकने वाले प्राण जी को ब्रिटेन की हिंदी सदैव याद करेगी! बेइंतिहा सादगी के साथ पाठकों के हृदय में गहरे उतर जाना प्राण शर्मा की ग़ज़लों की सबसे बड़ी ख़ूबी थी। यही सादगी उनके जीवन में भी थी। पिछले पाँच-छह वर्षों से उनका मेरे साथ विशेष तादात्म्य हो गया था। जब भी कुछ लिखते मुझे ईमेल करते। मेरे लिए यह सम्मान की बात थी।
28 दिसम्बर 2017 का उनका अंतिम ईमेल आज भी इनबॉक्स में है। "प्रिय ललित जी, नूतन वर्ष आप सब के लिए लालित्य भरा हो। शुभकामनाएं।" 14 नवम्बर 1966 को जब उन्होंने पहली बार लंदन की धरती पर क़दम रखा तो मन में शिक्षक बनने का स्वप्न था। पर परिस्थितियों ने कावेन्ट्री में बसा दिया और आजीविका के लिए कोई डेढ़ दशक तक बस कंडक्टरी की। फिर केवल स्वाध्याय और स्वान्त: सुखाय लेखन। भौतिकता की धारा में न बहने के लिए बहुत साहस चाहिये जो प्राण जी में था।
अपने देश छोड़कर ब्रिटन आ जाने, न लौट पाने और अपनी ज़ुबान से कट जाने का दर्द उनके भीतर बराबर बना रहा।
कहीं धरती खुले नीले गगन को छोड़ आया हूँ
कि कुछ सिक्कों की ख़ातिर मैं वतन को छोड़ आया हूँ
कहाँ होती है कोई मीठी बोली अपनी बोली सी
मगर मैं "प्राण" हिन्दी की फबन को छोड़ आया हूँ
प्राण शर्मा के कृतित्व को अगर समग्रता में देखें तो उसका मूल इंसानी रिश्तों की पड़ताल है। उनकी कृतियों से ज़ाहिर होता है कि इस पड़ताल की शुरूआत वह अपने आप से करते हैं।
ज़िन्दगी को ढूँढने निकला हूँ मैं
ज़िन्दगी से कितना बेख़बर हूँ मैं
प्राण आता है मज़ा ये देखकर तुमको
जब तुम्हारी ख़ुद की ख़ुद से बात होती है
प्राण शर्मा को पढ़ने से महसूस होता है कि वे मानवीय प्रेम को सामाजिक सौहाद्र्र की धुरी मानते थे। यानी समाज में जो घटित हो रहा है उसकी शुरूआत हमसे होती है।
एक दिन लोग ख़ुद ही बदलेंगे
पहले ख़ुद को बदल कभी प्यारे
रोशनी आये तो आये कैसे घर में
दिन भर भी हर खिड़की पर परदा है प्यारे
प्राण शर्मा की शायरी साम्प्रदायिक हिंसा और आम जनता के उत्पीड़न को गहराई से रेखांकित करती है। ऐसी ग़ज़लों में भारत के विभाजन की त्रासदी से लेकर आज तक की साम्प्रदायिक त्रासदियों के बिम्ब देखे जा सकते हैं।
उठ रही हैं आग की लपटें
बेबसों के घर जले होंगे
पुरवाइयों में कुछ इधर कुछ उधर गये
पेड़ों से टूटकर कई पत्ते बिखर गये
ग़ज़ल के अलावा प्राण जी ने सौ से अधिक लघुकथायें लिखीं। उनकी प्रकाशित कृतियों में "सुराही" और "ग़ज़ल कहता हूँ" के अलावा एक लघुकथा संकलन "पराया देश" भी है। मातृ भाषा पंजाबी होने के बावजूद उन्होंने अपना अधिकांश लेखन हिन्दी में किया।
प्राण जी के भीतर का रचनाकार किस तरह उनकी सदाशयता और विनम्रता के पीछे छिपा था इसका ज़िक्र ब्रिटेन की हिन्दी कवियत्री और कहानीकार दिव्या माथुर करती हैं।
"वह इतने सज्जन पुरुष थे कि जब मेरे एक प्रकाशक ने उनके द्वारा रचित आमुख को मेरे कविता संग्रह में शामिल नहीं किया तो वह बोले, ऐसा हो जाता है, नाममात्र को भी नाराज़गी प्रकट नहीं की। ब्रिटेन के कई लेखकों की उन्होंने बिन-मांगे मदद की, हिदायत दी और उनकी कविताओं को सुधारा भी।"
समय-समय पर प्राण जी ब्रितानी साहित्यकारों के निहित स्वार्थ और राजनैतिक घटकों के भी शिकार रहे पर उन्होंने कभी भी किसी की संकीर्णता को अपनी सदाशयता, समझदारी और बड़प्पन से ऊँचा नहीं होने दिया।
कौन है दोस्त है सवाल मेरा
कौन दुश्मन है ये सवाल नहीं
उसको क्या ख़ौफ़ है ज़माने का
साफ़ जिसका ज़मीर होता है
"ग़ज़ल कहता हूँ" के प्राक्कथन में डॉ. कुँअर बैचेन, प्राण शर्मा को "मानवतावादी कवि" का ख़िताब देते हैं। "मानवता स्वयं में एक धर्म है जो सारे मज़हबों से ऊपर है। प्राण शर्मा अंग्रेज़ी की कहावत "ग़लती करना इंसान का स्वभाव है" के मर्म को अपने माध्यम से चरितार्थ करने का साहस रखते हैं।"
मैं कोई देवता नहीं यारों
आदमी हूँ गुनाह करता हूँ
प्राण शर्मा की सादगी, सहजता और मस्ती उनके अन्तद्र्वन्द्व, आन्तरिक पीड़ा, प्रेम और भावुकता के ज्वार को छिपाकर रखती थी जो कि उनकी कृतियों में मुखर होती थी।
सोच की भट्टी में सौ-सौ बार दहता है
तब कहीं जाकर कोई एक शेर कहता है।

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