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वाल्मीकि रामायण : आधुनिक विमर्श-24 दूत हनुमान : भाग-3
01-Dec-2018 06:54 PM 2144     

एक संदेशवाहक का मुख्य उद्देश्य सन्देश को सही व्यक्ति तक सही तरीके से सही समय पर पहुँचाना होता है। वह सन्देश पाने वाले को भलीभाँति पहचान कर ही सन्देश देता है। कुछ खास परिस्थितियों में पहचान करने में अत्यंत विश्लेषण व सावधानी की ज़रूरत होती है। हनुमान ने सोचा कि उन्होंने सन्देश प्राप्तकर्ता को चिह्नित कर लिया है, पर फिर उन्होंने राम के द्वारा निशानी के रूप में दी गयी अँगूठी को संदेश प्राप्तकर्ता को देने से पहले पूरी तरह से अपने आपको आश्वस्त करना चाहा। सन्देश वाहक को संवाद और प्रतिक्रियाओं का पूरी तरह से अवलोकन करने की आवश्यकता होती है ताकि सन्देश के उद्देश्य में कोई भ्रम न हो।
एक बंधक बनाई हुई स्त्री को पहचानने और सन्देश पहुँचाने के लिये तकनीकि और कौशल की आवश्यकता होती है। बंधक स्वाभाविक रूप से भ्रमित और डरा हुआ होता है। अधिकाँशतः अविश्वास की संभावना ज्यादा होती है, क्योंकि मनोदशा में अपराध बोध एवं अनुताप प्रबल होता है। सीता ने यह सत्य स्वीकार कर लिया था कि उसका भविष्य अनिश्चित है, क्योंकि उसे एक अत्यंत दुर्गम और अगम्य स्थान पर लाया गया है। दस माह तो गुजर ही चुके थे और शेष दो माह में किस्मत के साथ देने की आशा बहुत कम ही थी। तब अचानक वहाँ एक वानर का पहुँचना जो कई सारे प्रश्न पूछ रहा था। वानर को सीता की पृष्ठभूमि के बारे में जानकारी थी। एक असहाय व्यक्ति के लिए थोड़ी सी उम्मीद भी एक नया अहसास लेकर आती है! सीता ने सोचा कि या तो यह एक नई आशा की कोई किरण है या मायावी दुश्मन की कोई नई चाल?
हनुमान को ऐसे कठिन कार्य के लिए अति धैर्यवान, उदार और सहानुभूतिशील होने जरूरत थी। हनुमान ने पूछा-
"आप वह सीता हैं जिसको जनस्थान से रावण ने छल और बल से हरण कर लिया था?"
हनुमान ने सीधा प्रासांगिक प्रश्न किया। सीता ने कुछ समय पहले ही इस वानर को अपने पति राम की स्तुति करते हुए सुना था। सीता के अंतर्मन में इस वानर के बर्ताव में एक सत्यता दिखाई दी और उसका झुकाव उसके प्रश्न का उत्तर देने की तरफ हुआ। उसने वानर को अपनी पूरी व्यथा सुनाई। हनुमान ने अपनी बुद्धिमत्ता से परिस्थिति का अध्ययन किया और सीता से बड़ी ही सूझबूझ से बातचीत की। सीता ने भी अपने जीवन की सभी घटनाओं के बारे में बताया।
सीता के मार्मिक वर्णन ने हनुमान को उसे सांत्वना देने के लिए प्रेरित किया। "मैं राम का दूत हूँ और उनके आदेश से यहाँ आया हूँ। प्रतिभाशाली राम ने अपनी कुशलता का सन्देश आप के लिए भेजा है।" राम के नाम को दुहराते हुए उन्होंने कहा- "गौरवशाली, अस्त्र-शस्त्र विद्या के धनी और वेदों के ज्ञाता राम ने आपके के लिए अपनी कुशलता का सन्देश भेजा है!" और आगे वह कहने लगे- "शोक संतृप्त राम के अनुगामी लक्ष्मण ने शीश झुकाकर आदरपूर्वक आपको अभिवादन सन्देश भेजा है।" इस संदेश को सुनाने की तकनीकि अत्यंत निष्कपट और भाव यथार्थपूर्ण था। शायद वाल्मीकि ने मनोविज्ञान का अध्ययन किया था! वह किसी की मनोदशा का बड़ी बखूबी से वर्णन करते हैं। हनुमान के ढ़ाँढस के शब्दों ने सीता के मन को प्रसन्नचित्त किया।
बंधक का जीवन हमेशा ही भय पूर्ण होता है। सीता के मन में कई विचार आये। "मैं एक वानर का विश्वास क्यों करूँ? क्या मैं एक स्वप्न देख रही हूँ? क्या यह एक भ्रम है?" उसके बाद सीता जोर-जोर से बोलने लगी- "यदि तुम राम के दूत हो तो उनके बारे में बताओ, उनके गुणों के बारे, उनके कार्यों का वर्णन करो।" हनुमान ने उत्तर में राम के बारे में गर्मजोशी से वर्णन किया। उन्होंने हरण की घटना के बारे में बताया और पूरे विश्वास के साथ बदले की घोषणा की और कहा- "मैं राम के मित्र वानर राज सुग्रीव का मंत्री हूँ। लाखों वानर जल्दी ही लंका पर अपना कब्ज़ा कर लेंगे।" उसके बाद हनुमान ने सीता को आश्वासन दिया कि "मैं वो नहीं हूँ जो आप समझ रही हो! मैं अपने बल और साहस से आपके पास आया हूँ। आप कृपया मेरी नादानियों को माफ़ करें और मेरा विश्वास करें!"
सीता भरोसा करना चाहती हैं पर कहानी पूरी तरह विश्वसनीय नहीं दिखती। बुद्धिमान और विश्लेषक सीता ने प्रश्नों की झड़ी लगा दी। "तुम्हारा राम से सानिध्य कैसे हुआ? मानव और वानर की यह कैसी अजीब-सी मित्रता है?" हनुमान की सत्यता की जाँच करने के लिए सीता ने उनसे राम और लक्ष्मण के बारे में बताने को कहा कि वह कैसे दिखते हैं? हनुमान ने धैर्य के साथ राम की शारीरिक संरचना जैसे, उनकी आँखें, चेहरा, नाक, कान, ओंठ, भुजा, गर्दन, छाती और जाँघें और उनकी आवाज के बारे में विस्तृत वर्णन किया। उसके बाद उसने लक्ष्मण के बारे में बताया और कहा कि वह राम के प्रतिरूप हैं।
हनुमान ने आगे राम और सुग्रीव की "रिष्यमूक" पर्वत पर हुई मुलाकात और राम का सीता के वायुयान से गिरे आभूषणों को देखकर विलाप करने की घटनाओं के बारे में बताया। हनुमान ने सुग्रीव की पूरी कहानी सुनाई। उन्होंने वानरों के खोज अभियान और समुद्र पार कर उनसे मिलने के बारे में वृत्तांत बताकर अपने वर्णन को समाप्त किया।
उन्होंने सीता को पुनः भरोसा दिलाया कि "वह यहाँ सुग्रीव के आदेश के तहत आये हैं!" आत्मविश्वास दिखलाते हुये बोले "मैंने यहाँ पहुँचकर प्रतिष्ठा हासिल कर ली है। राम जल्दी ही यहाँ आयेंगे। वह रावण और उसके दल का सर्वनाश कर आपको मुक्त करायेंगे!" बातचीत करते हुये उन्होंने अपने वानर गुणों के बारे में बताया "मेरे पिता केसरी ने शाम्बसादन नाम के बड़े राक्षस का वध किया था जो वन में तपस्वियों को प्राय: परेशान करता था, एक तपस्वी ने प्रसन्न होकर मेरी माँ को आशीर्वाद दिया कि उनके वायुदेव की कृपा से एक पुत्र पैदा होगा। इसलिए शायद मुझमें बल और वायु जैसी शक्ति है।"
जब धीरे-धीरे हनुमान और सीता एक दूसरे की पहचान से पूरी तरह आश्वस्त हो गए तब हनुमान ने राम के द्वारा निशानी के रूप में दी गयी अँगूठी को सीता को सौंपा। "मैं एक वानर हूँ पर राम ने मेरी बुद्धिमत्ता के कारण ही एक दूत के रूप में मुझे चुना। कृपया इस मुदरी को देखो इस पर राम नाम अंकित है!" सीता बड़ी आश्चर्यचकित और अति प्रसन्न हुई। उसने राम की अँगूठी सहर्ष स्वीकार की। उसका चेहरा उन मीठी स्मृतियों को याद कर खिल उठा। उसने हनुमान की बहुत प्रशंसा की "तुम एक नायक हो, तुम सुयोग्य हो, वास्तव में तुम एक विद्वान हो! मुझे मालूम है कि राम बिना परीक्षा लिए किसी को मेरे पास नहीं भेजेगें!"
सीता की ऐसी मनोदशा को दर्शाना अति कठिन कार्य है, वह अति विषम परिस्थिति, निराशा और अकेलेपन में अपने आपको सँभालती है। एक दूत की सफलता तभी मानी जाती है जब सन्देश का प्रभाव अपेक्षानुसार हो। लेकिन तुरंत सीता विलाप करने लगाती है- "राम अपने क्रोध से पूरी धरती को राख में बदल सकते हैं, फिर वह अपने प्रकोप से इस छोटे से द्वीप को क्यों भस्म नहीं कर देते। मेरी मुक्ति का समय कब आएगा?"
सीता हनुमान से एक मित्र की तरह व्यवहार करने लगी। सीता अपने घर व परिवार को बहुत गहरे ध्यान से याद करने लगी। हनुमान अपने आपको स्वीकार्य स्थिति में पाकर अति हर्षित थे, उसने सीता का विश्वास हासिल कर लिया था। हनुमान सीता को बार-बार सांत्वना दे रहे थे और कह रहे थे कि आपकी मुक्ति निश्चित है। "राम निद्रा में भी जगे रहते हैं, वह हमेशा बहुत ही शोकमय रहते हैं। वह जब भी उठते हैं तो आपका ही नाम लेते है।" हनुमान के ये सांत्वना के शब्द थे, उस एक व्यथित नारी के लिए। कुछ समय शाँत रहने के बाद सीता तुरंत ही पुनः अपनी व्यथा की स्थिति में पहुँच जाती थी। वह याद दिलाती थी कि "मेरे जीने के लिए केवल दो मास का समय बचा है। राम को जल्दी ही कुछ करना होगा!"
सीता ने अपने अंदर की भावनाओं को उजागर किया। "क्या मेरे पति को मेरी पवित्रता पर संदेह है क्योंकि मेरा हरण हुआ है? नहीं, ऐसा नहीं हो सकता! मेरा दिला साफ है और राम गुणी हैं, वह मुझे फिर से स्वीकार करेंगे। उन्होंने स्वयं ही मेरी रक्षा के लिए चौदह हजार राक्षसों का वध किया था। वह शूरवीर हैं, वह सूर्य के समान हैं, जो राक्षसों के समुद्र को भी सुखा सकते है!" हनुमान सीता के अंदर के द्वन्द्व को निस्तब्ध होकर सुन रहे थे।
व्यथा के ऐसे शब्द सुनकर दूत हनुमान के अंदर से एक राहतकर्ता का स्वरूप प्रकट होने लगा। एक सन्देशवाहक से एक नजदीक सहयोगी की भूमिका, जिम्मेदारी में एक बड़ा उछाल था। अब उनके ऊपर वह सब कार्य करने की जिम्मेदारी आ गयी थी जो कि राम को करना था। हनुमान को अपनी सीमायें पता थी लेकिन सीता की व्यथित दशा को ठीक करने के लिए इस समय राहत की ज़रूरत थी। साधारण परिस्थिति में यह एक दुःसाहसी कदम था। लेकिन हनुमान ने अपना साहस दिखाया। उन्होंने गर्व के साथ कहा- "मैं आपको आज ही इस जगह से मुक्त करुँगा। कृपया आप मेरी पीठ पर बैठ जाइये। मैं आपको पीठ पर बिठाकर समुद्र को तैरकर पार कर सकता हूँ। अगर मैं चाहूँ तो रावण सहित पूरी लंका को अपनी पीठ पर ले जा सकता हूँ!"
क्या कोई परेशानी में फँसा हुआ व्यक्ति ऐसी बड़ी-बड़ी बातों पर विश्वास करेगा? शायद सीता इस तरह से साथ जाने को तैयार नहीं हुई होगी। उसने हँसकर कहा "शायद तुम्हारा वानर वाला स्वभाव दिखाई दे रहा है!" हनुमान ने हार नहीं मानी। उसने मन ही मन सोचा "शायद सीता को मेरी वास्तविक शक्ति ज्ञात नहीं है!" जमीन पर लोटते हुए हनुमान ने अपने शरीर को बहुत वृहद बना लिया, बड़ा जबड़ा, बड़े और पैने दाँत, बड़े-बड़े नाख़ून और अति विशाल उदर। एक बड़ा वानर कार्य के लिए तैयार है! हनुमान अनुनय के साथ बोले "मुझे देखो! मैं पूरी लंका को अपनी पीठ पर ले जा सकता हूँ।"
एक हताश व्यक्ति जीवन और मृत्यु के बीच के खतरे भलीभाँति जानता है। सीता को हनुमान का नया स्वरूप इस वृहद कार्य के उपयुक्त नहीं लगा। उसने किसी तरह से हनुमान के अनुनय से बचने की सोची और अंत में उसने यह बोलकर हनुमान को समझाया कि "आपके आग्रह के लिए क्षमा चाहती हूँ, मैं किसी के शरीर को नहीं छूना चाहती! कृपया इसे आप अन्यथा न समझें!" सन्दर्भ को आगे बढ़ाते हुए वह बोली "हरण करते समय रावण ने तो बलपूर्वक मुझे उठा लिया था। मैं तो उस समय असहाय थी!" अपना पक्ष रखते हुए वह आगे बोली "उचित यही होगा कि राम स्वयं आकर मुझे मुक्त करायें और साथ ले जायें।"
यह स्पष्ट नहीं है कि सीता को पीठ पर बैठाकर ले जाने की हनुमान की योजना इसलिए थी ताकि वह अपने वानर मित्रों को अपनी शक्ति और कौशल दिखा सके और राम को इस विशेष कार्य की पूर्ण सफलता का समाचार दे सके। उसको यह सोचने की ज़रूरत थी कि वह यह कैसे सिद्ध करे कि उसने सीता का पता लगा लिया और उनको मुक्त भी करा दिया। उसने योजना बनाने एवं सीता को उसे बताने में थोड़ी जल्दबाजी दिखाई। हम इस सन्दर्भ पर अगले लेख में और भी चर्चा करेंगे।

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