ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
वाल्मीकि रामायण : आधुनिक विमर्श-20 लंका में सीता अनुवाद : संजीव त्रिपाठी
01-Feb-2018 10:11 AM 2689     

रामायण की कहानी पात्र सीता के इर्द-गिर्द बुनी गई है। ऐसा संभव है कि कहानी में राम की महानता की ख्याति हो, पर वाल्मीकि जीवन में नारी की महत्ता को दर्शाना चाहते हों? जब उन्होंने "नारद" से उस पुरुष के बारे में बताने को कहा जिसमें अनेकानेक उत्कृष्ट पुरुषवादी गुण हों, शायद उनको आभास था कि नारी के चरित्र के आगे पुरुष का व्यक्तित्व फीका पड़ जायेगा। नारी की आभा निष्कलंक पवित्र एवं दिव्य हो सकती है। पुरुष गलतियाँ कर सकता है, पर महिला जीवन के हर क्षेत्र में जीतने की योग्यता रखती हैं। वाल्मीकि रामायण में सीता पात्र अतुलनीय है। वाल्मीकि ने सीता पात्र के द्वारा एक आदर्श नारी को प्रस्तुत किया है।
सीता जनक को भूमि से मिली थी, हो सकता है कि नवजात शिशु को किसी ने त्यागकर भूमि में छुपा दिया हो? राजा जनक ने उस बच्ची को अपनाया, परवरिश की। बड़े होकर उस बच्चे ने सीता के रूप में एक सुन्दर बाला का रूप धारण किया। अन्य युवा बालाओं की तरह सीता भी विवाह के लिए एक दीप्तिवान और उत्तम पुरुष की चाहत रखी थी। सहेलियों के साथ उपवन में घूमते समय जब सीता ने सुकुमार राम को देखा तो वह अत्यंत आकर्षित हुई और मन ही मन उनसे विवाह की लालसा करने लगी। राजा जनक ने पुत्री सीता के स्वयंबर का आयोजन किया तो धनुष भंजन की शर्त रखी, यह शर्त सीता की चाहत में एक बाधा बनकर आ गई। सीता ने राम की सफलता के लिए बहुत प्रार्थना की। अंततः वही स्वयंबर की शर्त पूरी करने में सफल हुये और उनका सीता के साथ बड़ी धूमधाम और ठाट-बाट से विवाह हुआ। सीता अयोध्या राज्य में राजा दशरथ के राजघराने में वधू बनकर पहुँच गई। दस वर्ष गुजर गये, राम और सीता परिपक्व होकर अपनी-अपनी जिम्मेदारियाँ निभाने और स्वतन्त्र जीवनयापन करने के योग्य हो गये। उस समय सीता की उम्र अठारह और राम की सत्ताईस वर्ष थी।
राम कैकेयी की चालबाजी के जाल में फँस गये और चौदह वर्ष के वनवास को जाने के लिए तैयार हो गये। निर्णय लेते समय उन्होंने सीता से भी इस बारे में सलाह मशवरा नहीं किया। सीता का राम के साथ वनवास जाने का निर्णय तात्कालिक और अचंभित करने वाला था। सीता ने राम के द्वारा एकतरफा लिये गये निर्णय के बारे में कोई शिकायत नहीं की और ना ही वह अपना निर्णय बदलने के बारे में राम की पुनर्विचार याचिका के आगे झुकी। सीता का महल छोड़कर वनवास जाना राम के वनवास जाने से भी बड़ी बात थी। सीता ने बाद में स्वीकार किया कि वह अपने पति के बगैर अपने आपको महल में असुरक्षित मान रही थी। अन्य स्त्रियों की तरह सीता ने भी माना कि उसकी प्रतिष्ठा और सुरक्षा केवल उसके पति के साथ ही संभव है। किसी पुरुष प्रधान समाज में स्त्रियों की सुरक्षा हमेशा खतरे में रहती है!
रामायण की कहानी में सीता एक प्रमुख किरदार है। सीता हमेशा राम के सुरक्षित वापसी के लिए प्रार्थना करती रही। हो सकता है कि वह स्त्रियों की जैविक जरूरत को पूरा करने की इच्छा से माँ बनने के लिए इच्छुक हो? उनको वनवास का समय बहुत निरस और कष्टकारी लगा। उन्होंने राम को अपने दायित्व को निभाने की जिम्मेदारी के बारे में समझाने की कोशिश की, पर मन ही मन वह राम की उनके प्रति जिम्मेदारी को भी समझती थी। उन्होंने राम के द्वारा ऋषियों मुनियों की सुरक्षा की खातिर बड़ी संख्या में राक्षसों का वध करने के बारे में भी आगाह किया था। उन्होंने राम को जीवन की पवित्रता के बारे में परामर्श और सलाह दी। उन्होंने मन ही मन यह महसूस किया कि उनकी विपत्ति का सबसे बड़ा कारण राम का पुरुषार्थ और राक्षसों से बैर मोल लेना है।
सीता की एक छोटी सी भूल के कारण रावण ने उनका हरण कर लिया। जब रावण हरण कर सीता को अपने विमान से लंका ले जा रहा था उस समय सीता ने अपने आपको असहाय महसूस किया और अपना अंत निकट समझा। उन्होंने अपने आभूषण विमान से जमीन पर गिरा दिये। बाद में वही उनकी खोज में अत्यंत महत्वपूर्ण साबित हुये। सीता एक मामले में किस्मतवाली थी कि रावण ने उसकी मर्जी के वगैर कोई जोर-जबरदस्ती नहीं की। सैकड़ों स्त्रियाँ रावण के दबाव के सामने झुक गयीं, पर सीता अडिग रही। प्रतिकूल वातावरण के वाबजूद भी उन्होंने उम्मीद नहीं खोई। लंका में एक साल पूरा होने को था, सीता भगवान् से हर पल अपनी मुक्ति के लिये प्रार्थना करती रहती थी।
लेख में संक्षिप्त में सीता की संभावित मनोदशा का वर्णन किया गया है, उनको रावण की लंका में "अशोक वाटिका" नामक भव्य कृत्रिम वन में बंदी बनाकर रखा गया था। प्राकृतिक रूप से विकसित सुन्दर फूलों वाले अशोक वृक्षों के सुन्दर वन को सजाया सँवारा गया था। सुन्दर तालाब, पगडंडियाँ, बैठने की जगह और आलीशान भवनों का निर्माण किया गया था। सीता को हनुमान ने जब खोजा, उस समय वह अपनी सांध्य क्रिया से वापिस आ रही थी। हनुमान को यह सुनिश्चित करना अत्यंत ही कठिन था कि यह वही सीता है जिसकी खोज में वह निकले हैं। हनुमान एक वृक्ष के ऊपर छिप गये और रात भर उस युवती के ऊपर नजर रखे रहे जिसे वह सीता समझ रहे थे। दूसरे दिन सुबह रावण अपने दास-स्त्रियों और दल के साथ बड़े ही कामुक मिजाज में अशोक वाटिका आ पहुँचा। हनुमान चुपचाप छुपे हुये सारा दृश्य देखता रहा।
हनुमानने रावण को पहचान लिया, जिसे उन्होंने मदिरालय में एक रात पहले लंका भ्रमण के समय देखा था। सीता रावण को इस रूप में आगे बढ़ता देख बहुत घबराई हुई थी। काँपती हुई एवं अत्यंत डरी हुई, उसने अपने शरीर के निचले हिस्से को पैरों से सुरक्षित किया और ऊपरी हिस्से को बाहों से ढँक लिया। वह जमीन पर असहाय बैठी हुई थी और जोर जोर से सिसकियाँ भर रही थी। अस्त-व्यस्त और गंदे वस्त्रों में, वह गहन आत्मचिंतन करती हुई मदद के लिए भगवान् को याद कर रही थी। वाल्मीकि के विवरण के अनुसार सीता अपने पति के आने के लिए मन ही मन प्रार्थना कर रही थी। हनुमान अपने आपको यह विश्वास दिलाने में सफल हुये कि यह युवती ही सीता थी। इसके बाद वह उनके ऊपर नज़र रखे रहे।
रावण सीता से बोला "हे सुंदरी तुम मेरी तरफ क्यों नहीं देखती हो? हे प्रिये, तुम यहाँ सुरक्षित हो! यद्यपि मेरे कुल के नियमों के अनुसार मैं बलपूर्वक तुम्हारी निजता पर हमला कर सकता हूँ, लेकिन मैं तब तक ऐसा नहीं करूँगा जब तक तुम इसकी इजाजत नहीं दोगी! मुझे अपना प्रियतम मान लो और संसार की सारी धन दौलत हासिल कर लो! यदि तुम मुझे स्वीकार कर लो तो मैं तुम्हारे स्वजनों पर धन दौलत न्योछावर कर दूँगा! तुम जवान और सुन्दर हो! इस जवानी को बर्वाद करना तुम्हारे लिए ठीक नहीं है! सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में मेरे जैसा कोई बलशाली नहीं है! उस बेचारे राम को भूल जाओ! यह भी निश्चित नहीं है कि वह जिन्दा भी है या नहीं!" पुरुष की सानुरोध याचना हमेशा अतिश्योक्ति पूर्ण होती है!
वाल्मीकि ने कहानी में रावण को एक ऐसे पुरुष के रूप में प्रस्तुत किया है जो स्वभाव से अति कामुक था और स्त्रियों के साथ दुव्र्यवहार करने के लिए अपने बल का प्रयोग करने से भी नहीं हिचकिचाता था। ऐसा व्यवहार सभ्य समाज में अश्लील और अमान्य माना जाता है, जिसमें पैसे का दिखावा हो और अपनी कामुकता के लिए ताकत का प्रयोग किया जाये। बहुत सी स्त्रियाँ ऐसे घिनौने व्यवहार का शिकार हो जाती हैं। कुछ विरोध करती हैं, पर अधिकाँश को बल के सामने झुकने को मजबूर होना पड़ता है। बहुत कम स्त्रियाँ ही अपना साहस दिखा पाती हैं और कुछ तो दुव्र्यवहार से बचने के लिए अपनी जान तक देने को मजबूर हो जाती हैं। सीता, राम के लिए जीवित रहना चाहती थी और उन्हें अपना पौरुष दिखाने का अवसर देना चाहती थी। सीता भय और एकाकीपन के अत्यंत कठिन वातावरण में काँप रही थी।
सीता ने रावण को जो जबाब दिया, वह एक स्त्री का अपनी नैतिकता की रक्षा के लिए था और विषम परिस्थिति में दिया गया था। सीता ने चिल्लाकर कहा- "मेरे बारे में सोचना छोड़ दे, मूर्ख! अपनी पत्नियों से ही संतुष्टि करो। मैं शादीशुदा हूँ और अपने पति के प्रति वफादार भी। अपने व्यवहार के बारे में सोचो और अपनी बुद्धि से काम लो। यह सोने की लंका जल्द ही बर्बाद हो जाएगी, यदि तुमने अपना आचरण नहीं सुधारा!" सीता ने सलाह दी- "हे रावण, मुझे तुरंत छोड़ दो और मेरे स्वामी के पास जाने दो।" उसके बाद समझाया "यदि अपना और लंका का भला चाहते हो तो राम से मित्रता कर लो। राम तुम्हारी रक्षा करेंगे। वह तुम्हारे राज्य की भी रक्षा करेंगे।" और चेताया "यदि तुमने राम से दुश्मनी की तो तुम्हारा विनाश निश्चित है! जल्द ही इस भूमि पर उनके बाणों की वर्षा होगी!" अंत में व्यंग्य कर बोली "तुम राम और लक्ष्मण जैसे दो शेरों के सामने कुत्ते जैसे हो। तुम्हें छिपने को भी कोई जगह नहीं मिलेगी। तुम्हारा अंत निश्चित है!"
भारतीय विचारधारा के अनुसार मनुष्य की वाणी उसके बचाव के लिये एक अत्यंत महत्वपूर्ण साधन है। हम आक्रामकता से बचने के लिए उच्च स्वर में अपना विरोध जता सकते हैं। चिल्लाना एक प्रतिरोधात्मक संकेत है, साथ-साथ वह चारों तरफ सभी को सतर्क कर अतिक्रमी को डरा देता है। भारतीय शास्त्र और पुराण, वाणी को शक्ति के एक शस्त्र के रूप में मानते हैं। सीता ने पूरी क्षमता से इस शस्त्र का उपयोग कर रावण को उसके गलत मंसूबों और व्यवहार के प्रति अपना प्रतिरोध जता दिया। ऐसा संभव है कि सीता को लम्बे वनवास और लंका में एक साल के कठिन समय ने उसे मजबूत बना दिया हो! वाल्मीकि के अभूतपूर्व वर्णन और शब्दों के चयन से कोई भी सीता की आवाज की तीव्रता और दृढ़ता को स्पष्ट रूप से समझ सकता है।
रावण ने सीता को अपना मन बनाने के लिए दो माह का समय दिया। यह दो महीने उस एक साल का हिस्सा थे जिसे रावण ने स्वयं के लिए प्रारंभ में समझौते के लिए सुरक्षित रखा था। रावण गर्जना कर बोला "मेरे रसोइये तुम्हारे शरीर के टुकड़े कर उसका मेरे लिए नास्ता बना देंगे, यदि तुम दो माह बाद भी नहीं मानी!" वाल्मीकि की पात्र सीता पर इस धमकी का कोई प्रभाव नहीं पड़ा और वह अडिग रही। संभव है कि वाल्मीकि के पुत्रियाँ हों और वह यह बखूबी से समझते हों कि इस पुरुष प्रधान समाज में स्त्रियाँ कितनी असुरक्षित हो सकती हैं। वह सीता के पात्र के द्वारा संसार में सभी स्त्रियों को कठिन परिस्थितियों में सामना करना सिखाना चाहते हों, जैसे सीता ने दूर लंका द्वीप में बंदी बनकर भी बिना किसी सहारे के अपने प्राणों और स्वाभिमान की रक्षा की। सीता विजयी हुई और वाल्मीकि एक अच्छे गुरु साबित होते हैं।
"मैं तुम्हें अभी नष्ट कर सकती हूँ लेकिन मैं अपनी दिव्य शक्तियों को बर्बाद नहीं करना चाहती। मैं तुम्हारा विनाश कार्य राम के लिए छोड़ती हूँ। मेरा हरण तुम्हारा मेरे स्वामी राम के हाथों अंत का कारण बनेगा। आने दो उस सूर्यवंशी शूरवीर को, वह तुमको गीदड़ की मौत मारेंगे!" सीता ने कटाक्ष करते हुये रावण से कहा। रावण अत्यंत क्रोधित हुआ। वह राक्षसी पहरेदारों पर चिल्लाया और बोला कि इसे प्रताड़ित कर मानने के लिए बाध्य करो। अंत में रावण की पटरानी मंदोदरी ने टोकते हुए मधुर स्वर में अनुरोध किया- "हे स्वामी, आप मेरे साथ जो चाहो वह कर लीजिये! कृपा कर सीता को छोड़ दीजिये! वह आपके योग्य नहीं है। एक तरफ आप गुणों से संपन्न हैं और उसके पास ऐसा कुछ नहीं है। किसी की इच्छा के बगैर प्रेमालाप दुखद होता है, जबकि स्वीकृति से आनंद दायक होता है। मेरे साथ आइये, मेरे नाथ!" रावण ने मंदोदरी की बात सुनी और वह वहाँ से जोर-जोर से हँसते हुये चला गया।
कामुकता एक मूलभूत इच्छा है पर उस पर नियंत्रण अति आवश्यक है। आज भी दुनिया में मंदोदरी कई रूपों में विद्यमान है और वह निर्दोषों को बचाने के लिये और अतिक्रमियों को समझाने के लिए किसी न किसी रूप में प्रकट हो जाती है!

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