ISSN 2249-5967

 

सुषमा शर्मा

सम्पादक
उत्तर भारत की लोक कथाओं के संदर्भ
08-Jul-2017 08:00 PM 2616     

लोक कथाएं हमारी संस्कृति, परम्पराओं और नित्य की जीवन शैली में इस प्रकार रची बसी हैं कि उनसे अपनी धरती की सोंधी मिट्टी की सुगंध, मधुर बयार की ताजगी, कलकल करती नदियों की शीतलता और गुनगनी धूप की गर्माहट अनुभव की जा सकती है। लोेक कथाएं अनादिकाल से मौखिक संप्रेषण के माध्यम से हमारे पुरखों से पीढ़ी दर पीढ़ी स्थानान्तरित होती, आज तक अपना अस्तित्व बनाए हुए हैं। इनके उद्गम, रचनाकार आदि अज्ञात हैं। दादी-नानी से सुनते-सुनते स्मृति के कोश में संग्रहित हैं ये कथाएं, अतः स्वाभाविक है कि इनका स्वरूप समयानुसार और विभिन्न अंचलों में बदलता रहा है परन्तु मूल आत्मा अक्षुण है। इन कथाओं का महत्व मात्र मनोरंजन तक सीमित नहीं है वरन ये मानव संस्कृति, इतिहास और नैतिक मूल्यों की वाहक भी हैं। सम्पूर्ण विश्व में लोककथाएं प्रचलित हैं परंतु विभिन्न देश, परिवेश और समाज की लोकथाएं भिन्न हैं जिनमें वहां के आचार-विचार परिलक्षित होते हैं।
यद्यपि वर्तमान राजनैतिक विभाजन अथवा देश-प्रदेश की सीमाएं लोक कथाओं को संकुचित दायरे में नही बांध सकतीं क्योंकि आदिकाल में भौगोलिक आधार पर ही साझा व्यवहारिक कठिनाइयों के चलते वहां के वासियों की आपसी संप्रेषण की सीमाएं स्वतः ही निर्धारित हो जाती थीं। उदाहरणार्थ मैदानी क्षेत्रों की भाषा, बोली, परम्पराएं समान होती थीं, स्वाभाविक है कि वहां की लोकथाएं भी एक-सी होती थीं।
उत्तर भारत में लोक कथाएं मात्र कहानी के रूप में न होकर लोकगीत, लोकनृत्य और शास्त्रीय नृत्य कथक के माध्यम से भी संप्रेषित होती रही हैं। इन कथाओं की विशेषता यह है कि यह मात्र मानव नहीं, पशु-पक्षी, प्रकृति से भी जुड़ी हैं। हमारे प्रातः उठने से लेकर प्रत्येक आचार-विचार पर लोक कथाएं उपलब्ध हैं। हम धर्म प्रधान समाज का अंग हैं अतः प्रत्येक पर्व पूजा-पाठ में कथाओं का विशेष स्थान है। हर पर्व में घर की स्त्रियां कहानी कहती हैं और सब अक्षत लेकर कहानी सुनते हैं। इस प्रकार परम्पराओं के रथ पर सवार होकर लोक कथाएं अगली पीढ़ी तक यात्रा करती हैं।
उत्तर भारत नदियों से समृद्ध मैदानी क्षेत्र है जो यहां की कथाओं में परिलक्षित होता है। उदाहरणार्थ यहां पर दीपावली के दो दिन बाद द्वितीया को बहनें पूजा करके भाई को टीका करती हैं और  भाई की लम्बी आयु के लिये प्रार्थना करती हैं। इस अवसर पर एक कहानी कहते हैं कि भाई जब अपनी बहन के घर टीका करवाने जाता है तो राह में नदी, पर्वत, पशु-पक्षी सब उसकी राह रोकते हैं। भाई प्रत्येक से यह अनुरोध करता है कि उसकी बहन प्रतीक्षा कर रही होगी अतः उसे जाने दे। जब वह टीका करवा कर लौटेेगा, तब वो सब चाहें तो उसका भक्षण कर लें। जब भाई बहन के घर पहुंचता है और बहन को ज्ञात होता है कि भाई के जीवन पर संकट है तो वह सब राह रोकने वालों के लियेे उपहार देती है। इस प्रकार बहन द्वारा दिये गये उपहार पाकर नदी-पर्वत, पशु सब प्रसन्न हो कर भाई को जाने देते हैं। यह कथा प्रतीक है भाई के बहन के प्रति समर्पण, बहन का भाई के लिये स्नेह और प्रकृति और जीव जन्तुओं के साथ मानव के परस्पर सम्बन्धों की।
इसी प्रकार करवा चौथ पर कहानी है जिसमें बहन जब अपने पति के लिये निर्जल व्रत रखती है। रात होने पर चन्द्रमा नहीं दिखाई देता और बिना चन्द्र दर्शन के वह जल ग्रहण नहीं कर सकती। तब वह प्यास से व्यग्र हो जाती है। ऐसे में उसके भाई अपनी बहन की परेशानी देख कर द्रवित हो जाते हैं तथा पेड़ पर छिप कर चलनी में दीपक दिखा देते हैं। बहन उसी को चन्द्रमा समझ कर अघ्र्य देकर जल ग्रहण कर लेती है। जिसके कारण उसके पति की मृत्यु हो जाती है। पर जब उसे अपनी गलती ज्ञात होती है और वह पश्चाताप करती है तथा विधि विधान से व्रत पूजा करती है तो उसका पति जीवित हो जाता है। यह कहानी संदेश देती है अपने कर्तव्यों को ईमानदारी से निभाने और कष्टों को सह करके भी अपनी राह से न टिकने की।
दीपावली पर भी एक कहानी है कि जब एक भाट के घर की सबसे छोटी सातवीं बहू विवाह करके आती है तो घर में सबके अलग-अलग चूल्हे जलते देख कर वह मायके चली जाती है और इसी वादे पर वापस आती है कि सबका चूल्हा एक हो। उसी समय रानी का हार चोरी हो जाता है जो एक चील उठा ले गई थी और भाट के घर की छत पर सांप की केंचुल पड़ी देख कर हार वहीं डाल देती है और केंचुल ले जाती है। छोटी बहू के कहने पर जब उसका श्वसुर रानी का हार लौटाते समय राजा से पुरस्कार में मांगता है कि दीपावली में केवल राजा के घर और उसके घर ही दीप जले। जब लक्ष्मी जी दीपावली में निकलती हैं तो सब ओर अंधेरा और उसके घर प्रकाश देख कर आ जाती हैं, जिनसे छोटी बहू वादा लेती है कि वह उसके परिवार में सात पीढ़ी तक रहेंगी। इस कहानी में एक ओर संदेश दिया गया है कि संयुक्त परिवार में समृद्धि आती है। वहीं यह भी संदेश है कि ईमानदारी का फल मीठा होता है।
यह तो कुछ उदाहरण हैं पर्वों के, इसी प्रकार सभी पर्वों पर कोई न कोई कहानी सुनाई जाती है। पर ऐसा नहीं है कि मात्र पूजा-पर्व पर ही कहानियां कही जाती हैं। इसके अतिरिक्त नानी-दादी या घर के बड़े-बुजुर्ग भी बच्चों को सदियों से प्रचलित कहानियों के माध्यम से सीख देते हैं। कुछ कहानियां जैसे नेवले और संाप की कहानी है जिसमें एक गांव की स्त्री ने एक नेवला पाला था जो अपनी स्वामिनी के प्रति बहुत समर्पित था। एक दिन स्त्री पानी भरने गई तो अपने बच्चे को सुला कर नेवले की रखवाली में छोड़ गई। जब वह लौट कर आई तो नेवला बाहर द्वार पर उसकी प्रतीक्षा कर रहा था। स्त्री ने देखा कि उसके मुंह में खून लगा है। उसने समझा कि नेवले ने उसके बच्चे को खा लिया अतः क्रोध में उसने उसे मार दिया। जब वह अन्दर गई तो देखा कि बच्चा तो सुरक्षित था और एक सांप मरा पड़ा था। तब उसे समझ में आया कि उसे बच्चे की रक्षा के लिये नेवले ने सांप को मार दिया और उसी सांप का खून उसके मुंह में लगा था। यह देख कर उसे बहुत पछतावा होता है कि उसने अपने वफादार निर्दोष नेवले को मार दिया। कथा का तात्पर्य यह है कि बिना सोचे कुछ करने से पछतावा होता है।
इसी प्रकार की अनेकों कहानियां हैं जैसे लोहा घुन खा गया या गधे और धोबी की कहानी, कौए की काली चोंच की कहानी, सात राजकुमार और डायनों की कहानी, सौतेली मां के अत्याचारों और विवश राजकुमारी की कहानी आदि एक लम्बी सूची है लोक कथाओं की। प्रत्येक कथा में कोई न कोई शिक्षा होती है जो बच्चों को संस्कारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इन कथाओं में सच, ईमानदारी, परिश्रम, दया, जीव जन्तु से सौहाद्र्र, प्रकृति का सरंक्षण जैसे सभी बिन्दुओं पर सकारात्मक उपदेश दिया गया है। इन कथाओं में स्थानीय भाषा के शब्दों को प्रयोग होता है। यद्यपि जहां तक भाषा का प्रश्न है वह समय के परिवर्तन और भाषा के संवर्धन के साथ ही संशोधित होती रही है। क्योंकि ये कथाएं मौखिक रूप से संप्रेषित हुई हैं अतः जब जो बोली, बोली जाती थी उसी भाषा में कथा कही गई। हां कथा का मूल कथानक वही रहा पर पात्रों के नाम और बोली में बदलाव आना अवश्यंभावी था। पहले यह कथाएं अवधी, भोजपुरी या ब्रज भाषाओं में कही जाती थीं पर जब खड़ी बोली का वर्चस्व हुआ तो स्वाभाविक है कि वही कथाएं उस भाषा में सुनाई जाने लगीं।
परन्तु जो कथाएं काव्यात्मक या गीत शैली में थीं उनका स्वरूप लगभग वही बना रहा। उदाहरणार्थ बचपन में बच्चों को बहलाते हुए प्रायः माएं गााती हैं - घन्तु मन्तु कौड़ी चुन्तु / कौड़ी लेकर गंग बहन्तु / गंगा मैया पानी दीन्हीं / पानी हम भुजवे को दीन्हीं / भुजवा हमका लइया दीन्हीं / लइया से हम खीर बनाया / सबने खाया सबने खाया। अथवा
चन्दा मामा दूर के / पुए पकाएं पूर के / आप खाएं थाली में / मुन्ने को दें प्याली में / प्याली गई टूट / मुन्ना गया रूठ / दूध मलाई लाएंगे / मुन्ने को खिलाएंगे।
यद्यपि अब अनेक लोक कथाएं लिपिबद्ध की गई हैं और अब तो टीवी और वीडियो के माध्यम से भी ये कथाएं प्रस्तुत की जा रही हैं पर अभी भी लोक कथाओं का इतना विशाल भंडार है कि यदि पुरखों की स्मृति को खंगाला जाए तो संभवतः अनेक ग्रंथ तैयार हो जाएं। आज समय इतनी तीव्र गति से बदल रहा है तकनीकी विकास ने जीवन जीने की पद्धति समाज और भावी पीढ़ी की सोच रुचियां बदल दी हैं पर समाज के उज्जवल कल के लिये, उन्हे संस्कारित करने तथा जीवन में नैतिक मूल्यों के रोपण हेतु आज भी इन लोक कथाओं की आवश्यकता है।

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