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विष्णु खरे का जाना
01-Oct-2018 07:30 PM 1515     

विश्व साहित्य को हिन्दी में अनूदित करने वाली एक ख़ास शख्सियत के जाने से अनुवाद की दुनिया को जो नुकसान हुआ है उसकी भरपाई में बहुत समय लगेगा। अगर सिर्फ जर्मन-भाषी साहित्य की बात करें तो उस प्रदेश के कुछ नामचीन साहित्यकारों से परिचित कराने या फिर उस परिचय को और गहरा कराने का श्रेय विष्णु खरे को जाता है। चाहे बात योहान वॉल्फ़गांग फॉन गोएथे की हो या फिर ग्युन्टर ग्रास या बेर्तोल्ट ब्रेख्त की, बात यही सामने आती है कि इन्होंने विभिन्न विधाओं की कृतियों का अनुवाद किया।
हालाँकि यह माना जाता है कि किसी अच्छे अनुवादक को मूल भाषा का गहरा ज्ञान होना चाहिए और विष्णु खरे खुद भी स्वीकार करते थे कि उनका भाषा ज्ञान उस स्तर का नहीं था। पर उनके पास जो था और जो किसी अनुवाद को बेहतरीन बनाता है वह है विश्व साहित्य का परिपूर्ण ज्ञान और हिन्दी भाषा और साहित्य पर बेजोड़ इख़्तियार। अक्सर यह देखने को मिलता है कि अनुवाद करते समय आप बिना किसी से वास्ता रखे, एकांत में अपने काम में लिप्त रहते हैं मगर जहाँ तक बात खरे जी के अनुवाद कर्म की है तो उन्होंने देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों के जर्मन भाषा, साहित्य और संस्कृति विभागों से संवाद जारी रखा, यहाँ तक कि चाहे उन्हें अपने अनुवाद के बारे में तीखी प्रतिक्रियाएं भी मिली हों तब भी उन्होंने तर्कों के बल पर उनका सामना किया और आगे भी विभागों से आमना सामना जारी रखा। कुछ वर्षों पहले मुम्बई विश्विद्यालय में ग्युन्टर ग्रास पर एक सम्मलेन आयोजित हुआ था यहाँ भी इन्होंने अपने अनुवाद के बारे में विस्तार से चर्चा की और इससे यही बात सामने आई कि वे अनुवाद के बारे में बहुत गहराई से सोचते थे।
गोएथे के फाउस्ट का एक अनुवाद 1939 में प्रकाशित हुआ था और विष्णु खरे ने अपने अनुवाद में इसके बारे में लिखा है और जिस तरीके से लिखा है उससे एक तरफ अपने सहयोगियों के प्रति उनकी विनम्रता देखने को मिलती है। लेकिन दूसरी तरफ हम उनके तीखे तेवर से भी रूबरू होते हैं खासतौर से जब वे इस बात पर रोष प्रकट करते हैं कि विदेशी भाषाओं से जो अनुवाद होते हैं उनके अनुवादकों का लक्ष्य भाषा और साहित्य का ज्ञान अल्प होता है। बहरहाल यहाँ हमारा इससे वास्ता नहीं है कि इस दावे में कहाँ तक दम है बल्कि इससे कि अनुवाद को लेकर वे चिन्तित थे और इसे उजागर करते थे और इसके बारे में अपनी राय रखने में हिचकते नहीं थे। चाहे उनके कथन विवादास्पद ही क्यों न हों। मसलन अनुवाद के सिद्धांतों को लेकर उनका स्पष्ट रूप से मानना था कि हर समर्पित अनुवादक जानता है कि एक सीमा के बाद, जो बहुत जल्दी आ जाती है, अनुवाद की प्रक्रिया में सिद्धांत कोई बड़ा काम नहीं कर पातेे।
लेकिन अनुवाद के एक बड़े सिद्धांत को वे खुद भी नहीं छोड़ पाए कि अनुवाद एक साझेदारी है और उन्होंने अपने अनुवाद को भारतीय गोएथे समिति में प्रस्तुत किया और वहाँ मिले सुझावों को यथासंभव समाहित भी किया। इस कृति के अनुवाद के लिए उन्हें कम से कम दस बरस का समय लगा और इसी से हम समझ सकते हैं कि अनुवाद कर्म को लेकर इनमें अत्यंत समर्पण की भावना थी। हालाँकि यहाँ यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि उनका समर्पण वैसा नहीं था कि वे मूल और अनुवाद को लेकर किसी हीनग्रंथि से पीड़ित रहे हों। उनका तो यह योगदान था कि वे अनुवाद को लेकर सदा तत्पर रहे और समय-समय पर अपने देश के पाठकों को अनुवाद के जरिये दूसरे देशों और भाषाओं के साहित्य से परिचित कराते रहे।

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