ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
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शिक्षकीय दुनिया की कहानी के पात्र
एक सम्वाद के अंश : "इक्कीस साल के बाद पहली बार किसी कार्यशाला में बैठा हूं। बहुत अच्छा लग रहा है। वरना तो जी कार्यशाला में पढ़ाने वाले घंटे का तीन-तीन हज़ार लेकर चुटकुलों के सहारे या फिर अपनी अपनी कहानी सुनाकर चले जाते हैं। हमारा समय भी ख़राब होता है...
भारत में ज्ञान और शिक्षा की विफलताएं
जयपुर के विनोद भारद्वाज जी ने गालिब की बेहतरीन जीवनी लिखी है, आत्मकथात्मक शैली में। यह इस वर्ष के अंत तक संवाद से प्रकाशित होने वाली है। इस पर विस्तार से चर्चा बाद में। फिलहाल इसका संपादन करते हुए जहां रुका हूं, वह मिर्जा गालिब की 1826 में की गई क...
महात्मा गांधी का भाषा चिन्तन
महात्मा गांधी अपनी प्रकृति में आदर्शवादी पर अपने चिन्तन में व्यावहारिक थे। इसलिए उन्हें एक व्यावहारिक चिन्तक और विचारक माना जा सकता है। उनके आदर्श थे स्वराज्य, समतामूलक समाज, सादा जीवन, घरेलू उद्योगों का विस्तार, जिसे स्वदेशी आन्दोलन के दौरान बल म...
गांधी और भारतीयता के प्रश्न
उन्नीस सौ नौ में गांधी ने एक महत्वपूर्ण कथन अपनी गुजराती में लिखी पुस्तिका "हिन्द स्वराज" में किया था कि अंग्रेज भी चाहें तो वे यहां रह सकते हैं, शर्त केवल एक है कि उन्हें अपनी अंग्रेजियत छोड़नी होगी। इसी पुस्तिका में उन्होंने यह भी कहा कि पाश्चात्...
कार्यस्थल पर गांधी
"जब मैं निराश होता हूं, और मनन करता हूं तो पाता हूं कि इतिहास में अंततः सत्य और प्रेम की विजय होती है।" गांधी के इस सूत्र को सत्य मान लेने का लाभ है कि बदलाव की संभावना और आशावादिता बनी रहती है। आज के दौर में राजनीति, समाज, शिक्...
गाँधी और उनके आलोचक
गाँधी, दुनिया के उन बिरले लोगों में हैं जिन पर सबसे ज्यादा जीवनियाँ लिखी गयी हैं। एक अनुमान के अनुसार करीब दो सौ जिनमें आधे से ज्यादा दुनियाभर के प्रतिष्ठित लेखकों, पत्रकारों द्वारा लिखी गयी हैं। हिन्दुस्तान में यह सम्मान अन्य किसी को प्राप्त नहीं...
आषाढ़ का एक दिन तर्क और दीवानगी के बीच का संवाद
मणिकौल (1944-2011) का सिनेमाई सफ़र चेतना के आंकड़ों के विरुद्ध का सफ़र है। इक्कीसवीं सदी का यह दूसरा दशक जब लगभग ख़त्म हुआ चाहता है और भारत में धर्म और आस्था अपनी नई परिभाषाओं में आकार ग्रहण करती हुई मौजूद होती जा रही है, जहाँ आंकड़ों की भयावहता एक "नय...
सुसंस्कार की कठिन डगर पर...
भारतीय संस्कृति की चर्चा हम सब आए दिन सुनते रहते हैं। कभी मंचों से, तो कभी चाय-वार्ताओं में या घरों की बैठक में। किन्तु दुर्भाग्य यह है कि हममें से अधिकांश यह नहीं जानते कि हमारी संस्कृति क्या है। इस अज्ञान के पीछे, हमारी सोच की जड़ों में बैठा वह न...
काल-चेतना और साहित्य
पश्चिम की दुनिया में परम्परा के प्रति तीव्र असंतोष के अपने ऐतिहासिक कारण हैं परंतु भारत की स्थिति भिन्न है। अंग्रेज़ी राज एक विजयी संस्कृति को व्यक्त करता था, अंग्रेज़ी शिक्षा ने हमारे मनोभाव को बदला, हम पिछड़े देश, विकासशील देश और ...
तुम ही ज़रा पहल कर देखो
जीवन में बहुत बार ऐसा होता है कि बात बहुत छोटी होती है लेकिन वह व्यक्ति की अकड़ और अहंकार से बहुत बड़ी हो जाती है। बहुत बार हमारे मन में यह बात आती है कि आगे बढ़कर शुरुआत करें लेकिन हम दूसरे पक्ष द्वारा पहल किए जाने का इंतज़ार करते रह जाते हैं और समय ...
बिहारी शब्दकोष
आरकुट पर बिहारी कम्युनिटी पर एक पोस्ट में एक्सक्लुसिव बिहारी शब्द सुझाने को कहा गया था। मतलब ऐसे शब्द या वाक्य जो सिर्फ़ बिहार में बोली और समझी जाती है। कुछ शब्द वहीं से कंट्रोल सी कर लिया और कुछ को स्वयं अपने मेमोरी से जोड़ा। और तैयार हो गया यह मिन...
तुम्हारी हिंदी हमारी मैथिली
मैथिलीभाषी समुदाय इन दिनों बहुत गुस्से में है। कुछ अरसा पहले बिहार में एक अख़बार ने मैथिली को बोली करार दिया। नतीजा यह हुआ कि उस अख़बार के कार्यक्रम के बहिष्कार की अपील की गई और जिन्होंने यह अपील नहीं मानी, उनके मुंह पर कालिख पोतने तक की कार्रवाई हु...
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